मोदी से आगे निकले राहुल, लोकप्रियता से बौखलाए भाजपाई

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकप्रियता दिन बा दिन बढ़ती जा रही है। भाजपा राज में मोदी के आगे जहां कहा जाता था कि कोई टिक नहीं सकता।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकप्रियता दिन बा दिन बढ़ती जा रही है। भाजपा राज में मोदी के आगे जहां कहा जाता था कि कोई टिक नहीं सकता।

लेकिन अब पीएम मोदी के सामने विपक्ष का एक ऐसा चेहरा राहुल के रूप में आया जिससे भाजपाइयों में खलबली सी मच गई है। आगामी चुनाव को लेकर विपक्ष की तैयारियों जोरों पर हैं। ऐसे में सियासी बयानबाजी तेज हो गई। इसी बीच शिव सेना UBT नेता संजय राउत ने एक ऐसा बयान दिया है जिससे मोदी महकमे में खलबली सी मच गई है।

दरअसल राज्यसभा सांसद संजय राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर बड़ा दावा किया है. राज्यसभा सांसद ने कहा कि ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ पर कितना भी मंथन करें, कितना भी चिंतन करें, लेकिन 2029 में ये लोग यानी NDA सत्ता में नहीं आएंगे. राहुल गांधी बहुत आगे निकल चुके हैं, बहुत आगे. देश के अनडिस्प्यूटेड लीडर बन गए हैं. 2012 में जिस स्थान पर पीएम मोदी थे, उस स्थान पर आज राहुल गांधी हैं.

इसके साथ ही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बयान पर भी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव ने ऐसा कुछ नहीं कहा. यहां कानून है, हर स्टेट में कानून है, स्थानीय भाषा आनी चाहिए. यही अखिलेश ने कहा है ना, लेकिन ये कानून सबके लिए होना चाहिए. यहां जो कॉर्पोरेट में काम करेंगे बड़े-बड़े पदों पर, ऑफिस में, वो क्यों नहीं मराठी बोलते?

उनको भी मराठी आनी चाहिए, उनके ऊपर भी मराठी की सख्ती होनी चाहिए. हर राज्य में, वहां की लोकल भाषा लोगों को अभिमान से और स्वाभिमान से बोलनी चाहिए. लेकिन संजय राउत का राहुल गांधी को लेकर दिया गया बयान चर्चा में बना हुआ है।

संजय राउत का यह बयान विपक्षी खेमे की उस सोच को दर्शाता है जिसमें वे मानते हैं कि देश की राजनीति में हवा बदल रही है। राउत लंबे समय से उद्धव ठाकरे गुट की तरफ से सक्रिय हैं और अक्सर सरकार पर तीखे हमले करते रहे हैं। उनका कहना है कि वन नेशन वन इलेक्शन जैसे मुद्दे पर सरकार जितना जोर दे, असलियत यह है कि जनता का मूड बदल चुका है।

वे राहुल गांधी को अब वह नेता बता रहे हैं जो देशभर में लोगों से जुड़ रहे हैं, मुद्दों पर बोल रहे हैं और विपक्ष को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं। 2012 का जिक्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और धीरे-धीरे राष्ट्रीय मंच पर उभर रहे थे। राउत के मुताबिक आज राहुल गांधी भी उसी तरह की स्थिति में हैं—लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में सक्रिय, यात्राएं कर रहे और विपक्षी दलों के बीच अपनी जगह मजबूत कर रहे हैं।

इस बयान को समझने के लिए थोड़ा पीछे मुड़ना जरूरी है। 2014 और 2019 के चुनावों में भाजपा को बड़ी जीत मिली थी। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बहुत ऊंची थी। कई सर्वे और नतीजे दिखाते थे कि वे देश के सबसे स्वीकार्य चेहरे थे। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला। एनडीए के सहयोग से सरकार बनी।

विपक्ष ने इसे अपनी सफलता माना। उसके बाद से राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेता लगातार यह दावा कर रहे हैं कि सत्ताधारी दल दबाव में हैं। संजय राउत भी इसी लाइन पर बोल रहे हैं। वे कह रहे हैं कि चाहे सरकार एक साथ चुनाव कराने की योजना कितनी भी आगे बढ़ाए, असल फैसला जनता करेगी और उसमें राहुल गांधी आगे हैं।

वहीं वन नेशन वन इलेक्शन का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। सरकार का कहना है कि इससे खर्च बचेगा, विकास काम रुकेंगे नहीं और प्रशासनिक सुविधा बढ़ेगी। कई समितियां बनीं, रिपोर्ट आईं। लेकिन विपक्ष इसे सत्ता को और मजबूत करने का तरीका बताता है।

