मणिपुर में अब वर्दी बनाम भीड़!

असम राइफल्स कैंप पर भीड़ का हमला, हिंसा का तांडव

  • क्या युद्धविराम की व्यवस्था अब उग्रवादियों के लिए सुरक्षा कवच बन रही है?
  • कानून का शासन कमजोर पड़ा, भीड़ और बंदूक के बीच की रेखा और धुंधली हुई

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
इंफाल। मणिपुर एक बार फिर जल उठा है लेकिन इस बार फर्क सिर्फ इतना है कि आग किसी गांव या बाजार में नहीं बल्कि सीधे उस सुरक्षा बल के दरवाजे तक पहुंच गई जिसे सीमा और आंतरिक सुरक्षा की सबसे मजबूत ढाल माना जाता है। मणिपुर के सेनापति शहर में असम राइफल्स के कैंप भीड़ ने हमला कर दिया। वाहन तोड़े, आग लगाई और जमकर नारेबाजी भी की। यह हमला महज पत्थरबाजी या आगजनी की घटना नहीं है बल्कि यह उस पूरे सुरक्षा ढांचे के खिलाफ खुली चुनौती है जो पिछले वर्षों से मणिपुर को सामान्य करने की कोशिश में लगा है। हमले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन सी ताकतें हैं जो भीड़ को इस हद तक संगठित कर देती हैं कि वह हथियारबंद सुरक्षा बल के कैंप तक पहुंचकर वाहनों को आग लगा दें ट्रकों को पलट दे और घंटों तक बवाल मचाती रहे। क्या यह स्वत: स्फूर्त गुस्सा था या फिर किसी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा? क्योंकि घटनाक्रम बताता है कि असम राइफल्स ने विश्वसनीय खुफिया सूचना के आधार पर उन सशस्त्र कैडरों की तलाश शुरू की थी जिन पर सीजफायर के नियमों का उल्लंघन कर कैंप से बाहर हथियारों और वर्दी के साथ घूमने का आरोप था।

रक्षा प्रवक्ता का बयान

रक्षा प्रवक्ता ने बताया कि मकुइलोंगडी क्षेत्र में जो ओकलोंग स्थित नामित आईएम कैंप से लगभग दो किलोमीटर पश्चिम में है सशस्त्र कैडरों की मौजूदगी संबंधी विश्वसनीय खुफिया जानकारी मिलने के बाद असम राइफल्स ने क्षेत्र प्रभुत्व गश्त और तलाशी अभियान शुरू किया। उन्होंने कहा कि खुफिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्टों से संकेत मिले थे कि सशस्त्र कैडर निर्धारित कैंपों से बाहर हथियारों और वर्दी के साथ घूम रहे थे जो स्थापित सीजफायर के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। साथ ही सीजफायर मॉनिटरिंग ग्रुप को इन कथित उल्लंघनों की औपचारिक जानकारी भी दी गई और इससे जुड़े सुरक्षा संबंधी मुद्दों से अवगत कराया गया। प्रवक्ता के अनुसार अभियान के दौरान मकुइलोंगडी और ओकलोंग गांवों की ओर बढ़ रही असम राइफल्स की टुकडिय़ों को बड़ी संख्या में लोगों ने रोक लिया जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं।

