संजय शर्मा की चिंगारी से सेंसर बोर्ड में धुआं-धुआं

- सहिया विवाद के बीच बदली गयी सेंसर बोर्ड कमेटी, फिल्मी चेहरों को मिली जगह
- संजय शर्मा के उठाये सवालों से पूरे देश में हो रही है बहस आखिर सेंसर बोर्ड में आईएएस/आईआरएस का क्या काम?
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। मुंबई का सेंसर बोर्ड अपने हिसाब से चल रहा था। कुर्सियां वही थीं चेहरे वही थे फैसलों की अपनी एक रफ्तार थी और व्यवस्था को चुनौती देने वाला कोई सामने खड़ा हो जाए यह शायद वहां के सिस्टम की आदत में नहीं था।
इसी बीच 4PM के संपादक संजय शर्मा अपनी पहली हिंदी फिल्म साहिया के रिलीज सार्टिफिकेट के लिए वहां पहुंचते हैं रिलीज सार्टिफिकेट के लिए एप्लाई करते हैं। उन्हें टाला गया, जानबूझकर देर लगायी और उनकी फिल्म को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। अपने साथ हुए अन्याय की आवाज संजय शर्मा ने उठाई और उनकी ललकार को देश दुनिया ने हाथों हाथ लिया और महौल बन गया। संजय शर्मा ने सवाल उठाया कि जब काबिल फिल्मी हस्तियां और बोर्ड में काम कर रहे अच्छे लोग मौजूद है तो फिर वहां डेप्यूटेशन पर आईएएस और आईआरएस जैसे अधिकारियों का वहां क्या काम? संजय शर्मा का यह सवाल पूरे देश का सवाल बन गया और सरकार ने अपना समय पूर कर चुकी सीबीएफसी कमेटी को उपयुक्त नामों और चेहरों के साथ बदल दिया।

छह साल बाद बदली पूरी तस्वीर
16 सितंबर की शाम केंद्र सरकार ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का पुनर्गठन कर दिया। 18 सदस्यों वाले नए बोर्ड का कार्यकाल तत्काल प्रभाव से तीन साल या अगले आदेश तक जो भी पहले हो निर्धारित किया गया है। सरकार की अधिसूचना में नए बोर्ड के सदस्यों की पूरी सूची जारी की गई। नई सूची पर नजर डालें तो तस्वीर साफ दिखाई देती है। इसमें अभिनेता पंकज त्रिपाठी, सुनील शेट्टी, प्रीति जिंटा, मनोज जोशी, रूपाली गांगुली, पल्लवी जोशी और प्रोसेनजीत चटर्जी जैसे नाम हैं। निर्देशक प्रियदर्शन, फिल्मकार अभिषेक जैन और नीला माधब पांडा, संगीतकार रिकी केज, कवि एवं लेखक यतींद्र मिश्र, थिएटर निर्देशक वामन केंद्रे, निर्माता सुप्रिया यारलागड्डा और कई अन्य लोग भी बोर्ड में शामिल किए गए हैं। यानी इस बार बोर्ड की तस्वीर केवल सरकारी फाइलों और प्रशासनिक अनुभव से नहीं बल्कि फिल्म संगीत साहित्य थिएटर और मनोरंजन की दुनिया से आने वाले चेहरों से भी बनी है। यही वह बदलाव है जिसे संजय शर्मा द्वारा उठाए गए सवालों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
संजय शर्मा के लिए यह लड़ाई सिर्फ एक फिल्म की रिलीज का मामला नहीं था
