सपा राज्यसभा उम्मीदवार धनराज नथवानी ने सभी को चौकाया

आखिर कौन सा खेल चल रहा है राजनीति में

राज्सभा उम्मीदवारों में सपा की तरफ से कोई मुस्लिम चेहरा न होने से निराशा!
सपा का दांव अनुभवी राम गोपाल के साथ जेन जी कनेक्ट चेहरे के तौर पर धनराज नथवानी को बनाया उम्मीदवार
सलीम शेरवानी समेत कई नाम चर्चा में थे लेकिन अखिलेश यादव ने कॉरपोरेट पृष्ठभूमि वाले धनराज नथवानी को उतारकर नई बहस छेड़ दी
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। समाजवादी पार्टी से आज राज्यसभा प्रत्याशी के तौर पर प्रोफेसर रामगोपाल यादव और धनराज नथवानी ने अपना नामांकन पर्चा भरा। धनराज नथवानी झारखंड में एनडीए से राज्यसभा सांसद परिमल नथवानी के बेटे हैं और वह रिलायंस न्यू एनर्जी लिमिटेड के निदेशक भी हैं। नथवानी परिवार अंबानी परिवार और पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का करीबी माना जाता है।
यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी ने प्रो. रामगोपाल यादव के साथ धनराज परिमल नथवानी को प्रत्याशी घोषित कर चौंका दिया है। रामगोपाल यादव पार्टी की वैचारिक और संगठनात्मक निरंतरता का चेहरा हैं जबकि धनराज नथवानी की पहचान राजनीति के पारंपरिक दायरे से बाहर कारोबारी क्षेत्र से जुड़ी है। क्योकि वह उद्योगपति और राज्यसभा सदस्य परिमल नथवानी के बेटे हैं। समाजवादी पार्टी के इस राजनीतिक मूव को अलग अलग तरीके से देखा जा रहा है।
द्द अखिलेश का नथवानी दांव जेन जी कनेक्ट और अर्थव्यवस्था की समझ : समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस बार सिर्फ एक उम्मीदवार का चयन नही किया है। बल्कि उन्होंने सपा की राजनीति को बोर्डरूम से लेकर स्टेडियम और नई पीढ़ी के सपनों तक पहुंचाने की कोशिश की है। क्योंकि सपा की राजनीति को अब सिर्फ पुराने समाजवादी चेहरों के चश्मे से देखने का वक्त शायद निकल चुका है। बदलते भारत में राजनीति भी बदल रही है और इसी बदलाव की झलक अखिलेश यादव के उस फैसले में दिखाई देती है जिसमें उन्होंने धनराज परिमल नथवानी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है। यह नाम इसलिए खास है क्योंकि नथवानी की पहचान सिर्फ राजनीति से नहीं है। उनके पास कॉरपोरेट दुनिया का अनुभव है खेल से जुड़ाव है और नई अर्थव्यवस्था की समझ है। यानी सपा के पास संसद में अब ऐसा चेहरा होगा जो राजनीतिक भाषणों के साथ बोर्डरूम और बिजनेस की भाषा भी समझता है।

लंबे समय से रिलायंस से जुड़ा है परिवार

धनराज नथवानी के पिता परिमल नथवानी लंबे समय से रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े रहे हैं और राज्यसभा सदस्य भी रहे हैं। उनका राजनीतिक सफर स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर झारखंड से राज्यसभा तक पहुंचने और बाद में आंध्र प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनने से जुड़ा है। मुस्लिम चेहरे की चर्चा के बीच नथवानी का चयन इसी सवाल को और बड़ा करता है। क्या यह केवल एक व्यक्ति का चयन है या समाजवादी पार्टी के राजनीतिक विस्तार की दिशा में कोई संकेत? इसका जवाब आने वाले दिनों में पार्टी के फैसलों और नथवानी की भूमिका से ज्यादा साफ होगा। फिलहाल इतना तय है कि जिस सीट के लिए नामों की चर्चा में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का सवाल था वहां अंतिम पर्चे पर कॉरपोरेट जगत से आए धनराज नथवानी का नाम है।

