अन्ना की चेतावनी से बौखलाई फडणवीस सरकार, RTI पर पीछे हटी

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आदेश के बाद, राज्य सूचना आयोग ने RTI नियमों में संशोधनों को स्थगित कर दिया है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र का सियासी पारा इन दिनों हाई चल रहा है। ऐसे में RTI को लेकर मचे घमासान के बीच सामने आई खबरों के मुताबिक अधिकारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आदेश के बाद, राज्य सूचना आयोग ने RTI नियमों में संशोधनों को स्थगित कर दिया है.

महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों सूचना के अधिकार यानी RTI को लेकर बड़ा विवाद देखने को मिला। जिस सरकार ने बड़े विश्वास के साथ नए RTI नियम लागू किए थे, उसी सरकार को कुछ ही दिनों के भीतर उन्हें स्थगित करना पड़ा।

इसकी सबसे बड़ी वजह बने समाजसेवी अन्ना हजारे, जिन्होंने साफ चेतावनी दी थी कि अगर नए नियम वापस नहीं लिए गए तो वे 5 जुलाई से अनिश्चितकालीन अनशन शुरू करेंगे। जैसे ही आंदोलन का दबाव बढ़ा, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को हस्तक्षेप करना पड़ा और नए नियमों पर रोक लगाने का आदेश देना पड़ा।

यह घटना केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है। यह उस सोच पर सवाल उठाती है जिसके तहत सरकार ने ऐसे नियम लागू करने की कोशिश की जिन्हें RTI कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन और पारदर्शिता के समर्थक लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे थे।

सरकार का कहना था कि नियमों का उद्देश्य व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाना है, लेकिन विरोध करने वालों का तर्क था कि इन नियमों से आम नागरिक के लिए सूचना हासिल करना पहले से ज्यादा कठिन हो जाता। RTI कानून को देश के सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक हथियारों में गिना जाता है।

इस कानून ने एक आम नागरिक को यह ताकत दी कि वह सरकार से सवाल पूछ सके, खर्च का हिसाब मांग सके और अधिकारियों की जवाबदेही तय कर सके। देश में हजारों घोटाले और अनियमितताएं RTI के जरिए सामने आई हैं। यही कारण है कि जब भी RTI को कमजोर करने जैसी कोई कोशिश दिखाई देती है, समाज का एक बड़ा वर्ग सक्रिय हो जाता है। अन्ना हजारे स्वयं RTI आंदोलन के पुराने चेहरे रहे हैं और महाराष्ट्र में RTI को मजबूत बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर नए नियमों में ऐसा क्या था जिसने इतना बड़ा विरोध खड़ा कर दिया। नए नियमों के तहत RTI आवेदन शुल्क बढ़ाकर 30 रुपये कर दिया गया। सूचना की प्रति लेने के लिए अलग शुल्क तय किया गया।

अपील करने पर भी शुल्क लगाने का प्रावधान रखा गया। इसके अलावा आवेदन के साथ पहचान पत्र की स्वप्रमाणित प्रति लगाना अनिवार्य किया गया। आवेदन को एक ही विषय तक सीमित रखने और लगभग 150 शब्दों के भीतर रखने जैसी शर्तें भी रखी गईं।

आलोचकों का कहना है कि ये सभी प्रावधान मिलकर RTI की मूल भावना को कमजोर करते हैं। RTI का मकसद नागरिकों के लिए सूचना प्राप्त करना आसान बनाना था, लेकिन नए नियमों में कई ऐसे कदम दिखाई दिए जो प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति को किसी परियोजना से जुड़े पांच अलग-अलग सवाल पूछने हैं तो उसे अलग-अलग आवेदन देने पड़ सकते हैं। इससे खर्च भी बढ़ेगा और समय भी।

वहीं फडणवीस सरकार पर सबसे बड़ा आरोप यह लगा कि उसने नियम बनाते समय जनता और विशेषज्ञों से पर्याप्त चर्चा नहीं की। अन्ना हजारे ने अपने ज्ञापन में कहा कि RTI विशेषज्ञों, वकीलों, पत्रकारों, सूचना आयुक्तों और सामाजिक संगठनों से विचार-विमर्श किए बिना नियम बना दिए गए।

लोकतंत्र में जब जनता से जुड़े किसी महत्वपूर्ण कानून में बदलाव किया जाता है तो व्यापक परामर्श अपेक्षित होता है। लेकिन इस मामले में सरकार पर जल्दबाजी का आरोप लगा।

सरकार की मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब अन्ना हजारे ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ये नियम RTI की धार को कुंद कर देंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पारदर्शिता बढ़ाने के बजाय सूचना प्राप्त करने की राह में नई बाधाएं खड़ी कर रही है। हजारे का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि वे दशकों से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों और सूचना के अधिकार के लिए संघर्ष करते रहे हैं।

