वादा खिलाफ सरकार पर फिर होगा करारा प्रहार
5 सितम्बर को लौट रहा है सीजेपी का आंदोलन

- पहले आंदोलन ने लिया था मंत्री का इस्तीफा, अबकी बार सरकार के सामने फिर वही सवाल
- वादे किये थे या फिर सिर्फ आंदोलन को खत्म कराने का इंतजाम?
- सरकार जी, जो वादा किया है उसे निभाना पड़ेगा
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली एक बार फिर तैयार हो रही है एक और आंदोलन के लिए क्योंकि इंडिया गेट से नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय की तरफ बढ़ते कदमों की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सड़क पर उतरने वाले लोग पहली बार अपनी ताकत आजमाने नहीं आ रहे है।
यह वही आंदोलनकारी हैं जिनके पिछले आंदोलन के बाद सरकार के एक मंत्री को अपनी कुर्सी छोडऩी पड़ी थी। यह वही सीजेपी है जिसने नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर मंतर को आंदोलन का मैदान बनाया था और युवाओं के गुस्से को राष्ट्रीय बहस में बदला और सरकार पर ऐसा दबाव बनाया कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना इस्तीफा देना पड़ा। आंदोलन खत्म होने के बाद जो सवाल बचे थे वह एक बार फिर सरकार के दरवाजे पर दस्तक दे रहे है कि सरकार की ओर से सीजेपी की जो अन्य मांगे थी और सरकार ने उन्हें पूरा करने का विश्वास दिलाया था उन वायदों का क्या हुआ?
मोदी सरकार में पहली बार इस्तीफा हुआ इसलिए दूसरी चेतावनी को हल्के में लेना जोखिम होगा
दिल्ली में हुए सीजेपी के आदोंलन का दबाव अभी भी दिल्ली की सड़कों पर साफ दिखायी दे रहा है। आंदोलन के बाद सीजेपी एक कदम आगे बड़ी है और वह स्कूलों के निरिक्षिण तक पहुंची है। इसलिए सरकार का किसी को भी सीजेपी के इस प्रस्तावित आंदोलन को हल्के में नहीं लेना चाहिए। हालांकि सरकार यह तर्क दे सकती है कि एक मांग पूरी हो चुकी है कार्रवाई की जा रही है और बाकी मुद्दों पर प्रक्रिया चल रही है। लेकिन आंदोलनकारी दूसरी कहानी सुना रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार ने आंदोलन समाप्त कराने के लिए आश्वासन तो दिए मगर अब उन आश्वासनों को पूरा करने में देरी हो रही है। यहीं से वादाखिलाफ सरकार का नारा राजनीतिक हथियार बन सकता है। क्योंकि विपक्ष को अगर यह मुद्दा मिल गया तो वह इसे सिर्फ सीजेपी और सरकार के बीच के विवाद के रूप में नहीं देखेगा। सवाल बड़ा बनाया जाएगा क्या सरकार आंदोलन खत्म होते ही अपने वादे भूल जाती है? क्या छात्रों को सिर्फ तब सुना जाता है जब वह हजारों की संख्या में दिल्ली की सड़कों पर उतरते हैं?
न मुआवजा मिला, न एफआईआर हुई वापस
आंदोलन स्थगित करना और आंदोलन खत्म होना दोनों एक बात नहीं होतीं। आंदोलनकारी जब किसी सरकार के आश्वासन पर सड़क खाली करते हैं तो वह सिर्फ अपने घर नहीं लौटते वह सरकार के खाते में अपना भरोसा जमा कर देते हैं। अब सीजेपी का आरोप है कि सरकार उस भरोसे की कीमत चुकाने में नाकाम रही है। संगठन की मांगों में नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक करोड़ रुपये का मुआवजा देने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को पूरी तरह वापस लेने जैसी मांगें शामिल हैं। सीजेपी का कहना है कि एक महीने बीत जाने के बाद भी इन मुद्दों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यही वजह है कि संगठन ने अपनी कार्यसमिति की ऑनलाइन बैठक में आंदोलन की वापसी पर चर्चा की और 5 सितम्बर से फिर सड़क पर उतरने का ऐलान कर दिया।
ज्यादा विस्फोटक हो सकता है प्रस्तावित आंदोलन
