चुनाव आयोग बैकफुट पर, ज्ञानेश कुमार के फैसले पलटे

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के तहत फॉर्म-6 को लेकर चुनाव आयोग के अचानक आए 'यूटर्न' ने देश की चुनावी व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के दौरान फॉर्म-6 को लेकर चुनाव आयोग के हालिया फैसलों के बाद.. कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है.. दीपके ने कहा कि आयोग के कई फैसलों को बदल दिए जाने के बाद अब और भी बड़ा सवाल खड़ा हो गया है.. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अखबारों में रिपोर्ट नहीं छपी होती और आम लोगों ने गुस्सा जाहिर नहीं किया होता तो क्या ये फैसले कभी बदले जाते.. उनका आरोप है कि पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी के कारण कई गंभीर निर्णय बिना किसी जांच के लागू हो जाते हैं..

अभिजीत दीपके ने फॉर्म-6 से जुड़े ताजा बदलावों के बाद सीईसी को निशाना बनाते हुए लिखा कि ज्ञानेश कुमार की ओर से लिए गए अब सभी फैसले बदल दिए गए.. लेकिन उन फैसलों को पलट दिए जाने से और भी बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है.. यदि उनके कदम इतने गंभीर थे.. कि पलटने की आवश्यकता पड़ी तो जिम्मेदार शख्स को परिणाम नहीं भुगतना चाहिए.. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि क्या होता यदि पत्रकार ने खुलासा नहीं किया होता.. क्या होता यदि लोगों ने आक्रोश नहीं दिखाया होता.. क्या ये फैसले कभी नहीं बदले जाते.. कितने ही ऐसे फैसले बिना सवालों का सामना किए रह जाते हैं.. क्योंकि कोई उन्हें उजागर नहीं करता..

वहीं कॉकरोच जनता पार्टी के सह संयोजक सौरव दास ने भी जवाबदेही की मांग की.. उन्होंने एक्स पर कहा कि यदि सभी गलतियां कबूल कर ली गईं.. और पूरा यूटर्न ले लिया गया है तो ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए.. दास के अनुसार इस जवाबदेही के बिना उनकी अगुआई में होने वाले सभी आगामी चुनाव गंभीर संदेहों.. और संभावित गड़बड़ियों से घिरे रहेंगे.. उन्होंने चेतावनी दी कि बीजेपी जीत भी सकती है.. लेकिन लोग समझेंगे कि यह ज्ञानेश कुमार और उनके सहयोगियों की वजह से हुआ.. यह देश के लोकतंत्र के लिए विनाशकारी परिणाम होगा..

निर्वाचन आयोग ने सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि.. मसौदा मतदाता सूची में नाम नहीं होने पर पहले से पंजीकृत मतदाता भी फॉर्म-6 भरकर अपना नाम दोबारा शामिल कराने का अनुरोध कर सकते हैं.. आयोग के अनुसार ऐसा आवेदन अपने आप में गलत घोषणा नहीं माना जाएगा.. और इसके आधार पर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 31 के तहत कोई कार्रवाई नहीं होगी.. यह स्पष्टीकरण उन आशंकाओं को दूर करने के लिए जारी किया गया है.. जो मतदाताओं में फैली हुई थीं..

आयोग के पत्र में कहा गया है कि उसके संज्ञान में आया है कि मौजूदा विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में कुछ लोगों के नाम नहीं हैं.. और वे फॉर्म-6 जमा करने में हिचकिचा रहे हैं.. जिसका कारण यह है कि इस फॉर्म में एक घोषणा-पत्र भी देना होता है.. जिसमें कहा जाता है कि उनका नाम पहली बार मतदाता सूची में शामिल किया जा रहा है.. कई पुराने मतदाता इसे झूठी घोषणा मानकर कानूनी कार्रवाई के डर से आवेदन नहीं कर रहे थे..

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि ऐसे मतदाताओं का मानना था कि पहले से पंजीकृत होने के बावजूद फॉर्म-6 जमा करना गलत घोषणा करने के समान होगा.. और वे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 31 के तहत कानूनी कार्रवाई के भागी बन सकते हैं.. अब आयोग ने आधिकारिक तौर पर आश्वासन दिया है कि ऐसे मामलों में कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी.. यह कदम उन आलोचनाओं के बाद उठाया गया है.. जो फॉर्म-6 में अतिरिक्त घोषणाओं और प्रक्रिया की जटिलताओं को लेकर हो रही थी..

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की पूरी प्रक्रिया पिछले कई महीनों से विवादों में रही है.. इसमें देशभर में करोड़ों नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए.. आलोचकों का कहना है कि कई पात्र मतदाताओं के नाम भी गलती से या पक्षपातपूर्ण तरीके से कट गए.. विपक्षी दलों और नागरिक समूहों ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर रही है.. क्योंकि मतदाता सूची में हेरफेर से चुनावी नतीजे प्रभावित हो सकते हैं..

अभिजीत दीपके और उनके संगठन ने शुरू से ही एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं.. और उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद एकतरफा फैसले लिए.. भारतीय एक्सप्रेस जैसी रिपोर्टों में आयोग के अंदर मतभेदों का जिक्र हुआ था.. जिसमें दो आयुक्तों ने कई फैसलों पर लिखित आपत्ति जताई थी.. इन रिपोर्टों के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए और सीईसी के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी..

फॉर्म-6 विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां भी रही.. अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को मंजूरी नहीं दी थी.. जबकि चुनाव आयोग ने पहले प्रेस नोट में दावा किया था.. कि सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित घोषणा-पत्र को बरकरार रखा है.. इस विरोधाभास ने विपक्ष और नागरिक समाज को और मजबूत आधार दे दिया कि प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी थी..

आयोग ने बाद में कई फैसलों में बदलाव किए.. जिन राज्यों में एसआईआर पूरा हो चुका था वहां ऑनलाइन फॉर्म-6 से अतिरिक्त घोषणा वाले हिस्से को हटा दिया गया.. अब आवेदकों को केवल वैधानिक फॉर्म-6 ही भरना होता है.. साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि पुराने मतदाता भी बिना किसी कानूनी खतरे के दोबारा आवेदन कर सकते हैं.. आलोचक इन्हें दबाव में लिए गए यूटर्न मान रहे हैं..

 

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