विपक्षियों का कहना है कि यदि नियम वास्तव में जनता के हित में थे तो सरकार को उन्हें वापस लेने की जरूरत क्यों पड़ी। और यदि नियमों में खामियां थीं तो उन्हें लागू ही क्यों किया गया। यही वह प्रश्न है जिसका जवाब सरकार को देना होगा। लोकतांत्रिक शासन में नीतियां विरोध के डर से नहीं बल्कि जनहित और व्यापक सहमति के आधार पर बनाई जानी चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक और महत्वपूर्ण बात उजागर की। सरकार ने नियमों को पहले लागू किया और बाद में कहा कि सभी पक्षों से चर्चा की जाएगी। आलोचकों का कहना है कि प्रक्रिया उलटी नहीं होनी चाहिए थी। पहले चर्चा होती, सुझाव लिए जाते, फिर नियम बनाए जाते। लेकिन यहां पहले नियम लागू हुए और विरोध के बाद संवाद की बात शुरू हुई। पहचान पत्र अनिवार्य करने के मुद्दे पर भी गंभीर सवाल उठे।

RTI कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई बार सूचना मांगने वाले लोग स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना चाहते हैं। यदि उनकी पहचान पूरी तरह उजागर हो जाएगी तो उन पर दबाव बनाया जा सकता है। ऐसे में पहचान पत्र की अनिवार्यता सूचना मांगने वालों के लिए जोखिम बढ़ा सकती है।

एक और विवादित प्रावधान यह था कि यदि मांगी गई सूचना वेबसाइट पर उपलब्ध है तो अधिकारी आवेदक को वेबसाइट देखने की सलाह दे सकता है।

सुनने में यह सामान्य लगता है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों, बुजुर्गों या तकनीकी रूप से कम सक्षम लोगों के लिए यह व्यवस्था परेशानी पैदा कर सकती है। RTI का उद्देश्य नागरिक को सूचना उपलब्ध कराना है, न कि उसे तकनीकी जटिलताओं में उलझाना। फडणवीस सरकार खुद को पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन का समर्थक बताती रही है। ऐसे में RTI नियमों को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद उसकी छवि के लिए भी चुनौती बन गया।

विरोधियों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता के पक्ष में है तो उसे RTI को और मजबूत बनाना चाहिए, न कि ऐसे नियम लाने चाहिए जिनसे नागरिकों को अतिरिक्त बाधाओं का सामना करना पड़े। यह राजनीतिक और नैतिक दोनों तरह का प्रश्न बन गया है।

हालांकि अन्ना हजारे की चेतावनी के बाद जिस तेजी से सरकार ने कदम पीछे खींचे, उसने यह भी दिखाया कि जनता का दबाव आज भी लोकतंत्र में असर रखता है।

वर्षों पहले जिस तरह अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा किया था, उसी तरह RTI के मुद्दे पर भी उनकी आवाज को गंभीरता से लिया गया। सरकार के सामने यह डर भी रहा होगा कि यदि अनशन शुरू हो गया तो यह मुद्दा पूरे राज्य और फिर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा रूप ले सकता है।

वहीं इसे लेकर कई सियासी पंडितों का मानना है कि यह केवल RTI का मुद्दा नहीं बल्कि शासन शैली का भी सवाल है। जब सरकारें जनता से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में संवाद कम और आदेश ज्यादा जारी करती हैं, तब टकराव पैदा होता है। महाराष्ट्र में यही हुआ। यदि शुरू से ही नागरिक समाज और विशेषज्ञों को साथ लिया जाता तो शायद इतना बड़ा विवाद पैदा ही नहीं होता।

इस मामले पर फडणवीस सरकार के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि मुख्यमंत्री ने विरोध को देखते हुए नियमों को रोककर संवेदनशीलता दिखाई। यह बात अपनी जगह सही हो सकती है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि क्या संवेदनशीलता का प्रदर्शन केवल तब होना चाहिए जब आंदोलन की चेतावनी मिले? क्या जनता की राय पहले नहीं सुनी जानी चाहिए थी?

यही प्रश्न सरकार को असहज करता है। इस मामले से यह भी स्पष्ट होता है कि RTI केवल एक कानून नहीं बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है। जब नागरिक को सरकार से जानकारी मांगने में आसानी होती है, तभी जवाबदेही मजबूत होती है। लेकिन जब प्रक्रिया महंगी, जटिल और सीमित होती जाती है तो नागरिक और शासन के बीच दूरी बढ़ने लगती है। यही डर RTI कार्यकर्ताओं को नए नियमों में दिखाई दिया।

महाराष्ट्र सरकार ने नियमों को स्थगित कर दिया है, लेकिन बहस खत्म नहीं हुई। असली सवाल अब यह है कि आगे क्या होगा। क्या सरकार इन नियमों को पूरी तरह वापस लेगी? क्या नए सिरे से व्यापक चर्चा होगी? क्या नागरिक समाज और RTI कार्यकर्ताओं की राय को महत्व दिया जाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि अन्ना हजारे की चेतावनी ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया। यह घटना लोकतंत्र में जनदबाव की शक्ति का उदाहरण बन गई है। साथ ही यह फडणवीस सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है कि पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों पर जनता बेहद संवेदनशील है।

यदि सरकारें बिना पर्याप्त संवाद के ऐसे फैसले लेंगी जिनसे नागरिक अधिकार प्रभावित होते दिखाई दें, तो विरोध होना स्वाभाविक है। RTI की लड़ाई केवल कागजी नियमों की लड़ाई नहीं है, बल्कि जनता के जानने के अधिकार की लड़ाई है, और यही कारण है कि इस मुद्दे ने महाराष्ट्र की राजनीति में इतनी बड़ी हलचल पैदा कर दी है।

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