खेल प्रशासन से जुड़ाव भी नथवानी को अलग दर्जा देता है

धनराज नथवानी रिलायंस समूह से जुड़े रहे हैं और रिलायंस न्यू एनर्जी लिमिटेड में निदेशक की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनकी प्रोफाइल में इंटरनेशनल बिजनेस की पढ़ाई और कॉरपोरेट लॉ तथा पब्लिक रिलेशंस का अनुभव दर्ज है। आज जब देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है नई ऊर्जा, तकनीक, निवेश और रोजगार राजनीति के बड़े मुद्दे बन चुके हैं तब इन क्षेत्रों को करीब से समझने वाला व्यक्ति संसद में अलग तरह की आवाज बन सकता है। और नथवानी की कहानी सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं है। खेल प्रशासन से उनका जुड़ाव भी उन्हें युवाओं के बीच अलग पहचान देता है। क्रिकेट और फुटबॉल जैसे खेलों से जुड़े संगठनों के साथ उनकी भूमिका रही है। यह वह क्षेत्र है जहां देश का युवा सबसे ज्यादा भावनात्मक रूप से जुड़ता है। राजनीति और युवाओं के बीच अगर कोई सीधा पुल बनाया जा सकता है तो उसमें खेल रोजगार तकनीक और अवसर सबसे महत्वपूर्ण रास्ते हैं। अखिलेश यादव का यह फैसला सपा के लिए मायने रखता है। पार्टी अगर नयी पीढ़ी को अपने साथ जोडऩा चाहती है तो उसे सिर्फ यह बताने से काम नहीं चलेगा कि उसने अतीत में क्या किया। उसे यह भी बताना होगा कि वह आने वाले भारत के बारे में क्या सोचती है। नथवानी जैसे चेहरे इस बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। युवा भारत की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। वह स्टार्टअप की बात करता है नई टेक्नोलॉजी की बात करता है स्पोर्ट्स करियर को लेकर गंभीर है ग्लोबल कंपनियों और नए रोजगार के अवसरों को समझता है। ऐसे में अगर समाजवादी पार्टी के पास संसद में ऐसा व्यक्ति हो जिसने कॉरपोरेट खेल और नई ऊर्जा की दुनिया को करीब से देखा हो तो पार्टी की पहुंच का दायरा भी बड़ा हो सकता है।नथवानी की सबसे बड़ी खासियत शायद यही है कि वह पारंपरिक राजनीतिक ढांचे से बाहर की दुनिया से आते हैं। यही चीज उन्हें सपा के लिए उपयोगी बनाती है। राजनीति में पहले से मौजूद नेताओं के बीच एक ऐसा व्यक्ति जो उद्योग निवेश खेल और नई पीढ़ी की भाषा समझता हो पार्टी की बातचीत में नए विषय जोड़ सकता है।

मुस्लिम चेहरे की चर्चा के बीच धनराज नथवानी पर दांव

राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के दो नाम सामने आए तो एक नाम बिल्कुल अपेक्षित था और दूसरा नाम ऐसा आया जिसने पार्टी के भीतर और बाहर सवाल खड़े कर दिए। प्रोफेसर रामगोपाल यादव की उम्मीदवारी को लेकर बहुत ज्यादा आश्श्चर्य नहीं था लेकिन धनराज परिमल नथवानी के नाम ने राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी। खासकर इसलिए क्योंकि पिछले कुछ समय से यह अटकलें चल रही थीं कि पार्टी राज्यसभा के लिए किसी मुस्लिम चेहरे को प्रतिनिधित्व दे सकती है। सलीम शेरवानी समेत दूसरे नाम भी चर्चा में रहे थे। लेकिन अंतिम सूची में नथवानी आ गए। धनराज नथवानी का परिचय पारंपरिक समाजवादी राजनीति के नेता के तौर पर नहीं है बल्कि कॉरपोरेट और खेल प्रशासन से जुड़े व्यक्ति के तौर पर है। वह परिमल नथवानी के बेटे हैं और रिलायंस समूह से जुड़े हैं। उनकी अपनी वेबसाइट उन्हें रिलायंस न्यू एनर्जी लिमिटेड के निदेशक के रूप में परिचित कराती है जबकि कॉरपोरेट रिकॉर्ड में भी रिलायंस न्यू एनर्जी से उनका पूर्व निदेशक पद दर्ज है। यहीं से सवाल पैदा होता है कि आखिर समाजवादी पार्टी ने अपने राज्यसभा प्रतिनिधित्व के लिए इस चेहरे को क्यों चुना? पार्टी के पास मुस्लिम नेताओं के नामों पर विचार करने की राजनीतिक गुंजाइश थी। फिर ऐसा क्या समीकरण बना कि अंतत: कॉरपोरेट जगत से आने वाले नथवानी पर दांव लगाया गया? इसका जवाब पार्टी नेतृत्व ही दे सकता है। लेकिन उम्मीदवार के सामाजिक-राजनीतिक प्रोफाइल को देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह चयन समाजवादी पार्टी की पारंपरिक राजनीतिक पहचान से अलग तरह का संदेश देता है।

