सांसदों की बगावत के बीच एकनाथ शिंदे की शिवसेना को लगा बड़ा झटका, एक नेता अयोग्य घोषित!

शिवसेना यूबीटी ने पार्टी में हुए हालिया विभाजन को "ऑपरेशन टाइगर" नाम दिया है, इसको लेकर ठाकरे का दावा है कि इसे भाजपा ने कराया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। शिवसेना UBT के सांसदों के पाला बदलने के बाद सियासी पारा सातवें आसमान पर है।

शिवसेना के विभाजन के बाद से राज्य की राजनीति में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं। हाल के दिनों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जिन्होंने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। एक तरफ उद्धव ठाकरे ने भाजपा और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर गंभीर आरोप लगाए हैं, तो दूसरी तरफ फडणवीस ने भी इन आरोपों का जवाब दिया है।

इसी बीच शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसदों के शिंदे गुट में जाने की खबरों ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। वहीं उल्हासनगर की नगरसेविका पूजा भोईर को अयोग्य घोषित किए जाने के मामले को भी शिंदे गुट के लिए झटके के रूप में देखा जा रहा है।

शिवसेना यूबीटी ने पार्टी में हुए हालिया विभाजन को “ऑपरेशन टाइगर” नाम दिया है, इसको लेकर ठाकरे का दावा है कि इसे भाजपा ने कराया है। शनिवार को ठाकरे ने आरोप लगाया था कि पार्टी का विघटन एकनाथ शिंदे द्वारा रचित ऑपरेशन टाइगर नहीं था, बल्कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पर कतरने के लिए भाजपा नेतृत्व द्वारा रचित “ऑपरेशन देवेंद्र” था।

जिसके बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्धव ठाकरे के ‘पंख काटे जाने’ और ‘हवाई जहाज में बेबस’ दिखने वाले बयान पर पलटवार किया। दरअसल ‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर महाराष्ट्र में सियासी बयानबाजियों का दौर जारी है। लेकिन ये कोई नया नहीं है।

महाराष्ट्र की राजनीति में असली बदलाव वर्ष 2022 में देखने को मिला था, जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के कई विधायकों के साथ बगावत कर दी थी। इस बगावत के बाद उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई और राज्य में नई राजनीतिक व्यवस्था बनी। इसके बाद से ही शिवसेना दो हिस्सों में बंट गई।

एक गुट का नेतृत्व उद्धव ठाकरे कर रहे हैं जबकि दूसरे गुट का नेतृत्व एकनाथ शिंदे के हाथों में है। दोनों पक्ष लगातार खुद को असली शिवसेना साबित करने की कोशिश करते रहे हैं। इसी राजनीतिक संघर्ष का असर आज भी महाराष्ट्र की राजनीति में साफ दिखाई देता है।

हाल ही में उद्धव ठाकरे ने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी को कमजोर करने के लिए सुनियोजित राजनीतिक अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने इसे “ऑपरेशन देवेंद्र” का नाम दिया। उनका कहना है कि उनकी पार्टी के नेताओं और सांसदों को तोड़ने की कोशिश की जा रही है ताकि शिवसेना (यूबीटी) को कमजोर किया जा सके। उद्धव ठाकरे ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को इस तरह राजनीतिक दबाव में लाना उचित नहीं है।उद्धव ठाकरे के इन आरोपों के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जवाब दिया।

फडणवीस ने कहा कि उनके खिलाफ जो आरोप लगाए जा रहे हैं, उनमें कोई सच्चाई नहीं है। उन्होंने उद्धव ठाकरे के उस बयान पर प्रतिक्रिया दी जिसमें ठाकरे ने कहा था कि “मैं इंसान हूं, मेरे पंख नहीं हैं, तो उन्हें कौन काट सकता है।” फडणवीस ने जवाब देते हुए कहा कि कोई भी उनकी स्वतंत्रता या क्षमता को सीमित नहीं कर सकता और राजनीतिक अफवाहों पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयानबाजी केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि इसके पीछे महाराष्ट्र की बदलती राजनीतिक परिस्थितियाँ भी हैं। दोनों पक्ष अपने समर्थकों को यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वे मजबूत स्थिति में हैं और अपने राजनीतिक आधार को बचाने में सक्षम हैं। इसी दौरान सबसे बड़ी चर्चा शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों को लेकर हुई।

