जैवलिन ATGM की खरीद को हरी झंडी, सेना की जरूरत अभी भी बड़ी
भारतीय सेना ने अगस्त 2026 में अमेरिका के साथ जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) की खरीद के लिए 16 साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार समझौता कर लिया है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भारतीय सेना ने अगस्त 2026 में अमेरिका के साथ जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) की खरीद के लिए 16 साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार समझौता कर लिया है.
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग में एक अहम डील आगे बढ़ी है. भारतीय सेना ने अमेरिकी जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम की खरीद के लिए Letter of Offer and Acceptance यानी LOA पर हस्ताक्षर किए हैं. सूत्रों के मुताबिक खरीद अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स यानी FMS रूट से होगी. जैवलिन की यह डील इसलिए खास है, क्योंकि भारतीय सेना करीब 16 साल से इस सिस्टम को हासिल करने की कोशिश कर रही थी. सेना लंबे समय से पुरानी Konkurs और Milan मिसाइलों की जगह नई पीढ़ी की फायर एंड फॉरगेट ATGM चाहती है.
मैन-पोर्टेबल फायर एंड फॉरगेट एंटी-टैंक मिसाइल
जैवलिन एक मैन-पोर्टेबल फायर एंड फॉरगेट एंटी-टैंक मिसाइल है. इसे सैनिक कंधे से लॉन्च कर सकता है और मिसाइल दागने के बाद उसे लगातार गाइड करने की जरूरत नहीं होती. टैंक, बख्तरबंद वाहनों और मजबूत ठिकानों को निशाना बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है. यह सिस्टम अमेरिका समेत 25 से ज्यादा देशों की सेनाओं में शामिल है.
100 मिसाइल और 25 लॉन्च यूनिट
नवंबर 2025 में अमेरिकी Defense Security Cooperation Agency यानी DSCA ने भारत को जेवलिन की संभावित बिक्री की जानकारी दी थी. इसके मुताबिक भारत करीब 100 जैवलिन मिसाइल राउंड और 25 लॉन्च यूनिट खरीद सकता है. उस समय पूरे पैकेज की अनुमानित कीमत करीब 45.7 मिलियन डॉलर बताई गई थी. हालांकि, मौजूदा LOA की पूरी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं हुई है.
2009 में पहली बार सामने आया जैवलिन
भारतीय सेना ने पहली बार 2009 के सैन्य अभ्यास में जैवलिन को देखा था. इसके बाद भारत में इसका परीक्षण भी हुआ. 2010 में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने संसद में बताया था कि अमेरिका से जैवलिन खरीदने और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए लेटर ऑफ रिक्वेस्ट भेजने का प्रस्ताव है.
लेकिन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर अमेरिकी सीमाओं के चलते सौदा आगे नहीं बढ़ सका. इसके बाद भारतीय सेना ने इजराइल की Spike ATGM को विकल्प के तौर पर आगे बढ़ाया. करीब 8 हजार मिसाइल और 300 लॉन्चर की बड़ी खरीद का प्रस्ताव भी आया, लेकिन कीमत और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर बातचीत लंबी खिंचती रही. बाद में 170 लॉन्चर और 4,500 मिसाइलों की खरीद की योजना बनी, लेकिन यह भी अंतिम रूप से लागू नहीं हो सकी.
बालाकोट और लद्दाख के बाद इमरजेंसी खरीद
2019 में पुलवामा हमले और बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद सेना ने तत्काल जरूरत पूरी करने के लिए Spike-LR की सीमित संख्या इमरजेंसी खरीद के जरिए हासिल की. करीब 12 लॉन्चर और 250 मिसाइलों की खरीद हुई. 2020 में लद्दाख में चीन के साथ तनाव के दौरान भी Spike-LR की खरीद की गई. यानी लंबे समय में नई पीढ़ी की ATGM के तौर पर सेना में सीमित संख्या में Spike-LR ही शामिल हो सकी.
जैवलिन के साथ भारत में उत्पादन की तैयारी
जैवलिन डील की एक और बड़ी खासियत है इसका संभावित भारतीय उत्पादन. Tata Advanced Systems Limited यानी TASL और Javelin Joint Venture के बीच MoU हुआ है. Javelin Joint Venture में Raytheon और Lockheed Martin शामिल हैं. इसके तहत भारत में जैवलिन के All Up Round यानी AUR की अंतिम असेंबली और इंटीग्रेशन फैसिलिटी स्थापित करने और कुछ कंपोनेंट्स के उत्पादन की संभावनाएं तलाशने की बात कही गई है.
इससे जैवलिन की सप्लाई चेन में भारतीय कंपनियों की भूमिका बढ़ सकती है और भारत-अमेरिका के बीच रक्षा औद्योगिक सहयोग को भी बढ़ावा मिल सकता है. लेकिन सेना की जरूरत 100 मिसाइलों से कहीं बड़ी जैवलिन की यह डील भारतीय सेना की तत्काल जरूरत को कुछ हद तक पूरा करेगी, लेकिन सेना की ATGM की बड़ी आवश्यकता अभी भी बनी हुई है.
सेना को 40 हजार से ज्यादा ATGM की जरूरत बताई जाती है, जबकि जैवलिन की प्रस्तावित खरीद इसकी तुलना में बेहद सीमित है. DRDO की स्वदेशी मैन-पोर्टेबल ATGM पर भी काम चल रहा है, लेकिन उसके बड़े पैमाने पर विकास और उत्पादन में अभी समय लग सकता है. यानी 16 साल बाद जेवलिन सौदे ने ATGM की लंबी तलाश में एक पड़ाव जरूर तय किया है, लेकिन भारतीय सेना के लिए हजारों आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइलों की जरूरत और उनकी समयबद्ध उपलब्धता की चुनौती अभी भी बरकरार है.