यही वह सवाल है जो इस बार के आंदोलन को पिछले आंदोलन से अलग और ज्यादा विस्फोटक बना सकता है। पहली बार लोग न्याय और कार्रवाई की मांग लेकर सड़क पर उतरे थे लेकिन इस बार का ममाल दूसरा बन रहा है। सीजेपी के हाथ में एक नया हथियार है कि हमने भरोसा किया सरकार ने वादा किया और फिर वादा पूरा नहीं हुआ। राजनीति में नाराजगी को संभालना मुश्किल होता है लेकिन टूटे हुए भरोसे की राजनीति उससे भी ज्यादा खतरनाक होती है। क्योंकि गुस्सा कई बार बातचीत से शांत हो जाता है लेकिन विश्वासघात का एहसास आंदोलन को और गहरा कर देता है।
इस बार आंदोलन में सिर्फ छात्र नहीं, सवाल लेकर आएंगे परिवार
5 सितम्बर का प्रस्तावित मार्च राजनीतिक रूप से और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। सीजेपी के सह संयोजक सौरव दास के मुताबिक मार्च का नेतृत्व उन छात्रों के परिवार करेंगे जिन्होंने नीट से जुड़े मामलों में अपने बच्चों को खोया है और उन लोगों के परिवार भी इसमें शामिल होंगे जो पुलिस कार्रवाई के दौरान कथित बर्बरता के शिकार हुए। यानी इस बार आंदोलन की तस्वीर सिर्फ नारे लगाते छात्रों की नहीं होगी। मंच पर अगर पीडि़त परिवार आते हैं तो आंदोलन का भावनात्मक तापमान बदल जाएगा। सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती सिर्फ भीड़ की संख्या नहीं होती। असली चुनौती तब पैदा होती है जब भीड़ के बीच ऐसी कहानियां खड़ी हो जाती हैं जिनका जवाब प्रेस कॉन्फ्रें स से नहीं दिया जा सकता। युवा बेरोजगारी पर नारे लगा सकता है छात्र पेपर लीक पर सवाल पूछ सकता है लेकिन एक ऐसा परिवार जिसने अपना बच्चा खोया हो वह जब सरकार से जवाब मांगता है तो मामला राजनीतिक बहस से निकलकर संवेदनशील जनभावना में बदल जाता है। सीजेपी शायद इसी नैरेटिव को आंदोलन का केंद्र बनाने की तैयारी कर रहा है।
सीजेपी की चेतावनी
सीजेपी ने साफ चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने अपने आश्वासनों को जमीन पर नहीं उतारा तो 5 सितम्बर से स्थगित आंदोलन एक बार फिर शुरू हो जाएगा जिसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी। पार्टी की ओर से कहा गया है कि बार मामला सिर्फ नीट पेपर लीक का नहीं होगा सिर्फ परीक्षा व्यवस्था की नाकामी का नहीं होगा बल्कि आंदोलन का पूरा नैरेटिव सरकार की वादा खिलाफी के इर्दगिर्द खड़ा किया जा रहा है। सीजेपी का आरोप है कि आंदोलन समाप्त कराने के दौरान सरकार की तरफ से जो भरोसा दिलाया गया था उसका एक महीने बाद भी कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में सवाल यह है कि क्या सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत समस्या का समाधान करने के लिए की थी या फिर सिर्फ सड़कों पर उमड़े गुस्से को कुछ समय के लिए शांत करने के लिए?
विपक्ष को नैरेटिव और सोशल मीडिया को मिलेंगे वीडियो
आज की राजनीति में आंदोलन सिर्फ सड़क पर नहीं चलता। सड़क पर एक लाठी चलती है तो उसका वीडियो मिनटों में लाखों मोबाइल तक पहुंचता है। एक मां कैमरे के सामने अपने बच्चे के लिए न्याय मांगती है तो वह क्लिप पूरे राजनीतिक विमर्श को बदल सकती है। एक छात्र हिरासत में लिया जाता है तो हैशटैग बनता है। और फिर सरकार को सिर्फ जंतर मंतर या इंडिया गेट नहीं मोबाइल स्क्रीन पर भी जवाब देना पड़ता है। सीजेपी ने अपनी कार्यसमिति की बैठक के बाद जो संकेत दिया है उसका राजनीतिक अर्थ सीधा है हमने आंदोलन रोका था खत्म नहीं किया था। संगठन का कहना है कि उसने सरकार के आश्वासन और सद्भावना के आधार पर आंदोलन स्थगित किया था। लेकिन अगर वायदे पूरे नहीं हुए तो अब धैर्य को कमजोरी समझने की भूल न की जाए।यह भाषा आंदोलन की वापसी का सिर्फ ऐलान नहीं है बल्कि सरकार को चेतावनी भी है। सीजेपी के सामने अब अपनी विश्वसनीयता बचाने की भी चुनौती है। अगर संगठन बार बार आंदोलन की चेतावनी देकर पीछे हटता है तो उसका प्रभाव कम होगा। लेकिन अगर वह 5 सितम्बर को बड़ी ताकत के साथ दिल्ली में उतरता है तो पिछले आंदोलन की सफलता उसके लिए सबसे बड़ा प्रचार बन सकती है।