खबरें सामने आईं कि उद्धव ठाकरे गुट के कई सांसद शिंदे गुट के संपर्क में हैं। बाद में छह सांसदों के शिंदे गुट में जाने की खबरों ने महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल मचा दी। उद्धव ठाकरे ने इन सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि यदि कानून का सही तरीके से पालन किया जाए तो इन सांसदों को अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।

उद्धव ठाकरे का कहना है कि जिन नेताओं को जनता ने एक विचारधारा और एक पार्टी के नाम पर चुना था, उनका अचानक दूसरी तरफ जाना मतदाताओं के विश्वास के साथ अन्याय है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से भी इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। दूसरी ओर शिंदे गुट का तर्क है कि उनके साथ आने वाले नेता अपनी राजनीतिक इच्छा से यह फैसला ले रहे हैं। शिंदे समर्थकों का कहना है कि उनके नेतृत्व को लगातार समर्थन मिल रहा है और कई नेता भविष्य की राजनीति को देखते हुए उनके साथ आना चाहते हैं।

इस तरह दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ जनता के सामने हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में दल-बदल का मुद्दा नया नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े नेताओं ने अपने राजनीतिक पाले बदले हैं। लेकिन जब किसी बड़ी पार्टी के सांसद या विधायक बड़ी संख्या में दूसरी तरफ जाते हैं, तो इसका असर केवल पार्टी पर ही नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक समीकरण पर पड़ता है। यही कारण है कि शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों के शिंदे गुट में जाने को बहुत महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना माना जा रहा है।

इसी बीच उल्हासनगर से जुड़ा एक और मामला सामने आया जिसने शिंदे गुट की मुश्किलें बढ़ा दीं। नगरसेविका पूजा भोईर को अयोग्य घोषित किए जाने की खबर ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया। विपक्षी दलों ने इसे शिंदे गुट के लिए झटका बताया और कहा कि इससे उनकी स्थानीय राजनीति पर असर पड़ सकता है।

हालांकि शिंदे गुट के नेताओं का कहना है कि वे कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करते हैं और मामले का उचित जवाब देंगे। स्थानीय निकायों की राजनीति अक्सर राज्य की बड़ी राजनीति को भी प्रभावित करती है। नगर निगमों और नगर परिषदों में होने वाले बदलाव कई बार विधानसभा और लोकसभा चुनावों के संकेत भी देते हैं। इसलिए उल्हासनगर जैसे मामलों को राजनीतिक दल गंभीरता से लेते हैं।

उद्धव ठाकरे लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि उनकी पार्टी को कमजोर करने के लिए राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका कहना है कि शिवसेना की मूल विचारधारा और बालासाहेब ठाकरे की विरासत को बचाने की लड़ाई जारी है। वे अपने समर्थकों से भी लगातार जुड़े रहने की कोशिश कर रहे हैं और विभिन्न सभाओं में भाजपा तथा शिंदे गुट पर निशाना साधते रहे हैं।

दूसरी तरफ भाजपा और शिंदे गुट का कहना है कि महाराष्ट्र में विकास और स्थिरता उनकी प्राथमिकता है। उनका दावा है कि राज्य सरकार विकास कार्यों को आगे बढ़ाने में लगी हुई है और विपक्ष केवल राजनीतिक आरोप लगाने में व्यस्त है। यही कारण है कि दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक संघर्ष लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। सियासी पंडितों का मानना है कि आने वाले समय में महाराष्ट्र की राजनीति और दिलचस्प हो सकती है।

यदि सांसदों और स्थानीय नेताओं का दल बदल जारी रहता है तो इसका असर आगामी चुनावों पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को एकजुट रखने में सफल रहते हैं तो वे विपक्ष की राजनीति में एक मजबूत भूमिका निभा सकते हैं। महाराष्ट्र देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। यहाँ होने वाले राजनीतिक बदलावों का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता है। इसलिए शिवसेना, भाजपा, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसी ताकतें राज्य की राजनीति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

वर्तमान स्थिति को देखें तो महाराष्ट्र में केवल सत्ता की लड़ाई नहीं चल रही है, बल्कि राजनीतिक पहचान और नेतृत्व की भी लड़ाई है। उद्धव ठाकरे अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि एकनाथ शिंदे अपने नेतृत्व को मजबूत करने में लगे हैं। भाजपा राज्य में अपनी स्थिति को और मजबूत करना चाहती है। ऐसे में आने वाले महीनों में राजनीतिक घटनाक्रम और तेजी से बदल सकते हैं।

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