नथानी के नामांकन के बाद फिर याद आयी संजय सेठ की कहानी

धनराज नथवानी के नाम पर राजनीतिक चर्चा तेज हो रही है तो फलैश बैक से एक और नाम की चर्चा जोर पकड़ रही है और वह है संजय सेठ का नाम। संजय सेठ को समाजवादी पार्टी ने अपने मजबूत दौर में राज्यसभा भेजा था और बाद में वही सेठ पार्टी छोडक़र बीजेपी में चले गए। संजय सेठ 2016 में समाजवादी पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवार बने थे। उस समय वे लखनऊ के रियल एस्टेट कारोबारी के तौर पर जाने जाते थे। मई 2016 में उन्होंने स्क्क के अन्य उम्मीदवारों के साथ राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया। इससे पहले 2015 में अखिलेश यादव सरकार ने संजय सेठ का नाम विधान परिषद के मनोनीत सदस्यों के लिए राजभवन भेजा था। हालांकि तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने उनके नाम पर आपत्ति जताई और उनकी उम्मीदवारी को मंजूरी नहीं मिली। इसके बाद 2016 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया। राज्यसभा पहुंचने के बाद सेठ को पार्टी संगठन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। 2016 में उन्हें समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया था। यानी कारोबारी पृष्ठभूमि वाले एक व्यक्ति को पार्टी ने न सिर्फ संसद तक पहुंचाया बल्कि संगठन के वित्तीय ढांचे में भी महत्वपूर्ण भूमिका दी। लेकिन राजनीति में समीकरण स्थायी नहीं होते। अगस्त 2019 में संजय सेठ ने समाजवादी पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। उस समय उनकी नजदीकी अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव दोनों से बताई जाती थी।

युवाओं को पार्टी की राजनीति के केंद्र में रखने की कोशिश

अखिलेश यादव ने पिछले वर्षों में युवाओं को पार्टी की राजनीति के केंद्र में रखने की कोशिश की है। नथवानी का चयन उस दिशा में एक और प्रयोग की तरह देखा जा सकता है। खासकर इसलिए कि राज्यसभा में उनकी भूमिका सिर्फ वोट डालने तक सीमित नहीं होगी। वहां वह उद्योग ऊर्जा खेल रोजगार निवेश और युवाओं से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर उठा सकते हैं। नथवानी की पृष्ठभूमि का एक और पहलू महत्वपूर्ण है। उनके पिता परिमल नथवानी उद्योग और राजनीति दोनों क्षेत्रों में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। यानी धनराज ने सार्वजनिक जीवन और बड़े कारोबारी तंत्र को दूर से नहीं बेहद करीब से देखा है।सपा के लिए यह एक तरह से पुराने अनुभव और नए अनुभव का कॉम्बिनेशन है। रामगोपाल यादव जहां दशकों के राजनीतिक अनुभव का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं धनराज नथवानी नई अर्थव्यवस्था और प्रोफेशनल दुनिया की तरफ खुलती खिडक़ी हैं। अगर नथवानी अपनी कॉरपोरेट समझ को जनहित के मुद्दों से जोड़ पाते हैं, युवाओं के सवालों को संसद में आवाज दे पाते हैं और खेल तथा रोजगार के क्षेत्र में अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हैं, तो उनका राज्यसभा में जाना सपा के लिए महज एक नामांकन नहीं रहेगा।

