पूर्व DGP एलआर बिश्नोई का इस्तीफा स्वीकार, जांच समिति को सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन
मेघालय के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक (DGP) डॉ. एल.आर. बिश्नोई का उच्च-स्तरीय जांच समिति (HPEC) के सदस्य पद से दिया गया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: जंतर-मंतर प्रकरण से जुड़ी जांच में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला लिया है। मेघालय के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक (DGP) डॉ. एल.आर. बिश्नोई का उच्च-स्तरीय जांच समिति (HPEC) के सदस्य पद से दिया गया.
इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। इसके साथ ही अदालत ने मामले की जांच कर रही समिति को एक महीने के भीतर अपनी पहली रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान पीठ ने डॉ. एल.आर. बिश्नोई के इस्तीफे को स्वीकार करते हुए जांच समिति को तय समय में अपनी रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया बिश्नोई का इस्तीफा
दरअसल, डॉ. एल.आर. बिश्नोई को जंतर-मंतर प्रकरण की जांच के लिए गठित उच्च-स्तरीय जांच समिति (HPEC) में सदस्य बनाया गया था। हालांकि, उन्होंने समिति के सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस्तीफे को मंजूरी दे दी है।
इस फैसले के बाद डॉ. बिश्नोई अब इस जांच समिति के सदस्य के रूप में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे। अदालत ने उनके इस्तीफे को स्वीकार करने के साथ ही मामले की जांच को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में छात्र विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा की जांच के लिए पांच सदस्यीय यह समिति गठित की थी. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने समिति में पूर्वोत्तर राज्य के एक पूर्व DGP को शामिल किए जाने को लेकर ‘हितों के टकराव’ (conflict of interest) का मुद्दा उठाया था. इस उच्च-स्तरीय जांच समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं.
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बताया कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और पुलिस की ज्यादतियों की जांच कर रही समिति को अब तक बहुत कम शिकायतें मिली हैं. पर्याप्त सामग्री न होने के कारण, समिति अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह शिकायतों के दर्ज होने का अनिश्चित काल तक इंतजार नहीं कर सकता. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि समिति को अब तक मिली सामग्री की जांच करनी चाहिए, संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगना चाहिए, और कोर्ट द्वारा चिह्नित दो प्राथमिकता वाले मुद्दों पर अपनी रिपोर्ट तैयार करना शुरू कर देना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वकीलों या जनहित में काम करने वाले लोगों द्वारा पीड़ितों की ओर से सौंपी गई याचिकाओं, वीडियो और अन्य सबूतों पर भी विचार किया जाना चाहिए, भले ही पीड़ितों ने खुद सीधे तौर पर समिति से संपर्क न किया हो.
अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 31 अक्टूबर की समिति की रिपोर्ट केवल एक ‘स्टेटस रिपोर्ट’ (स्थिति रिपोर्ट) है, और आरोपों के संबंध में अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि जांच के निष्कर्षों को आम तौर पर संबंधित पक्षों के साथ साझा किया जाना चाहिए, सिवाय उन विशेष परिस्थितियों के जहां गोपनीयता बनाए रखना आवश्यक हो. इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी.
पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति किसने दी?
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं की वकील वृंदा ग्रोवर ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा, “दोनों पक्षों को अपने तथ्य सामने रखने चाहिए. पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति किसने दी?” “समिति की रिपोर्ट बताती है कि अधिकारियों की ओर से कोई सबूत नहीं दिया गया है.”
पीड़ितों की शिकायतें दर्ज करने के लिए बनाए गए पोर्टल पर बहुत कम शिकायतें मिलने को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को सीधे समिति के पास वीडियो क्लिप जमा करने की अनुमति दे दी है.



