एनसीपी में विलय की खबरों से बीजेपी सहमी

- फडणवीस नहीं चाहते एक हो एनसीपी!
- डिप्टी सीएम अजीत पवार पर सार्वजनिक मंच से भड़के सीएम फडणवीस
- शरद पवार और अजीत पवार गुटों के बीच निकाय चुनाव के बाद होगा विलय
- अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति का नेतृत्व करेंगे और सुप्रिया सुले बनेगी केन्द्र में मंत्री!
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
मुंबई। खबर बिलकुल सालिड है बस वक्त का इंतजार है। शेर कभी बूढ़ा नहीं होता यह सिद्ध कर दिया है पालिटिक्ल लीजेंड शरद पवार ने। शरद पवार ने अजीत पवार को आगे कर मराठा राजनीति में वह तुरूप का इक्का चल दिया है महाराष्ट्र की राजनीति में सनसनी फैल गयी है। शरद पवार ने एनसीपी के दोनो गुटों के विलय को हरी झंडी दे दी है और सूत्रों के अनुसार तय किया गया है कि निकाय चुनाव के बाद दोनों गुटों में विलय हो जाएगा। महाराष्ट्र की राजनीति अजीत पवार करेंगे और देश की राजनीति में सुप्रिय सुले आगे होगी। शरद पवार के इस दांव का असर भी सामने आ गया है जब एक चुनावी सभा में सीएम फडणवीस डिप्टी सीएम अजीत पवार पर भड़क गये और उन्हें कम बोलने की चेतावतनी दे डाली।
भाषा बदलने के लिए मजबूर हुए सीएम!
खबरें कहती हैं कि शरद पवार ने एनसीपी के विलय को मंजूरी दे दी है। लेकिन सवाल यह नहीं कि विलय होगा या नहीं सवाल यह है कि विलय के बाद किसके हाथ में कमान होगी? निकाय चुनाव के बाद विलय की टाइमिंग कोई संयोग नहीं। यह शुद्ध राजनीतिक गणित है। नगरपालिका से लेकर विधान सभा तक जाति से लेकर धनबल तक सबका टेस्ट। सब कुछ प्लान के मुताबिक चला तो एक नाम उभरेगा अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति का अगला सेनापति। बीजेपी को यही डर है। शिंदे को यही बेचैनी है। और फडणवीस इसी वजह से इस प्रकार की भाषा बोलने के लिए मजबूर हुएं हैं।
मराठा राजनीति में हलचल
महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी कोई कहता है कि सब ठीक है तो समझ लेना चाहिए कि अंदरखाने कुछ जल रहा है। एनसीपी के विलय की खबरों के उठते धुएं ने शांत लहरों में खलबली पैदा कर दी है। और इसी धुएं के बीच फडणवीस ने सार्वजनिक मंच से अजित पवार को कम बोलने की नसीहत दे डाली है। सूत्रों के मुताबिक यह सलाह नहीं साफ़ चेतावनी है। यह वही देवेंद्र फडणवीस हैं जो जानते हैं कि एकजुट एनसीपी बीजेपी के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकती है। टूटी हुई एनसीपी बीजेपी की बैसाखी है और जुड़ी हुई एनसीपी सत्ता के लिए चुनौती। फडणवीस और अजित पवार की लड़ाई अब पर्दे के पीछे की मुस्कुराहट नहीं रही। मंच पर उपमुख्यमंत्री को डांट पडऩा यह सत्ता साझेदारी नहीं सत्ता संघर्ष का ऐलान है। और इस संघर्ष के केंद्र में खड़े हैं शरद पवार—जिनके एक इशारे पर महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा बदल गयी है।
राजनीतिक वायदा बना बवाल की जड़
उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने यह आश्वासन दिया था कि यदि महायुति को पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम की सत्ता मिलती है तो नागरिकों को मुफ्त बस सेवा और मेट्रो यात्रा की सुविधा दी जाएगी। इस बयान को लेकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस खासे नाराज दिखे। उन्होंने दो टूक कहा कि अजित पवार ने जो वादा किया है उसे मौजूदा परिस्थितियों में पूरा करना संभव नहीं है। फडणवीस का यह बयान केवल प्रशासनिक असहमति नहीं बल्कि सत्ता संतुलन का स्पष्ट संदेश भी माना जा रहा है। महायुति सरकार में शामिल दोनों प्रमुख घटकों भाजपा और अजित पवार गुट के बीच यह मतभेद ऐसे समय सामने आया है जब नगर निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे शहरी क्षेत्र न केवल आर्थिक रूप से अहम हैं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी सत्ता का रास्ता यहीं से तय होता है। ऐसे में एक सहयोगी दल के नेता द्वारा लोकलुभावन घोषणा और मुख्यमंत्री द्वारा उसी पर सार्वजनिक फटकार गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े करती है।
अजित पवार की शहरी मतदाताओं के बीच स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस बनाने की कवायद
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि फडणवीस का यह रुख सिर्फ वित्तीय अनुशासन तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भाजपा की यह चिंता भी छिपी है कि अजित पवार कहीं शहरी मतदाताओं के बीच स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस न बना लें। मुफ्त बस और मेट्रो जैसी घोषणाएं सीधे मध्यम वर्ग और युवा वोटरों को साधने की कोशिश मानी जा रही हैं जो अब तक भाजपा का मजबूत आधार रहे हैं। कुल मिलाकर पुणे नगर निगम चुनाव ने महायुति के भीतर छिपे अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया है। सवाल यह नहीं कि मुफ्त बस या मेट्रो चलेगी या नहीं असली सवाल यह है कि क्या भाजपा और अजित पवार गुट आने वाले चुनावों में एक दूसरे की राजनीतिक सीमाओं का सम्मान कर पाएंगे। अगर यह तनाव ऐसे ही खुलकर सामने आता रहा तो इसका असर सिर्फ पुणे नहीं बल्कि पूरे महाराष्ट्र की सत्ता राजनीति पर पडऩा तय है।