संजय राउत जैसे नेता इसे एक व्यक्ति या एक पार्टी की ताकत बढ़ाने वाला कदम मानते हैं। उनका तर्क है कि भारत विविधता वाला देश है। अलग-अलग राज्यों की अपनी समस्याएं हैं। एक साथ चुनाव कराने से क्षेत्रीय दलों और स्थानीय मुद्दों का असर कम हो सकता है। राउत का बयान इसी आलोचना का हिस्सा है। वे कह रहे हैं कि चाहे यह योजना लागू हो या न हो, 2029 में सत्ता बदल जाएगी।

राहुल गांधी को लेकर राउत का दावा भी गौर करने लायक है। कुछ साल पहले राहुल गांधी पर ‘पप्पू’ जैसे हमले आम थे। कई लोग उन्हें गंभीर नेता नहीं मानते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा निकाली, संसद में सक्रिय रहे और कई मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछे। विपक्षी दलों के बीच वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं।

संजय राउत जैसे सहयोगी दल के नेता उन्हें अब निर्विवाद नेता बता रहे हैं। इसका मतलब है कि कम से कम विपक्षी खेमे में राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ी है। राउत का कहना है कि 2012 में मोदी जिस तरह गुजरात से राष्ट्रीय स्तर पर उभर रहे थे, आज राहुल गांधी उसी रास्ते पर हैं।हालांकि राजनीतिक बयानबाजी में ऐसे दावे अक्सर सुनाई देते हैं। हर पार्टी अपने नेता को सबसे आगे बताती है।

भाजपा की तरफ से ऐसे बयानों का जवाब आमतौर पर यह होता है कि विपक्ष हताश है और जनता अभी भी मोदी सरकार के कामों से संतुष्ट है। सरकार बुनियादी ढांचे, डिजिटल सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं और विदेश नीति में अपनी उपलब्धियां गिनाती है। वे कहते हैं कि 2024 में भी एनडीए सरकार बनी और आगे भी जनता उन्हें मौका देगी। संजय राउत के बयान को वे विपक्ष की हताशा या चुनावी रणनीति का हिस्सा बता सकते हैं।

लेकिन संजय राउत का बयान भले ही विपक्षी खेमे में पॉजिटिव वे में लिया जा रहा हो लेकिन मोदी मंडली में इस बयान को लेकर खलबली सी मच गई है। एक के बाद एक बयान सामने आ रहे हैं। इससे पहले राहुल गांधी ने पुणे में जो छात्रों की गूंज कार्यक्रम किया। उसमे भाजपा को जमकर लताड़ा उसे लेकर ही NDA नेताओं की बयानबाजी शुरू है। इसी बीच शिवसेना नेता संजय निरुपम ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी।

गौरतलब है कि भाजपाइयों की नींद राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता से उड़ी हुई है। इसका असर आगामी चुनाव में भी देखने को मिलेगा। सच यह है कि 2029 अभी तीन साल दूर है। राजनीति में बहुत कुछ बदल सकता है। आर्थिक हालात, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, युवाओं के मुद्दे—ये सब चुनाव तय करेंगे। राहुल गांधी अगर वाकई आगे निकल रहे हैं तो उन्हें संगठनात्मक मजबूती, गठबंधन की एकजुटता और ठोस वैकल्पिक नीतियां दिखानी होंगी।

संजय राउत का बयान विपक्ष के अंदर के उत्साह को दिखाता है। वे राहुल गांधी को आगे रखकर 2029 की तैयारी का संदेश दे रहे हैं। साथ ही मौजूदा सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी योजनाएं कितनी भी हो, जनता का फैसला अलग हो सकता है। इस पूरे मामले में एक बात साफ है कि भारतीय राजनीति में चेहरे और नेतृत्व की भूमिका बहुत बड़ी है। 2014 में मोदी लहर थी। अब विपक्ष राहुल गांधी को वैसा ही विकल्प बनाने की कोशिश में है।

संजय राउत जैसे विपक्षी नेता बार-बार यह दोहरा रहे हैं कि समय बदल रहा है। उनका कहना है कि मोदी सरकार के लंबे शासन के बाद लोग बदलाव चाहते हैं। चाहे वन नेशन वन इलेक्शन हो या कोई और मुद्दा, अंतिम फैसला मतदाता करेंगे। राउत का दावा है कि वह फैसला राहुल गांधी के पक्ष में जाएगा।

वहीं सियासी पंडित ऐसे बयानों को चुनावी रणनीति का हिस्सा मानते हैं। विपक्ष एकजुट रहने और एक चेहरा पेश करने की जरूरत महसूस कर रहा है। राउत पहले भी कह चुके हैं कि 2029 के लिए प्रधानमंत्री पद का चेहरा पहले से तय होना चाहिए। उनका ताजा बयान उसी दिशा में है।

वे राहुल गांधी को उस जगह पर बैठा रहे हैं जहां कभी मोदी थे—यानी उभरते राष्ट्रीय नेता के रूप में। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आगामी चुनाव काफी रोमांचक होने वाला है। अब देखना ये होगा कि किसकी लोकप्रियता किसपर कितनी भारी पड़ती है।

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