33 साल बाद जंतर-मंतर हुआ बैरिकेडिंग मुक्त, ट्रैफिक के लिए भी खुला रास्ता

दिल्ली का जंतर-मंतर... एक ऐसी जगह, जिसने करीब 33 साल तक देशभर के आंदोलनों, धरनों और विरोध प्रदर्शनों की आवाज को जगह दी।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: दिल्ली का जंतर-मंतर… एक ऐसी जगह, जिसने करीब 33 साल तक देशभर के आंदोलनों, धरनों और विरोध प्रदर्शनों की आवाज को जगह दी।

यहां कभी अपनी मांगों को लेकर किसान पहुंचे, तो कभी कर्मचारियों ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाई। किसी ने न्याय की मांग की, तो किसी ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। जंतर-मंतर लंबे समय तक आम लोगों के लिए अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का एक बड़ा मंच बना रहा। लेकिन अब इस ऐतिहासिक धरना स्थल की तस्वीर बदलती नजर आ रही है।

साल 1993 में जंतर-मंतर को एक प्रमुख धरना स्थल के रूप में नोटिफाई किया गया था। इसके बाद से यहां लगातार अलग-अलग संगठनों, सामाजिक समूहों और आम नागरिकों के प्रदर्शन होते रहे। समय के साथ जंतर-मंतर की पहचान सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह पूरे देश में विरोध और लोकतांत्रिक आवाज उठाने का एक बड़ा प्रतीक बन गया।

जब हर आंदोलन की मंजिल हुआ करता था जंतर-मंतर

जंतर-मंतर का नाम सामने आते ही लोगों के मन में धरना, प्रदर्शन और नारेबाजी की तस्वीर उभरती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपनी समस्याएं लेकर यहां पहुंचते थे। किसी संगठन को अपनी मांग सरकार तक पहुंचानी होती थी, तो जंतर-मंतर उसका प्रमुख ठिकाना बन जाता था।

कभी सरकारी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए, तो कभी महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सामाजिक मुद्दों को लेकर लोगों ने यहां आवाज उठाई। कई बार ऐसे प्रदर्शन भी हुए, जिन्होंने देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा।

यहां छोटे समूहों से लेकर बड़े संगठनों तक ने अपनी बात रखी। कई आंदोलनों को मीडिया के जरिए देशभर में पहचान मिली। इस तरह जंतर-मंतर धीरे-धीरे विरोध की राजनीति और जन आंदोलनों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

जंतर-मंतर पर अब आवाजाही सामान्य

दिल्ली के जंतर-मंतर पर अब पहले जैसी बैरिकेडिंग और सुरक्षा का घेरा नजर नहीं आएगा. लंबे समय से यहां सड़क के दोनों तरफ कई लेयर में बैरिकेड लगाए जाते रहे.

सुरक्षा बलों की तैनाती रहती थी, लेकिन अब इन बैरिकेडिंग को हटाया जा रहा है और सड़क को आम लोगों तथा वाहनों की आवाजाही के लिए खोला जा रहा है. इससे जंतर-मंतर और आसपास के इलाके में आने-जाने वाले लोगों को राहत मिलेगी. लंबे समय से सुरक्षा प्रतिबंधों के कारण इस सड़क पर सामान्य यातायात प्रभावित था.

1993 से विरोध प्रदर्शनों का बड़ा केंद्र

जंतर-मंतर की पहचान सिर्फ दिल्ली की एक सड़क या ऐतिहासिक इमारत तक सीमित नहीं रही. साल 1993 में इसे प्रमुख धरना स्थल के तौर पर नोटिफाई किया गया था. इसके बाद देश के अलग-अलग राज्यों से लोग अपनी मांगों और शिकायतों को लेकर यहां पहुंचते रहे.

किसानों से लेकर कर्मचारियों तक, सामाजिक संगठनों से लेकर राजनीतिक दलों तक, अलग-अलग मुद्दों पर यहां धरने और प्रदर्शन हुए. कई बार छोटे समूहों के प्रदर्शन हुए, तो कई बार बड़े आंदोलन भी जंतर-मंतर पर दिखाई दिए. सालों तक यह जगह सत्ता के केंद्र के करीब विरोध दर्ज कराने का एक प्रमुख ठिकाना बनी रही.

हालिया CJP प्रदर्शन के बाद बढ़ा विवाद

हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भी प्रदर्शन हुए. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और दूसरे संगठनों ने चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध दर्ज कराने की कोशिश की थी.

अक्टूबर में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति और वहां तक पहुंचने को लेकर दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी. 10 अक्टूबर के आसपास राजधानी के कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई.

तीन वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल निर्धारित

सड़कों पर बैरिकेडिंग, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती बढ़ाई गई. इसी दौरान प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने और पुलिस कार्रवाई को लेकर भी विवाद हुआ.

इसके बाद 11 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल की सूची से हटा दिया. दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर के स्थान पर तीन वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल निर्धारित किए हैं. इनमें मध्य दिल्ली का रामलीला मैदान, उत्तर दिल्ली का बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का CBD मैदान शामिल हैं.

दिल्ली पुलिस के 11 अक्टूबर के आदेश के मुताबिक, गृह मंत्रालय की ओर से गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर यह फैसला लिया गया. यानी जंतर-मंतर पर अब पहले की तरह निर्धारित धरना स्थल के तौर पर प्रदर्शन आयोजित नहीं किए जा सकेंगे. प्रदर्शन के लिए संगठनों को नए निर्धारित स्थानों पर अनुमति लेनी होगी.

अब सुरक्षा का पुराना घेरा भी खत्म

जंतर-मंतर पर सालों से प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा के कई स्तर बनाए जाते रहे. प्रदर्शनकारियों और आम लोगों के बीच बैरिकेडिंग लगाई जाती थी. जरूरत के मुताबिक पैरामिलिट्री फोर्स की तैनाती होती थी.

क्यूआरटी यानी क्विक रिस्पॉन्स टीम और एंटी-राइट व्हीकल भी यहां रखे जाते थे. अब प्रदर्शन स्थल का दर्जा खत्म होने के बाद सुरक्षा व्यवस्था में भी बदलाव किया जा रहा है. मौके से बैरिकेडिंग हटाई जा रही है और सुरक्षा बलों की तैनाती कम की जा रही है.

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