अपनों ने ही शुरू कर दी बगावत, BJP-RSS पर भड़के कुशवाहा तो टूटने लगा गठबंधन!
NDA दल में शामिल नेताओं ने ही बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। दरअसल बिहार चुनाव के बाद से लगातार चर्चा में बने रहे राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा के एक बयान से सियासी छिड़ गया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: देश की सियासत में बीजेपी और आरएसएस की विचारधारों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कभी विपक्ष ने सवाल उठाए तो कभी बीजेपी-आरएसएस में खुद ही आपसी कलह की खबरें सामने आई तो कभी NDA के नेताओं ने सवाल उठाकर राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ाने का काम बखूबी किया है।
वहीं इसी बीच NDA दल में शामिल नेताओं ने ही बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। दरअसल बिहार चुनाव के बाद से लगातार चर्चा में बने रहे राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा के एक बयान से सियासी छिड़ गया है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी और वे स्वयं BJP-RSS की वैचारिक सोच से सहमत नहीं हैं। उनके इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और राजनीतिक गलियारों में इसे कई मायनों में अहम माना जा रहा है।
उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि लोकतंत्र में हर दल और संगठन को अपनी विचारधारा रखने का अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय लोक मोर्चा की सोच BJP-RSS की वैचारिक दिशा से मेल नहीं खाती। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी राजनीति सामाजिक न्याय, समानता और समावेशी विकास पर आधारित है, जबकि BJP-RSS की विचारधारा इससे अलग दिशा में जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति में गठबंधन केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि विचार और सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए। अगर विचारधाराओं में बुनियादी अंतर हो, तो साथ चलना कठिन हो जाता है। कुशवाहा ने यह संकेत भी दिया कि आने वाले समय में उनकी पार्टी अपने राजनीतिक फैसले पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से लेगी।
दरअसल बिहार में इन दिनों नेताओं के पाला बदलने के खबरें तेज हो गई हैं जिस वजह से NDA नेताओं ने अपने सहयोगी दलों पर ही ऊँगली उठानी शुरू कर दी है। इसी बीच जदयू के पूर्व प्रदेश सचिव डाॅ. चंदन यादव अपने समर्थकों के साथ हाल ही में राष्ट्रीय लोक मोर्चा में शामिल हो गए। मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं राज्यसभा सदस्य उपेंद्र कुशवाहा ने उन्हें सदस्यता दी। कुशवाहा ने कहा कि डाॅ. चंदन यादव एवं इनके साथियों के पार्टी में आने से मगध समेत अन्य जिलों में पार्टी मजबूती होगी। इसके साथ ही उन्होंने साफ किया कि उनकी पार्टी किसी को तोड़कर नहीं ला रही है, बल्कि जो लोग अपनी पुरानी पार्टी छोड़कर आ रहे हैं, वे अपनी मर्जी से रालोमो में शामिल हो रहे हैं. उनके इस बयान को बिहार की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में बेहद अहम माना जा रहा है, जहां दलों के भीतर असंतोष और टूट की चर्चाएं लगातार सुर्खियों में हैं.
हालांकि इसे लेकर उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि किसी पार्टी में टूट हो रही है या नहीं, यह उस दल का आंतरिक मामला है. लेकिन जो व्यक्ति या नेता टूटकर कहीं और जाता है, वह उसका निजी और राजनीतिक निर्णय होता है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि रालोमो किसी को जबरन या प्रलोभन देकर नहीं ला रही है. पार्टी में जो भी आ रहा है, वह अपनी सोच और राजनीतिक दिशा तय करके आ रहा है. एक तरफ जहां कुशवाहा की पार्टी में JDU के नेता शामिल हुए तो वहीं दूसरी तरफ कुशवाहा की पार्टी के नेता ही अपनों से मुँह मोड़ते हुए दिखाई दिए।
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के तीन बागी विधायक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन से मिले हैं। वे बीते शुक्रवार को नितिन नबीन की ओर से दिए गए दही-चूड़ा भोज में शामिल हुए। आरएलएम के बागी विधायक माधव आनंद, रामेश्वर महतो और आलोक कुमार सिंह हैं। इन तीनों विधायकों के बारे में कयास लगाए जा रहे हैं कि ये बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। दूसरी तरफ जदयू के विधायक भगवान सिंह कुशवाहा ने रालोमो के तीन विधायकों के लिए जदयू के दरवाजे खोल दिए हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि तीनों विधायक बागी हो गए हैं। ऐसे में वे जदयू में आना चाहें तो उनका स्वागत है। उनका बयान सियासी चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि कुशवाहा की पार्टी के तीन विधायक माधव आनंद, रामेश्वर महतो एवं आलोक सिंह ने अपना पत्ता नहीं खोला है। मगर इन विधायकों का बीजेपी की दही चूड़ा पार्टी में शामिल होना बड़ा संकेत दे रहा है।
