बच्चों को अश्लील कंटेंट से बचाने की मांग तेज, रेप की रोकथाम पर नई बहस

'सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन' के संस्थापक उदय माहुरकर ने कहा कि नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूरी तरह से बैन लगाने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: ‘सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन’ के संस्थापक उदय माहुरकर ने कहा कि नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूरी तरह से बैन लगाने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है.

देश में रेप के मामलों के बीच अब बहस अपराध के बाद की सजा से आगे बढ़कर अपराध से पहले की रोकथाम तक ले जाने की मांग उठी है. प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारिता, कानून और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने नाबालिगों की पोर्नोग्राफिक और यौन रूप से स्पष्ट सामग्री तक आसान पहुंच रोकने के लिए सख्त और लागू करने योग्य कानूनी ढांचे की मांग की है. ‘सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन’ के संस्थापक और पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने कहा कि सरकार की ओर से 2025 में पोर्नोग्राफिक कंटेंट प्रसारित करने वाले 25 OTT प्लेटफॉर्म के खिलाफ की गई कार्रवाई सही दिशा में कदम थी, लेकिन अब एक सख्त कानून की जरूरत है.

प्रधानमंत्री को भेजे अपने ज्ञापन में उदय माहुरकर ने पहला कदम एक समर्पित कानून बनाने का सुझाया है, जिसका उद्देश्य 18 साल से कम उम्र के बच्चों को पोर्नोग्राफिक और अश्लील सामग्री तक पहुंचने से रोकना होगा. इसके लिए मजबूत एज वैरिफिकेशन और प्लेटफॉर्म अकाउंटिबिलिटी की व्यवस्था की मांग की गई है. माहुरकर ने यह भी कहा कि नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूरी तरह से बैन लगाने के विकल्प पर भी गंभीरता से विचार किया जा सकता है, जैसा कि ऑस्ट्रेलिया में किया गया है. उन्होंने दावा किया कि 16 देशों में नाबालिगों को पोर्नोग्राफिक कंटेंट तक पहुंचने से रोकने वाले कानून मौजूद हैं.

ISP की जिम्मेदारी तय करने और AI के इस्तेमाल का प्रस्ताव
उदय माहुरकर के प्रस्ताव का दूसरा हिस्सा इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर यानी ISP की कानूनी जवाबदेही से जुड़ा है. उन्होंने प्रधानमंत्री को दिए पत्र में सुझाव दिया कि इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को अपने नेटवर्क के जरिए अश्लील सामग्री के प्रसार की स्थिति में कानूनी रूप से जवाबदेह बनाया जाए. साथ ही AI के जरिए ऐसे कंटेंट की प्रभावी डिटेक्शन और फिल्टर करने की व्यवस्था की जाए.

तीसरे कदम के तौर पर उन्होंने महिलाओं के अश्लील चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986 में संशोधन का सुझाव दिया. माहुरकर ने कहा कि दोषी पाए जाने वालों के लिए 10 साल की जेल और तीन साल तक जमानत नहीं मिलने का प्रावधान होना चाहिए. इसके साथ दोषी ठहराए गए अपराधियों की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान भी सुझाया गया है.

युवाओं को प्रभावित करने वाले सामाजिक माहौल को समझने पर जोर
माहुरकर ने कहा कि हर बार रेप की घटना के बाद चर्चा अपराधी को मिलने वाली सजा पर होती है, लेकिन असली सवाल यह भी होना चाहिए कि अपराध होने से पहले बच्चों के दिमाग तक हम क्या पहुंचने दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि अगर यौन रूप से स्पष्ट और पोर्नोग्राफिक सामग्री बिना किसी प्रभावी बाधा के किसी बच्चे के मोबाइल फोन तक पहुंच सकती है, तो प्रिवेंशन को गंभीरता से लेने का दावा नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि रेप की रोकथाम केवल पुलिसिंग और अपराध के बाद की सजा तक सीमित नहीं होनी चाहिए. युवाओं को प्रभावित करने वाले व्यापक सामाजिक माहौल को भी समझना होगा.

PARI की संस्थापक योगिता भयाना ने क्या कहा?
पीपल अगेंस्ट रेप इन इंडिया (PARI) की संस्थापक योगिता भयाना ने कहा कि रेप के खिलाफ लड़ाई अपराध होने के बाद शुरू नहीं होनी चाहिए. रोकथाम उससे काफी पहले शुरू होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि बच्चों को उन प्रभावों से बचाना जरूरी है जो शारीरिक संबंध, सहमति और ह्यूमन रिलेशनशिप को लेकर उनकी समझ को विकृत कर सकते हैं.

बच्चों की सुरक्षा कमर्शियल इंटरेस्ट से ज्यादा महत्वपूर्ण
भयाना ने कहा कि जब नाबालिगों को यौन रूप से स्पष्ट सामग्री आसानी से उपलब्ध होती है तो वो ऐसे मैटेरियल के संपर्क में आते हैं, जिसे समझने और प्रोसेस करने के लिए वो अभी तैयार नहीं होते. उन्होंने कहा कि मोबाइल फोन आज बच्चों की एजुकेशन और कम्यूनिकेशन का जरूरी हिस्सा बन चुके हैं. ऐसे में इसकी जिम्मेदारी केवल माता-पिता पर नहीं डाली जा सकती. उनके मुताबिक जिम्मेदारी प्लेटफॉर्म्स, टेक्नोलॉजी कंपनियां और रेगुलेटरी सिस्टम तक भी जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और गरिमा किसी भी कमर्शियल इंटरेस्ट से ज्यादा महत्वपूर्ण होनी चाहिए.

बॉलीवुड की भूमिका पर उठाया सवाल
योगिता भयाना ने एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री और खास तौर पर बॉलीवुड की भूमिका पर भी सवाल उठाया. उन्होंने स्क्रीन पर महिलाओं के ऑब्जेक्टिफिकेशन को नॉर्मलाइज करने पर चिंता जताई. उनका कहना था कि बॉलीवुड स्क्रीन पर महिलाओं को वस्तु की तरह पेश करने के बाद उसके सामाजिक प्रभावों से खुद को अलग नहीं कर सकता. उन्होंने कहा कि जब महिलाओं को मनोरंजन के लिए सेक्शुअल ऑब्जेक्ट्स के रूप में पेश किया जाता है तो इससे महिलाओं के प्रति अनादर को सामान्य बनाने और युवा दिमागों को खतरनाक संदेश देने का खतरा पैदा होता है. उन्होंने कहा कि एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को उस संस्कृति की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, जिसे वह बनाने में मदद करती है.

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