ट्रंप की हार के बाद भारत में जाएगा तो मोदी का बाप भी बयान वायरल
ट्रंप की ट्रं-ट्रं बंद, खरगे का रैप चालू! मोदी सरकार से हिसाब मांगती जेन—जी

- छोटे कारोबारियों और आम परिवारों को जो परेशानियां झेलनी पड़ीं उनका हिसाब कौन देगा?
- स्टार्टअप का सपना दिखाया गया लेकिन छोटे उद्यमी के लिए पूंजी और बाजार कहां है?
- तमाम छोटे-बड़े नेता इस वीडियो को अपने सोशल मीडिया एकांउट से कर रहे हैं शेयर
- अलका लांबा समेत तमाम नेताओं ने पीएम मोदी से हिसाब मांगता वीडिया शेयर किया
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। अमेरिका में ट्रंप की पार्टी को झटका लगा तो भारत में कांग्रेस ने नया डिजिटल मोर्चा खोल दिया। खरगे का ‘मोदी का बाप भी जाएगा’ वाला बयान को आधार बनाते हुए एक रैप बीट पर गाना तेजी से वायरल हो रहा है। कांग्रेस की पूर्व विधायक अलका लांबा समेत तमाम नेताओं ने इसे साझा किया है। ’50 दिन मांगे थे, आज हिसाब कौन लगाएगा’ के बोलों से सजे इस रैप में खडग़े के बयान की जबर्दस्त जुगलबंदी की गयी है। अमेरिका में ट्रंप की पार्टी को चुनावी झटका क्या लगा भारत में कांग्रेस के सोशल मीडिया की बांछें खिल गईं। व्हाइट हाउस की सियासत में भूचाल आया तो भारतीय राजनीति में रैप की बीट तेज हो गई। डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत हासिल किया और इधर कांग्रेस के नेताओं ने ट्रंप की हार को मोदी सरकार पर हमला बोलने के नए मौके के रूप में लपक लिया। संदेश साफ है दुनिया का सबसे ताकतवर नेता भी जनता की नाराजगी से नहीं बच सकता। फिर भारत में सत्ता को सवालों से छूट कैसे मिल सकती है।
खरगे की ललकार पर रैप का वार अलका लांबा ने बढ़ाया वॉल्यूम
सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से तैर रहा है। वीडियो का निर्माता कौन है, इसका कोई स्पष्ट दावा नहीं है। लेकिन इसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े का बयान ‘मोदी का बाप भी जाएगा’ और इसके साथ रैप की बीट पर गूंज रहे हैं बोल—’50 दिन मांगे थे, आज हिसाब कौन लगाएगा।’ पूर्व विधायक अलका लांबा ने भी इसे साझा किया है। कांग्रेस के कई बड़े नेताओं और समर्थकों के बीच वीडियो को लेकर उत्साह दिखाई दे रहा है। यह वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ने इस वायरल वीडियो में अपने लिए नया डिजिटल हथियार देख लिया है।
मोदी-ट्रंप की दोस्ती का क्या होगा? तस्वीरें नहीं नतीजे बोलेंगे
मोदी और ट्रंप की नजदीकी को दोनों देशों में खूब राजनीतिक महत्व दिया गया। साझा मंच गर्मजोशी भरी मुलाकातें और दोस्ती की तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय राजनीति के साथ घरेलू प्रचार का भी हिस्सा बनीं। लेकिन ट्रंप की पार्टी की हार ने एक बात याद दिलाई है कि किसी दूसरे देश के नेता की लोकप्रियता या राजनीतिक ताकत स्थायी नहीं होती। आज जो नेता संसद में मजबूत है कल उसे जनता के फैसले का सामना करना पड़ सकता है। राहुल गांधी पहले ही दावा कर चुके हैं कि एक वर्ष के भीतर मोदी सरकार गिर सकती है। भाजपा ने उस समय इसे राजनीतिक बयानबाजी बताकर खारिज किया था। लेकिन अमेरिकी चुनाव के बाद कांग्रेस राहुल गांधी के इस बयान को नए संदर्भ में रख रही है। विपक्ष इसी बदले हुए राजनीतिक समीकरण को अपनी ताकत के रूप में पेश कर रहा है। राहुल गांधी की भविष्यवाणी सच होगी या नहीं यह भविष्य तय करेगा। लेकिन विपक्ष का प्रयास साफ है कि सरकार की मजबूती के दावों के बीच असंतोष और राजनीतिक कमजोरियों को मुद्दा बनाया जाए।
50 दिन मांगे थे, दस साल बीत गए हिसाब की फाइल कहां है?
रैप की सबसे चुभती हुई लाइन है—’50 दिन मांगे थे, आज हिसाब कौन लगाएगा।’ है यह सीधा हमला 2016 की नोटबंदी की याद पर है। आठ नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने की घोषणा की थी। इसके बाद जनता से 50 दिन का समय मांगा गया था। काले धन, नकली नोटों और आतंकवाद की फंडिंग पर चोट जैसे उद्देश्य सामने रखे गए थे। अब करीब दस साल बाद विपक्ष उसी 50 दिन को राजनीतिक सवाल बनाकर लौटा रहा है। नोटबंदी से क्या हासिल हुआ? कितनी नकदी वापस आई? काले धन के खिलाफ अभियान का परिणाम क्या रहा? छोटे कारोबारियों और आम परिवारों को जो परेशानियां झेलनी पड़ीं, उनका हिसाब कौन देगा? सरकार ने नोटबंदी को अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने और डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने वाला कदम बताया तो विपक्ष ने इसे आर्थिक अव्यवस्था और आम आदमी की मुश्किलों से जोड़ कर देखा। बहस आज भी खत्म नहीं हुई है और अब वही बहस रैप बनकर लौट रही है और राजनीति का पुराना सवाल नई पीढ़ी की भाषा में पूछा जा रहा है।
जेन-जी का सवाल—रील तो बना ली रोजगार का क्या हुआ?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा पहलू है। आज का युवा नेताओं के भाषणों का मुरीद होने से ज्यादा अपने भविष्य को लेकर परेशान है। उसे चुनावी जुमलों की शब्दावली नहीं अपनी जिंदगी का समाधान चाहिए। डिग्री हाथ में है लेकिन नौकरी के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में साल निकल रहे हैं कहीं पेपर लीक तो कहीं भर्ती प्रक्रिया में देरी। महंगाई के बीच परिवार चलाना मुश्किल है। निजी क्षेत्र में नौकरी की असुरक्षा अलग है और सरकारी नौकरी की कतार अलग। युवा पूछ रहा है कि कौशल विकास की बात बहुत हुई कौशल के मुताबिक रोजगार कहां है? स्टार्टअप का सपना दिखाया गया लेकिन छोटे उद्यमी के लिए पूंजी और बाजार कहां है? डिजिटल इंडिया का नारा बुलंद है, लेकिन डिजिटल अर्थव्यवस्था में युवा की आमदनी कितनी बढ़ी?




