धरती ही नहीं समंदर में भी आग, प्रदूषण की वजह से गर्मी ने अगस्त में बनाया नया रिकॉर्ड
महासागरों की गर्मी में यह बढ़ोतरी तेजी से विकसित हो रहे 'अल नीनो' की वजह से और तेज होती जा रही है. नए अल नीनो की वजह से ही भारत में इस साल मानसून की बारिश कम हो रही है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महासागरों की गर्मी में यह बढ़ोतरी तेजी से विकसित हो रहे ‘अल नीनो’ की वजह से और तेज होती जा रही है. नए अल नीनो की वजह से ही भारत में इस साल मानसून की बारिश कम हो रही है.
दुनिया की आबोहवा तेजी से बदल रही है. प्रदूषण कम होने का नाम नहीं ले रहा है. गर्मी का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है. दुनिया के कई देशों में भीषण गर्मी बड़ी समस्या बनी हुई है. धरती तो धरती अब समुद्र भी गर्म होने लगे हैं. दुनिया के महासागरों के अंदर भीषण गर्मी का पिछले सारे रिकॉर्ड टूट गए हैं. ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले हफ्ते शनिवार को महासागरों का तापमान पहले के दर्ज किए गए तापमान से कहीं अधिक था.
महासागर के सतह का औसत तापमान शनिवार को 21.1°C दर्ज किया गया था. जबकि 1 मार्च 2024 को यह तापमान 21.09°C था. इसी तरह 1991 से साल 2020 तक यहां का तापमान औसत ही रहा. समुद्र के नीचे बढ़ती गर्मी जलवायु संकट का एक बड़ा संकेत माना जा रहा है. जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) जलाने से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड की वजह से जो गर्मी जमा होती है, उसका 90 फीसदी से अधिक हिस्सा महासागरों में चला जाता है.
जलस्तर में बढ़ोतरी और तूफानों का खतरा बढ़ा
वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि गर्म महासागर समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी और भयंकर तूफानों के मामले को और गंभीर बनाते हैं, जिनसे अरबों लोगों की जिंदगी खतरे में है. साथ ही, ये समुद्री हीटवेव भी पैदा करते हैं जो समुद्री जीवन को खत्म कर देते हैं, और तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों की आजीविका को खासा नुकसान भी पहुंचाते हैं.
अब उत्तरी गोलार्ध की ओर देखें तो गर्मियों के दौरान यूरोप और उत्तरी अमेरिका में रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी, सूखा और जंगल की भीषण आग के कई मामले सामने आए हैं, जबकि इसके उलट एशिया को भारी बारिश और तूफान का सामना करना पड़ा.
अल नीनो की वजह से स्थिति खराब होती जा रही
महासागरों की गर्मी में यह बढ़ोतरी तेजी से विकसित हो रहे ‘अल नीनो’ (El Niño) की वजह से और तेज होती जा रही है. माना जा रहा है कि यह संभवतः कम से कम एक सदी में सबसे गर्म अल नीनो होगा. अल नीनो प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन हैं जो दुनिया में तापमान बढ़ाते हैं और मौसम के पैटर्न को भी बदल देते हैं , जिसका असर दुनिया में हर जगह देखने को मिल रहा है.
नए अल नीनो की वजह से भारत में इस साल मानसून की बारिश कम हो रही है, इंडोनेशिया में जंगल की आग की कई बड़ी घटनाएं हुई हैं और ऑस्ट्रेलिया में आग का खतरा बढ़ गया है.
3 दशकों में हीटवेव में 3 गुना की बढ़ोतरी
अब अगस्त में महासागरों की गर्मी का नया रिकॉर्ड बन गया है. यह नया रिकॉर्ड इस मायने में खास है क्योंकि आम तौर पर दुनिया में समुद्र का तापमान मार्च और अप्रैल में, यानी दक्षिणी गोलार्ध की गर्मियों के बाद, सबसे अधिक होता है. उत्तरी गोलार्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्ध में समुद्र का दायरा काफी बड़ा है.
यूरोपीय संघ की ‘कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस’ (C3S) की डॉक्टर सामंथा बर्गेस का कहना है कि “यह रिकॉर्ड इस बात का एक और स्पष्ट संकेत है कि महासागर बढ़ते दबाव का सामना कर रहे हैं.” C3S ने ही ये नए आंकड़े तैयार किए हैं. उन्होंने कहा, “अल नीनो की वजह से गर्मी बढ़ती जा रही है, लेकिन यह इंसानों की वजह से दशकों से हो रही ग्लोबल वार्मिंग के ऊपर हो रहा है. इसके नतीजे पहले से ही दिख रहे हैं क्योंकि 1990 के दशक की शुरुआत से दुनिया भर में समुद्री हीटवेव वाले दिनों की संख्या 3 गुना से अधिक हो गई है.”
गर्म होते महासागरों की वजह से पानी के थर्मल एक्सपेंसन से समुद्र का जलस्तर बढ़ता है, और इस वजह से तटीय समुदायों और कम ऊंचाई वाले द्वीपीय देशों के लिए बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है. समुद्र का अधिक तापमान मौसम से जुड़ी चरम घटनाओं को और भी खतरनाक बना देते हैं, क्योंकि गर्म समुद्र वातावरण में अधिक ऊर्जा और जलवाष्प भेजते हैं, जिससे बारिश और तूफान तेज होते जाते हैं.
समुद्र के तापमान को कम करने के लिए क्या करें?
जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) जलाने और जंगलों के विनाश से निकलने वाली अधिकतर CO2 (जो धरती को गर्म करती है) महासागरों में समाहित हो जाती है. जबकि, गर्म महासागर CO2 को सोखने में कम कुशल होते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे ग्लोबल वार्मिंग को लेकर धरती के सबसे अहम प्राकृतिक बचाव तंत्रों में से एक कमजोर हो रहा है.
‘कैंपेन फॉर नेचर’ के डायरेक्टर ब्रायन ओ’डोनेल ने कहा, “समुद्र के तापमान में हो रही इस रिकॉर्ड बढ़ोतरी से निपटने के लिए 2 अहम कदम उठाए जाने चाहिए. जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन को तेजी से कम करना होगा. साथ ही, देशों के लिए समुद्री और कोस्टल इकोसिस्टम की सुरक्षा करना भी जरूरी है. केल्प बेड (Kelp beds), मैंग्रोव और दलदली इलाके कार्बन को सोखते हैं, और कोरल रीफ तूफानों से बचाते हैं और जीवों को रहने की जगह देते हैं.”
उन्होंने यह भी कहा, “190 से अधिक सरकारों ने साल 2030 तक धरती के कम से कम 30% हिस्से की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण का वादा किया है, और अब समय आ गया है कि इस वादे को जमीनी स्तर पर असरदार और लंबे समय तक चलने वाले संरक्षण में बदला जाए.”
C3S का यह डेटा ध्रुवीय इलाकों (polar regions) के बाहर के महासागरों के बारे में है. आर्कटिक धरती का सबसे तेजा से गर्म होने वाला इलाका है. ये रिकॉर्ड 1979 से मौजूद हैं, जब सैटेलाइट से सबसे अच्छी क्वालिटी का डेटा मिलना शुरू हुआ था.



