Gen-Z से मोहन भागवत के संवाद को लेकर राउत ने साधा निशाना, BJP-RSS को किया बेनकाब

संजय राउत ने कहा है कि मोहन भागवत की Gen Z के साथ बातचीत पहले से तय और प्रायोजित है। इसमें सिर्फ BJP से जुड़े परिवारों को ही चुना गया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: एक बार फिर Gen-Z को लेकर सियासी गलियारों में राजनीतिक खेल शुरू हो गया है। जबसे दिल्ली में युवाओं ने प्रोटेस्ट कर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया ही तबसे सभी दलों को मानों युवाओं की ताकत का अंदाजा हो गया है।

ऐसे में किसी दल के नेता इन युवाओं को गद्दार बता रहे देश विरोधी बता रहे तो कई नेता इनकी बातें इनकी मांगे सदन तक में उठा रहे हैं। वहीं इसी बीच आज मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जेन-जी और जेन-अल्फा के युवाओं से सीधा संवाद किया। यह कार्यक्रम आईआईएमयूएन की 15वीं वर्षगांठ पर हुआ, जिसमें देश के 100 से ज्यादा शहरों से आए करीब दो हजार 15 से 19 साल के छात्र-छात्राएं शामिल हुए। विषय था भारतीय तरीके से दुनिया को जोड़ने में युवाओं की भूमिका।

वहीं कुछ हफ्ते पहले तक स्थिति बिल्कुल अलग थी। नीट परीक्षा के पेपर लीक के खिलाफ जेन-जी युवा सड़कों पर उतरे थे। दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी नाम के युवा संगठन ने प्रदर्शन किया। तब उनकी बातें सुनने की बजाय पुलिस ने लाठियां चलाईं, आंसू गैस छोड़ी और कई युवा घायल हुए। सरकार और सिस्टम ने उनकी आवाज को नजरअंदाज करने की कोशिश की। युवा पूछ रहे थे कि परीक्षाएं क्यों लीक होती हैं, भविष्य क्यों अंधेरे में है, लेकिन जवाब में लाठियां मिलीं।

अब वही जेन-जी और छोटी उम्र के जेन-अल्फा बच्चे मंच पर बैठे हैं और संघ प्रमुख उनसे बात कर रहे हैं। मोहन भागवत पहले भी कह चुके हैं कि नई पीढ़ी सवाल पूछती है, पुराने जमाने की तरह आज्ञा मानने वाली नहीं है। उन्हें तर्क, प्यार और समय देना पड़ता है। आज का कार्यक्रम इसी दिशा में एक कोशिश लगता है।

वहीं RSS के इस कदम पर उद्धव ठाकरे के करीबी सांसद संजय राउत ने इससे पहले बड़ा हमला बोला है। संजय राउत ने कहा है कि मोहन भागवत की Gen Z के साथ बातचीत पहले से तय और प्रायोजित है। इसमें सिर्फ BJP से जुड़े परिवारों को ही चुना गया है। उन्हें उन लोगों से बात करनी चाहिए थी जिन्होंने लाठीचार्ज और पैलेट गन का सामना किया है।

गौरतलब है कि आज जिस तरह से पीएम मोदी एक के बाद एक वीडियो जारी कर रहे हैं। Gen-Z को अपना फ्रैंडर्स बता रहे हैं इससे एक बात तो तय है कि सत्तधारी दल को विपक्ष से डर हो या न हो लेकिन युवाओं की ताकत से ज़रूर है। दिल्ली के जंतर मंतर और संसद की तरफ मार्च में युवाओं पर लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस छोड़ी गई। कई युवा घायल हुए। कुछ रिपोर्ट्स में पैलेट गन जैसी चीजों का भी जिक्र आया। सरकार और भाजपा-आरएसएस के नेताओं ने लंबे समय तक इनकी बातों को नजरअंदाज किया। युवाओं को भावनात्मक, नकलची या शांत दिमाग से न सोचने वाला कहकर टाल दिया गया।

मोहन भागवत खुद पहले कह चुके थे कि नई पीढ़ी सवाल पूछती है, आज्ञा नहीं मानती। लेकिन जब सवाल सड़क पर आए तो जवाब लाठियों से दिया गया।भाजपा और आरएसएस लंबे समय से युवाओं को अपना वोट बैंक मानते रहे हैं। शाखाओं, कार्यक्रमों और राष्ट्रवाद की बातों से उन्हें जोड़ने की कोशिश होती रही। लेकिन जब असली मुद्दे जैसे पेपर लीक, बेरोजगारी या शिक्षा व्यवस्था की गड़बड़ियां सामने आईं तो संवाद की बजाय दबाव की नीति अपनाई गई।

सीजेपी आंदोलन ने साबित कर दिया कि जेन-जी अब चुप नहीं बैठेगी। उन्होंने सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक अपनी ताकत दिखाई। सरकार को झुकना पड़ा। मंत्री का इस्तीफा हुआ। अब अचानक मोहन भागवत मुंबई में दो हजार चुने हुए युवाओं से बात कर रहे हैं। आलोचक कह रहे हैं कि यह असली आंदोलनकारियों से मिलने की बजाय नियंत्रित माहौल में संवाद है। अंबानी सेंटर जैसे जगह पर आयोजित कार्यक्रम में वे युवा शामिल हैं जो शायद पहले से ही संगठित माहौल से जुड़े हों।

आरएसएस का यह कदम युवाओं को अपने खेमे में खींचने की कोशिश लगता है। भागवत कह रहे हैं कि नेतृत्व सिर्फ राह दिखाना नहीं, सुनना भी है। लेकिन सवाल यह है कि जब युवा सड़क पर थे तब क्यों नहीं सुना गया। पुलिस की लाठियां भाजपा सरकार के राज में चलीं। दिल्ली पुलिस केंद्र के अधीन है। युवाओं को कोकरोच कहने वाले बयान और फिर आंदोलन को दबाने की कोशिश ने नाराजगी बढ़ाई। अब अचानक स्नेह और संवाद की बात हो रही है। यह बदलाव युवाओं की ताकत का नतीजा है, न कि आरएसएस की नई सोच का।

युवा पीढ़ी आज सवाल पूछती है। वे सिर्फ भाषण नहीं सुनना चाहते। वे परीक्षा की निष्पक्षता, नौकरियों के अवसर और भविष्य की सुरक्षा चाहते हैं। आरएसएस और भाजपा ने सालों तक युवाओं को राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मुद्दों से जोड़ने की कोशिश की। लेकिन रोजमर्रा की समस्याओं पर ध्यान कम रहा। नीट लीक जैसे घोटाले बार-बार दोहराए गए। फिर भी सिस्टम नहीं बदला। जब युवाओं ने एकजुट होकर आवाज उठाई तो पहले लाठियां, फिर बातचीत। यह तरीका विश्वास नहीं जगाता।

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