यूपी पुलिस को सुप्रीम फटकार

बोली शीर्ष अदालत-बेहतर होगा यूपी पुलिस को ही खत्म कर दें

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक आपराधिक जांच के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस के कामकाज पर कड़ी नाराजगी जताई। इसके साथ ही कहा कि वह राज्य में सभी जांच का काम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) को सौंपने का आदेश भी दे सकती है।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने टिप्पणी की कि वे यूपी पुलिस को भंग कर सकते हैं। इसके साथ ही सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन यानी की सीबीआई को राज्य में सभी जांच अपने हाथ में लेने का निर्देश दे सकते हैं। कोर्ट ने कहा, हर चीज में आपका कोई न कोई एजेंडा होता है। अगर आप मामलों को इस तरह से संभालेंगे तो लोग आप पर कैसे भरोसा करेंगे?
बेहतर होगा कि हम सीबीई से यूपी पुलिस की सभी जांचों को संभालने के लिए कहें। हम यूपी पुलिस को भंग भी कर सकते हैं। यह बकवास किसी न किसी मोड़ पर तो रुकनी ही चाहिए। कोर्ट ने ये कड़ी टिप्पणियां एक जांच में गंभीर अनियमितताओं पर ध्यान देने के बाद कीं, जिसमें पुलिस ने एक अज्ञात मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी, जबकि शिकायतकर्ता ने संदिग्ध को मौके पर ही पकडक़र स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया था। जांच को जिस तरह से आगे बढ़ाया गया, उस पर निराशा जताते हुए बेंच ने टिप्पणी की।
बेंच ने कहा, नियमों का पालन करना एक बात है, लेकिन हद से ज्यादा झुक जाना और इस तरह मामले को दबाने की कोशिश करना? इस बारे में जितना कम कहा जाए, उतना ही अच्छा है। यह मामला खुद पेश होने वाली एक शिकायतकर्ता की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था। उसने सुप्रीम कोर्ट के सामने कहा कि पुलिस की शुरुआती रिपोर्ट शुरू से ही पक्षपाती थी।

उमर खालिद और शरजील इमाम को तीसरी बार झटका

दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की जमानत
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट से उमर खालिद और शरजील इमाम को बड़ा झटका लगा, क्योंकि कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी इन दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। हाई कोर्ट ने कहा, सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश को देखते हुए, हम अभी ज़मानत नहीं दे सकते। यह तीसरी बार है जब हाई कोर्ट ने खालिद और इमाम की ज़मानत याचिका खारिज की है।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की डिवीजन बेंच ने आदेश दिया, तस्लीम अहमद और खालिद सैफी की भूमिका उमर खालिद और शरजील इमाम से अलग है, इसलिए समानता का दावा नहीं किया जा सकता… जहाँ तक नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली दंगों का सवाल है, इसी स्नढ्ढक्र से जुड़े एक दूसरे मामले अथर खान बनाम दिल्ली राज्य में इस कोर्ट ने अथर खान की भूमिका की जांच की थी और इस आधार पर उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी कि अथर खान की भूमिका… इस फैसले के पैरा 62, 63 और 64 में बताई गई शर्तों के अनुसार थी। ऊपर की चर्चा और इन दोनों मामलों के सभी तथ्यों को देखते हुए, खासकर गुलफिशा फातिमा मामले में इन्हीं दो अपीलकर्ताओं के लिए पैरा 432 में लगाई गई शर्तों को ध्यान में रखते हुए, यह कोर्ट मौजूदा मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले/आदेश में कोई कमी नहीं पाता है। इसलिए, मौजूदा अपीलें खारिज की जाती हैं।

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