सयंम से काम किया असम राइफल्स ने

असम राइफल्स के जवानों ने अत्यधिक संयम बरतते हुए स्थानीय प्रतिनिधियों से बातचीत की और उन्हें भरोसा दिलाया कि अभियान का उद्देश्य केवल सुरक्षा सुनिश्चित करना और क्षेत्र में शांति बनाए रखना है। साथ ही, यह भी आश्वासन दिया गया कि संबंधित अधिकारियों की अनुमति के बिना कोई भी टुकड़ी किसी गांव में प्रवेश नहीं करेगी। स्थिति उस समय और तनावपूर्ण हो गई जब रात नौ बजे सेनापति शहर में बड़ी संख्या में लोगों के इक_ा होने और असम राइफल्स कैंप की ओर मार्च करने की सूचना मिली। असम राइफल्स की टुकडिय़ों के वापस लौटने के बावजूद रात करीब 9:30 बजे बड़ी भीड़ कैंप तक पहुंच गई और पत्थरबाजी संपत्ति में तोडफ़ोड़ तथा आगजनी की कोशिश की। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सेनापति पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को तत्काल तैनात किया गया। बाद में लौटते समय भीड़ के एक हिस्से ने असम राइफल्स के वाहनों में तोडफ़ोड़ की। एक हल्के वाहन को आग लगा दी गई जबकि दो ट्रकों को पलटकर क्षतिग्रस्त कर दिया गया। हिंसा के दौरान एक नागरिक की कार को भी जला दिया गया।

हमले के दाषियों को गिरफ्तार किया

रक्षा प्रवक्ता के मुताबिक सुरक्षा बल शांति बनाए रखने सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और कानून के शासन को कायम रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बल सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए लगातार संयम और पेशेवर व्यवहार का परिचय दे रहे हैं। इस बीच एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि 6 जुलाई को मणिपुर के उखरूल जिले में हुए घात लगाकर किए गए हमले जिसमें असम राइफल्स के दो जवान शहीद हो गए थे के सिलसिले में तीन संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है। उन्होंने बताया कि टीएम कासोम लितान और सिकिबुंग क्षेत्रों में चलाए गए तलाशी अभियान के दौरान इन लोगों को हिरासत में लिया गया। गौरतलब है कि मणिपुर के हिंसा प्रभावित उखरूल जिले में नुंगशांग कोंग के पास इंफाल-दीमापुर राष्ट्रीय राजमार्ग संदिग्ध नागा उग्रवादियों ने असम राइफल्स के वाहन पर घात लगाकर हमला किया था जिसमें दो जवान शहीद हो गए थे। शहीद जवानों की पहचान वारंट अधिकारी बलवंत सिंह और हवलदार चंद्र मोहन सिंह के रूप में हुई थी।

महिलाओं को आगे कर किया हमला

इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा और कहीं अधिक गंभीर पहलू यह है कि सुरक्षा बलों को गांवों में प्रवेश से रोकने के लिए बड़ी संख्या में महिलाओं सहित भीड़ को आगे कर दिया गया। पूर्वोत्तर में कई उग्रवादी संगठनों द्वारा अतीत में भी स्थानीय जनसमर्थन और भीड़ का इस्तेमाल सुरक्षा अभियानों को बाधित करने के लिए किया जाता रहा है। यदि ऐसा इस मामले में भी हुआ है तो यह केवल कानून-व्यवस्था का संकट नहीं बल्कि सुरक्षा नीति के लिए भी बड़ा खतरा है। तीसरा पहलू समय का है। महज नौ दिन पहले उखरूल में असम राइफल्स के दो जवान शहीद हुए। जांच अभी जारी है। तीन संदिग्ध हिरासत में हैं। इसी बीच सेनापति में सुरक्षा अभियान शुरू होता है और देखते ही देखते भीड़ कैंप पर हमला बोल देती है। क्या इन दोनों घटनाओं के बीच कोई कड़ी है? फिलहाल इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इस संभावना से इनकार भी नहीं कर रहीं कि उग्रवादी नेटवर्क अपने खिलाफ बढ़ती कार्रवाई से बौखलाया हुआ है। मणिपुर में हिंसा केवल जातीय संघर्ष तक सीमित नहीं रह गई है। अब यह सुरक्षा बलों उग्रवादी संगठनों युद्धविराम व्यवस्था और स्थानीय राजनीति के जटिल समीकरण में बदल चुकी है। ऐसे में सेनापति की घटना एक चेतावनी है अगर राज्य में कानून का शासन कमजोर पड़ा तो भीड़ और बंदूक के बीच की रेखा और धुंधली होती चली जाएगी।

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