संजय शर्मा की फिल्म सहिया झारखंड के जंगलों की पृष्ठभूमि में बनी है। फिल्म में शंतनु माहेश्वरी और रिंकू राजगुरु प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म एक लव स्टोरी है जिसे सीबीएफसी स्क्रीनिंग कमेटी ने नक्सली फिल्म घोषित कर फिल्म को रद्द कर दिया था और यही सवाल निर्माता निर्देशक से आगे बढ़कर व्यवस्था का सवाल बन गया। किसी फिल्म के प्रमाणन में देरी का सीधा असर सिर्फ पर्दे पर नहीं पड़ता निर्माता की रिलीज रणनीति प्रचार अभियान थिएटर बुकिंग और आर्थिक गणित सब प्रभावित होते हैं। इसलिए प्रमाणन प्रक्रिया में समयबद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी प्रमाणन के मानदंडों की स्पष्टता। संजय शर्मा ने इसी बिंदु को सार्वजनिक बहस में रखा।
खुद को भगवान समझ बैठी थी कमेटी
फिल्म मेकर संजय शर्मा का कहना है कि मेरी फिल्म सहिया को लेकर मेरा अनुभव बिल्कुल अलग रहा। मैंने फिल्म बनाई प्रमाणन के लिए आवेदन किया तत्काल प्रक्रिया के तहत फीस भी जमा की और फिर इंतजार किया। लेकिन मेरे इंतजार का जवाब फिल्म को रद्द करने के रूप में सामने आया। मेरा सवाल सीधा था अगर फिल्म में कोई दृश्य संवाद या सामग्री नियमों के खिलाफ है तो उसे चिन्हित किया जाए उसमें बदलाव के लिए कहा जाए काटा जाए या प्रमाणन के नियमों के मुताबिक फैसला लिया जाए। लेकिन मेरी शिकायत यह रही कि पूरी फिल्म को ही खारिज कर दिया गया।
मेरा फोन बाहर रखवाया गया
फिल्म स्क्रीनिंग के दौरान मेरा फोन बाहर रखवाया गया। मेरे लिए यह अनुभव असहज करने वाला था। मैं सरकारी दफ्तरों से लेकर संवैधानिक संस्थानों तक जाता रहा हूं लेकिन फिल्म स्क्रीनिंग के दौरान फोन बाहर रखवाए जाने ने मेरे मन में सवाल खड़े किए। जब मैं अंदर पहुंचा तो वहां आयकर विभाग के अधिकारी राजेन्द्र सिंह मिले जिन्हें मैं पहले से जानता था। उन्होंने मेरी फिल्म की तारीफ की और कहा कि अगर फिल्म उत्तर प्रदेश में शूट हुई होती तो शायद तत्काल प्रमाणन मिल जाता, लेकिन झारखंड जंगल और नक्सल पृष्ठभूमि के कारण इसे रिव्यू कमेटी में भेजा जाएगा। मैं हैरान था क्योंकि मेरे अनुसार सहिया मूलत: एक प्रेम कहानी है।
कपिल सिब्बल से मिला
इसके बाद मैंने सवाल उठाए। दिल्ली जाकर कपिल सिब्बल को फिल्म दिखाई। उन्होंने फिल्म देखकर कहा कि उन्हें उसमें गलत बात नजर नहीं आती और जरूरत पड़ी तो हाईकोर्ट का रास्ता अपनाया जा सकता है। मैंने सीबीएफसी की कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने शुरू किए। वीडियो बनाए, खबरें प्रकाशित कीं और पूछा कि फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया में फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों की भूमिका ज्यादा क्यों न हो। इस पूरी लड़ाई में मैंने कई आरोप और शिकायतें सार्वजनिक कीं। कुछ बातें मेरे व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित हैं और कुछ ऐसी हैं जिन्हें मैंने मुंबई के फिल्मी सूत्रों से सुना। मसलन, फिल्मों को प्रमाणपत्र दिलाने के नाम पर पैसे के लेन-देन की चर्चाएं। इन चर्चाओं का मेरे पास कोई पुष्ट दस्तावेज नहीं है इसलिए इन्हें तथ्य की तरह पेश करना उचित नहीं होगा। मेरी मांग है शिकायतों पारदर्शी प्रक्रिया के साथ जांच हो और कार्रवाई की जाए।



