छात्र मलबे में, पत्रकार थाने में यही है वर्ल्ड क्लास दिल्ली

  • दिल्ली विवि के साउथ कैंपस में पीजी हास्टल की बिल्डिंग गिरी, 6 की मौत
  • कुछ दिनों पहले छात्रों के आंदोलन में इन्ही समस्याओं पर तो ध्यान देने की मांग की गयी थी
  • सरकार ने छात्रों को बता दिया था अपराधी, 4PM के सवाल पूछने पर पत्रकारों को पुलिस उठा ले गयी थाने
  • क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ मलबा हटाने और एफआईआर दर्ज करने तक है 

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली को वल्र्ड क्लास बनाने का शोर है विकास के दावे हैं चमकती राजधानी के सपने हैं और सरकार के पास उपलब्धियों की लंबी फेहरिस्त है। लेकिन इन तमाम दावों के बीच दक्षिणी दिल्ली का सत्य निकेतन सरकारी विकास माडल का वह सच बनकर सामने खड़ा है जिसे किसी विज्ञापन के होर्डिंग से ढका नहीं जा सकता।
पांच मंजिल की इमारत भरभराकर गिरती है मलबे में दबकर छह लोगों की मौत हो जाती है 11 लोग घायल होकर अस्पताल पहुंचते हैं और कई लोगों के अभी भी मलबे में दबे होने की आशंका बनी रहती है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि इमारत क्यों गिरी सवाल यह है कि दिल्ली को वल्र्ड क्लास बनाने वाली सरकार की नजर इस इमारत पर उसके गिरने से पहले क्यों नहीं पड़ी? करीब 40-50 साल पुरानी इमारत छात्रों के पीजी के तौर पर इस्तेमाल हो रही थी। तहखाने में मरम्मत का काम चल रहा था। बारिश को हादसे की वजहों में से एक माना जा रहा है। अब मजिस्ट्रेट जांच होगी मालिक के खिलाफ एफआईआर होगी दोषियों को कड़ी सजा देने का ऐलान होगा। यानी हादसा हो चुका है छह जिंदगियां जा चुकी हैं और अब सरकारी मशीनरी जाग गई है लेकिन दिल्ली पूछ रही है कि सरकार की निगरानी व्यवस्था हादसे के बाद ही क्यों जागती है?

घरों में मातम और जांच के आदेश

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मौके पर पहुंचकर जांच और कार्रवाई के आदेश दे दिए हैं। यह जरूरी भी है। लेकिन असली सवाल उस कार्रवाई के बाद शुरू होता है। अगर नियम कानून नगर निगम प्रशासन और निगरानी का पूरा तंत्र मौजूद था तो फिर एक ऐसी इमारत छात्रों के रहने के लिए कैसे चलती रही जिसके ढहने के बाद छह परिवारों के घरों में मातम है। क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ मलबा हटाने और एफआईआर दर्ज करने तक है या उन खतरनाक इमारतों को पहले पहचानना भी उसकी जिम्मेदारी है जिनमें दिल्ली के हजारों छात्र और आम नागरिक अपनी जान जोखिम में डालकर रह रहे हैं?

सिर्फ इमारत का मलबा नहीं है विकास के दावों का मलबा है यह

सत्य निकेतन का मलबा इसलिए सिर्फ एक इमारत का मलबा नहीं है। यह दिल्ली के विकास के उन दावों पर पड़ा मलबा है जिसके नीचे सरकारी निगरानी जवाबदेही और प्राथमिकताओं के सवाल दबे हुए हैं। मोदी सरकार की राजधानी को विश्वस्तरीय बनाने की महत्वाकांक्षा हो या दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार के विकास के दावे दोनों के सामने अब एक सीधा सवाल है अगर दिल्ली वल्र्ड क्लास है तो उसके छात्रों की जिंदगी इतनी सस्ती क्यों है?

पिछले दिनों छात्रों के सवाल सड़क पर थे

सत्य निकेतन को दिल्ली की मौजूदा राजनीति से अलग करके देखना भी मुश्किल है। पिछले दिनों छात्रों के सवाल सड़क पर थे। छात्र अपनी समस्याओं और सुरक्षा को लेकर आंदोलन कर रहे थे। दूसरी तरफ सरकार के सामने पत्रकार सवाल लेकर खड़े थे। लेकिन इन दोनों घटनाओं में एक विचित्र समानता दिखाई देती है सवाल सामने आते ही समाधान की जगह पुलिस और प्रशासन का पहरा नजर आता है। छात्र पूछते हैं तो आंदोलन और हिरासत की खबरें आती हैं पत्रकार सवाल करते हैं तो उनके पुलिस कार्रवाई और उत्पीडऩ के आरोप सामने आते हैं। लोकतंत्र में सवालों का जवाब सत्ता देगी या वर्दी?

जनता जांच नहीं कार्रवाई चाहती है

छह मौतों के बाद जांच का ऐलान जरूरी है, लेकिन जनता अब सिर्फ जांच नहीं चाहती। जनता जानना चाहती है कि वह कौन सी व्यवस्था थी जिसने हादसे से पहले आंखें बंद रखीं और हादसे के बाद कार्रवाई का चश्मा पहन लिया? यही सत्य निकेतन की असली कहानी है। सवाल यह नहीं कि इमारत कैसे गिरी। सवाल यह है कि सरकार की प्राथमिकताओं में नागरिक की जान ऊपर है या सत्ता की छवि?

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