दरअसल सियासी पंडितों की मानें तो आरएलएम में बगावत की आग तभी से सुलगने लगी थी जब उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को बिना चुनाव लड़े ही मंत्री बनवा लिया था। उपेंद्र कुशवाहा ने 24 दिसंबर 2025 को लिट्टी चोखा का भोज दिया था, जिसमें यह तीनों विधायक शामिल नहीं हुए थे। ठीक इस भोज के समय यह तीनों विधायक नितिन नबीन से मिलने के लिए उनके आवास पर गए थे। यानी आरएलएम के विधायक नितिन नबीन के साथ दही-चूड़ा भोज से काफी पहले से अपनी खिचड़ी पका रहे थे।
उपेंद्र कुशवाहा के परिवारवाद का बुरा असर उनकी पार्टी पर पड़ता दिखाई देने लगा है। इसके साथ-साथ उनके पुत्र और बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का राजनीतिक भविष्य भी अधर में लटकता नजर आने लगा है। उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी यदि टूटती है तो वे बिहार सरकार से बाहर हो सकते हैं। बिहार में आरएलएम के कुल 4 विधायक हैं जिनमें से तीन विधायक बगावत पर उतारू हैं। सियासी गलियारों में यह भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि पार्टी के चार में से तीन बागी विधायक एनडीए के भीतर ही संगठन पर अपना दावा ठोकने की तैयारी कर रहे हैं। यदि पार्टी टूटती है तो दीपक प्रकाश छह महीने के भीतर विधान परिषद सदस्य नहीं बन सकेंगे। यदि वे एमएलसी नहीं बने तो उनका मंत्री पद छिन जाएगा।
उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए में एक मंत्री पद का कोटा मिला था। उनकी पत्नी सासाराम से विधायक हैं। कुशवाहा उन्हें मंत्री बनवा सकते थे, लेकिन उन्होंने उनके बजाय अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनवा दिया, जबकि दीपक प्रकाश ने चुनाव ही नहीं लड़ा। वे अब तक न तो विधानसभा सदस्य हैं न विधान परिषद के सदस्य हैं। इसके विरोध में पार्टी के वे तीन विधायक जो कुशवाहा के परिवार से नहीं हैं, बागी हो गए हैं। विधायक रामेश्वर महतो, माधव आनंद और आलोक कुमार सिंह का कहना है कि वे कुशवाहा के साथ ‘वंशवाद’ के खिलाफ लड़ने आए थे, लेकिन यहां तो ‘परिवार बचाओ और बढ़ाओ’ की राजनीति हो रही है। कुशवाहा ने आरएलएम को परिवार की पार्टी बना दिया है। उपेंद्र कुशवाहा की ‘लिट्टी-चोखा पार्टी’ से किनारा करने वाले यह तीनों विधायक अब बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन की दही-चूड़ा पार्टी में पहुंचे और उनसे मुलाकात की। जिसके बाद से अटकलों का बाजार गर्म है।
इसके साथ ही इसी बीच कुशवाहा का बीजेपी-आरएसएस पर भड़कना और उसके साथ ही उपेन्द्र कुशवाहा ने जातिगत जनगणना, आरक्षण और पिछड़े-अतिपिछड़े वर्गों के अधिकारों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इन सवालों पर उनकी पार्टी का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में कमजोर वर्गों के मुद्दों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, जिसे राष्ट्रीय लोक मोर्चा किसी भी हाल में स्वीकार नहीं करेगा। उनके इस बयान को आगामी चुनावी समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। सियासी जामकारों का मानना है कि कुशवाहा का यह बयान भाजपा-नेतृत्व वाले गठबंधन से दूरी का संकेत भी हो सकता है। इससे बिहार की सियासत में नए समीकरण बनने की संभावना बढ़ गई है।
बयान के बाद विपक्षी दलों ने जहां इसे साहसिक कदम बताया है, वहीं भाजपा समर्थक खेमे में इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अब ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा का बयान जहां पार्टी की स्थिति को मजबूत दिखाने की कोशिश करता है, वहीं नाराज विधायकों की गतिविधियां यह इशारा करती हैं कि अंदरखाने कुछ असंतोष भी है. बिहार की राजनीति में यह दौर बयानबाजी और मुलाकातों से आगे बढ़कर आने वाले समय में बड़े समीकरणों का आधार बन सकता है. फिलहाल इतना तय है कि “कौन टूट रहा है और कहां जा रहा है” वाला सवाल अब सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक चर्चा का केंद्र बन चुका है. कुल मिलाकर उपेन्द्र कुशवाहा का यह बयान बिहार की राजनीति में नई बहस और चर्चा को नया सियासी रूप देता हुआ नजर आ रहा है। इन सब सियासी उठापटक के बीच कुशवाहा ने जो बीजेपी-आरएसएस पर तंज कसते हुए विचारधारा की बात कही है उसने प्रदेश में नई राजनीति को जन्म देने की अटकलें बढ़ा दी हैं।



