पशुओं की देखभाल से महिलाओं की कमाई तक, बिहार में कैसे काम कर रहीं पशु सखियां?
बिहार के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं पशुओं की देखभाल के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर भी तैयार कर रही हैं। प्रशिक्षित पशु सखियां गांवों में पशुपालकों की मदद कर रही हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बिहार के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं पशुओं की देखभाल के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर भी तैयार कर रही हैं। प्रशिक्षित पशु सखियां गांवों में पशुपालकों की मदद कर रही हैं। वे पशुओं की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं के इस्तेमाल और पोषण से जुड़ी सलाह देकर पशुपालकों को जागरूक कर रही हैं। इससे पशुओं की सेहत बेहतर बनाने और ग्रामीण परिवारों की आजीविका को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। गांवों में बड़ी संख्या में परिवार दूध उत्पादन और दूसरे पशुपालन कार्यों से अपनी कमाई करते हैं। ऐसे में पशुओं का स्वस्थ रहना पशुपालकों के लिए बहुत जरूरी है। पशुओं के बीमार होने पर इलाज में खर्च बढ़ सकता है और दूध उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षित पशु सखियां ग्रामीण परिवारों तक पशु स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरी जानकारी पहुंचाने में भूमिका निभा रही हैं।
पशुपालन ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का आधार
पशु सखी मॉडल की सफलता की कहानी वैशाली में देखने को मिल रही है. संगीता कुमारी वैशाली की रहने वाली हैं. वह बताती हैं कि उनको यह सौभाग्य मिला है कि वह अब पशुओं की देखभाल करेंगी. पशुओं को अब किसी भी तरह की परेशानी नहीं होगी. किसी भी पशुपालक का फोन आता है, तो वह मौके पर पहुंच जाती हैं. मुझसे जहां तक होता है, मैं उनकी दवाइयों के लिए मदद करती हूं.
आगे वह बताती हैं कि पहले पशुपालक हम लोगों पर भरोसा नहीं करते थे, लेकिन जानकारी के अभाव में पशुओं के बच्चे जन्म के बाद ही मर जाते थे. इस समस्या को दूर करने के लिए मैंने गांव में पशुओं को कृमिनाशक दवा पिलाने की सलाह दी. शुरुआत में लोग दवा देने से डरते थे, लेकिन मैंने उन्हें लगातार समझाया. फिर धीरे-धीरे मैंने उनका विश्वास जीता. जब कुछ दिनों बाद मैं दोबारा गांव में गई,तो पशुओं की सेहत में काफी सुधार देखने को मिला. इसके लिए मैं मुख्यमंत्री जी का धन्यवाद करूंगी, जिनकी वजह से मुझे पशुओं की सेवा करने का मौका मिला है.
पशुओं की बेहतर देखभाल
पशुपालन ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है. ऐसे में प्रशिक्षित पशु सखियों की उपलब्धता से पशुपालकों को समय पर प्राथमिक सहायता और जरूरी सलाह मिल रही है, जिससे पशुओं को बीमारियों से बचाने, पशुधन के नुकसान को कम करने और पशुपालन को ज्यादा लाभकारी बनाने में मदद मिल रही है. इसके साथ ही, यह पहल महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित करने के साथ-साथ ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत करने में भी योगदान दे रही है.
क्या कहते हैं आंकड़े
गया में सबसे ज्यादा 540 पशु सखियां सेवाएं दे रही हैं. इसके बाद मुजफ्फरपुर में 443, कटिहार में 432, नवादा और पूर्णिया में 430-430, नालंदा में 424, रोहतास में 423, पटना में 387, सीतामढ़ी में 377 और पश्चिमी चंपारण में 372 पशु सखियां अपनी सेवाएं दे रही हैं. पशु सखी मॉडल की पहल यह बताती है कि सही प्रशिक्षण, सरकार से सहयोग और अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं पशुधन संरक्षण से लेकर परिवारों की आय बढ़ाने में बराबर की भागीदारी निभा सकती हैं. गांवों की ये डॉक्टर दीदियां महिला सशक्तीकरण और समृद्ध ग्रामीण बिहार की नई पहचान बन रही हैं.



