विपक्ष बोला – ज्ञानेश हटाओ, बीजेपी बोली-पद्म भूषण दिलाओ

- एक तरफ इस्तीफे की मांग, दूसरी तरफ सम्मान की सिफारिश
- सीईसी ज्ञानेश कुमार को लेकर सियासी पारा चरम पर
- वीआईपी पार्टी के मुखिया मुकेश साहनी का बयान एक खून माफ होता तो गोली मार देता
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। देश की सियासत में इन दिनों एक ऐसे किरदार का उदय हुआ है जिसके नाम के इर्द गिर्द सत्ता विपक्ष चुनाव और संविधान चारों की बहस घूम रही है। नाम है ज्ञानेश कुमार एक तरफ विपक्ष कह रहा है हटाओ तो दूसरी तरफ बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य कह रहे हैं कि कम से कम उन्हें पद्म भूषण दिलाओ।
ज्ञानेश कुमार को विपक्ष द्वारा उन्हें पद से हटाने की तैयारियों के बीच इस बयान ने सम्पूर्ण विपक्ष को चिढ़ाने का काम किया है और यहीं से कहानी में वह ट्विस्ट आता है कि जहां राजनीति का कैमरा अचानक स्लो मोशन में घूमने लगता है पर्दे पर ज्ञानेश कुमार हैं पीछे चुनाव आयोग है एक तरफ एसआईआर है दूसरी तरफ वोटर लिस्ट है सामने विपक्ष है और पीछे सत्ता पक्ष का बचाव है। इन सभी के बीच देश का मतदाता खड़ा है और पूछ रहा है कि आखिर माजरा क्या है।
क्या पद पर बने रह पाएंगे ज्ञानेश कुमार
सड़क पर विरोध संसद में प्रस्ताव और विपक्ष के नेताओं के लगातार हमले कहानी तेजी से उस मोड़ पर पहुंच रही है जहां सवाल यह नहीं रह गया कि विपक्ष ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा मांग रहा है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या ज्ञानेश कुमार इस बढ़ते राजनीतिक और संवैधानिक दबाव के बीच अपने पद पर बने रह पाएंगे? राहुल गांधी चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगातार गंभीर सवाल उठा रहे हैं। प्रियंका गांधी ने भी कार्रवाई की मांग की है। ममता बनर्जी से लेकर तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव तक विपक्षी खेमे के अलग अलग नेता चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों ने लोकतांत्रिक भरोसे को चोट पहुंचाई है।
कम से कम पदम भूषण मिलना चाहिए
कहानी सिर्फ सियासी बयानबाजी तक सीमित नहीं है। चुनाव आयोग के दो आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से आयोग के कुछ फैसलों को लेकर आपत्तियां दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हमला तेज किया है। रिपोर्टों के मुताबिक ऐसी आपत्तियां कई मौकों पर दर्ज की गई थीं। राहुल गांधी ने भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है और चुनाव प्रक्रिया तथा एसआईआर को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। इसी बीच ज्ञानेश कुमार के मेरठ और वाराणसी के प्रस्तावित कार्यक्रम भी स्थगित हो गए। गौरतलब है कि राजनीति में कहानी सिर्फ वही नहीं होती जो कही जाती है कहानी वह भी होती है जो उस बयान के बाद पैदा होती है। और समिक भट्टाचार्य का बयान इसी वजह से बड़ा हो गया है उन्होंने ज्ञानेश कुमार की चुनाव प्रबंधन और एसआईआर को लेकर तारीफ की और कहा कि उन्हें कम से कम पद्म भूषण मिलना चाहिए।
पद्म भूषण आखिर मिलता किसे है?
क्या किसी चुनाव को शांतिपूर्ण तरीके से कराने का दावा अपने आप किसी व्यक्ति को इस सम्मान का हकदार बना देता है? या फिर पद्म पुरस्कारों के लिए उपलब्धियों सार्वजनिक सेवा और लंबे प्रभाव का व्यापक मूल्यांकन होता है। सरकारी नियमों के मुताबिक पद्म पुरस्कारों में कोई कठोर एकल फॉर्मूला नहीं है। चयन समिति उपलब्धियों के साथ सार्वजनिक सेवा और एक्सीलेंस प्लस जैसे मानकों को देखती है। नामांकन की प्रक्रिया में सरकारों, मंत्रियों, सांसदों के साथ आम नागरिकों तक से सिफारिशें आ सकती हैं और अंतिम चयन निर्धारित प्रक्रिया से होता है। तो फिर इस वक्त असली सवाल सिर्फ यह नहीं कि ज्ञानेश कुमार को पद्म भूषण मिलेगा या नहीं। असली सवाल यह है कि एक ही व्यक्ति को लेकर देश की राजनीति में दो बिल्कुल विपरीत पटकथाएं क्यों लिखी जा रही है। बीजेपी का बंगाल नेतृत्व कह रहा है सम्मान दो और देश के प्रमुख सियासी दल उन्हें पद से बर्खस्त किये जाने तक की मांग कर रहे हैं।
एक खून माफ होता तो गोली मार देता
सियासत में विरोध की भाषा तीखी हो सकती है आरोप गंभीर हो सकते हैं और सत्ता के खिलाफ गुस्सा भी खुलकर जाहिर किया जा सकता है। लेकिन जब बात गोली मारने तक पहुंच जाए तो बहस अचानक दूसरे मोड़ पर चली जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी ने पटना में ऐसा ही बयान दिया। सहनी ने कहा कि अगर उन्हें एक हत्या माफ होने की छूट मिल जाए तो वे सबसे पहले ज्ञानेश कुमार को गोली मार देंगे। उन्होंने अपने बयान में चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि संविधान के साथ खिलवाड़ हो रहा है। सहनी का हमला यहीं नहीं रुका। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में ज्ञानेश कुमार बचेंगे नहीं और 2029 में राहुल गांधी के नेतृत्व में सरकार बनने पर उनका जेल जाना पक्का है।




