अयोध्या के दीपोत्सव में सिर्फ दीप नहीं, मजदूरों के सपने भी होंगे रोशन!
अयोध्या का दीपोत्सव इसी सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का एक विराट प्रतीक बनकर सामने आता है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। यह वैदिक प्रार्थना केवल आध्यात्मिक चेतना का संदेश नहीं देती, बल्कि भारतीय संस्कृति के उस मूल दर्शन को भी अभिव्यक्त करती है,
जिसमें प्रकाश को ज्ञान, आशा, सकारात्मकता और नवजीवन का प्रतीक माना गया है। सनातन परंपरा में दीप जलाना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और अभाव पर आत्मविश्वास की विजय का प्रतीक रहा है। लेकिन जब यही प्रकाश किसी साधनहीन परिवार के आंगन में आत्मनिर्भरता और सम्मान का उजाला बनकर उतरता है, तब उसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
अयोध्या का दीपोत्सव इसी सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का एक विराट प्रतीक बनकर सामने आता है। वर्ष 2026 में सरयू नदी के पावन तट पर 30 लाख दीपों की जगमगाहट की परिकल्पना इस आयोजन को एक बार फिर वैश्विक आकर्षण का केंद्र बना रही है।
रामनगरी के घाटों पर जब असंख्य दीप अपनी रोशनी बिखेरेंगे, तब यह दृश्य केवल धार्मिक आस्था, त्रेतायुग की स्मृतियों और प्रभु श्रीराम के अयोध्या आगमन के उत्सव तक सीमित नहीं रहेगा। इस रोशनी के पीछे उन मेहनतकश हाथों की कहानी भी होगी, जिन्होंने मिट्टी को आकार देकर दीपों का रूप दिया और अपनी मेहनत से इस भव्य आयोजन की आधारशिला तैयार की।
इस आयोजन के लिए 33 लाख दीयों का आदेश दिया जाना यह बताता है कि दीपोत्सव धार्मिक परंपरा से आगे बढ़ गया है. यह उन ‘माटी के पुजारियों’ के लिए अवसरों का विस्तृत आकाश बन गया है, जिनके चाक की गति आधुनिकता की दौड़ में मंद पड़ने लगी थी.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सांस्कृतिक गौरव और सुशासन के मेल से जो मॉडल उभरा है, उसमें आस्था रोजगार से जुड़ी है और विकास की किरणें समाज की अंतिम पंक्ति तक पहुंच रही हैं.
पुश्तैनी हुनर की धड़कन
पं. दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय की अवधारणा का मूल यह है कि आर्थिक योजनाओं की कसौटी समाज के शिखर पर बैठे व्यक्ति की समृद्धि नहीं, बल्कि सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की दशा होनी चाहिए.
अयोध्या का दीपोत्सव इसी विचार को धरातल पर उतारता दिखता है. मिट्टी का एक छोटा दीया केवल जल, माटी और अग्नि का मेल नहीं होता. उसमें कुम्हार का पसीना है, उसके परिवार की आशाएं हैं और पुश्तैनी हुनर की धड़कन है.
एक दशक पहले तक यह हुनर दम तोड़ता दिखाई दे रहा था. तब की सरकारों ने भी इन शिल्पियों के बारे में सोचने की जहमत नहीं उठाई. जिन हाथों में मिट्टी से सोना गढ़ने का कौशल था, वे मजबूरी में काम की तलाश में महानगरों की ओर निकल पड़े. माटी के पुजारी अकुशल मजदूरों के रूप में सड़कों पर दिखाई देने लगे थे.



