बुलडोजर की कार्रवाई और एक्यूआई

  • आखिर क्यों हो रही है अशांत दिल्ली
  • दो दिन, दो घटनाएं सुलगते सवाल

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली अशांत है, सवालों के घेरे में है और हालिया कार्रवाईयों से दिल्ली सरकार की नीयत पर सवाल उठना शुरू हो गये हैं। जेएनयू की घटना के ठीक दूसरे दिन तुर्कमान गेट इलाके में अवैध निर्माण तोडऩे के लिए इक्टठा हुई 32 जेसीबी मशीनों की अफवाहों के बादल से ईंट, पत्थर के बाद लोगों पर बरसी पुलिस की लाठियों ने हालात बेकाबू कर दिये और एक नई बहस को जन्म दे दिया। एक्यूआई पर घिर रही रेखा सरकार को फिलहाल फौरी राहत मिलती दिखाई दे रही है। नीति निर्धारक चाहते भी यही थे गैस चैंबर बनती दिल्ली की ब्रांड को राहत मिले मौसम ठीक होगा तो हालात भी ठीक हो जाएंगे। भारत के विपक्षी राजनीतिक दल सवाल यही उठा रहे हैं कि दिल्ली मे लगातार दो दिन दो प्रयोग किये गये क्या वह माहौल बदलने के लिए हुए? क्योंकि अवैध अतिक्रमण इससे पहले भी हटाये गये हैं लेकिन इस तरह नहीं जिस तरह तुर्कमान गेट के आसपास हटाये गये।

जेएनयू केसवालों से डरती सत्ता?

हर दौर में हर सरकार के लिए जेएनयू असहज रहा है। क्योंकि यहां सवाल पूछे जाते हैं। यहां सहमति अनिवार्य नहीं होती। यहां तर्क इतिहास और विचार टकराते हैं। जेएनयू के नारे कोई नई बात नहीं। नई बात यह है कि उन्हें किस वक्त और किस अंदाज में उछाला जाता है। जब बेरोजगारी पर बात होनी चाहिए जब महंगाई पर सवाल उठने चाहिए जब प्रदूषण पर जवाबदेही तय होनी चाहिए तब अचानक जेएनयू का वीडियो वायरल हो जाता है। तब अचानक देशभक्ति की परीक्षा शुरू हो जाती है। तुर्कमान गेट और जेएनयू को एक साथ देखने का मतलब यह नहीं कि हालात वही हैं। लेकिन यह जरूर है कि सत्ता का व्यवहार वही पुराना है। तब भी गरीब आसान निशाना थे। आज भी हैं। तब भी सवाल पूछने वाले असुविधाजनक थे। आज भी हैं। फर्क बस इतना है कि अब बुलडोजर के साथ कैमरा भी है। और आदेश के साथ नैरेटिव भी।

तुर्कमान गेट सिर्फ एक घटना नहीं

1976 का तुर्कमान गेट कोई सामान्य घटना नहीं थी। वह सत्ता की घबराहट का प्रतीक थी। आपातकाल के दौर में शहर को सुंदर बनाने के नाम पर गरीबों की बस्तियां उजाड़ दी गयी कानून व्यवस्था का बहाना बना लेकिन असल में सवाल पूछने वालों को कुचल दिया गया। तुर्कमान गेट इसलिए याद किया जाता है क्योंकि वह बताता है कि जब सत्ता असहज होती है तो सबसे पहले हाशिये के लोगों पर वार होता है। आज जब उस घटना को फिर से बहस में लाया जाता है तो यह सिर्फ इतिहास नहीं होता यह एक संदेश होता है।

जवाब कौन देगा?

दिल्ली की राजनीति में इस वक्त एक और नाम चर्चा में है और वह है सीएम रेखा गुप्ता का नाम। उन पर उठते सवाल सिर्फ प्रशासनिक नहीं हैं बल्कि पैसे की बर्बादी और प्राथमिकताओं की विफलता से जुड़ रहे हैं। करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं योजनाएं बन रही हैं फाइलें चल रही हैं लेकिन जमीन पर न हवा सुधर रही है न जिंदगी। सवाल यह है कि जब राजधानी गैस चैंबर बन चुकी है तब पैसा किस दिशा में बहाया जा रहा है? और क्यों हर बार बहस को दूसरी तरफ़ मोड़ दिया जाता है? दिल्ली के लोग यह पूछ रहे हैं कि एक्यूआई से निपटने के लिए जो बजट आया उसका हिसाब कौन देगा? प्रदूषण से लडऩे के नाम पर हुए खर्च का ऑडिट क्यों नहीं? लेकिन इन सवालों का जवाब देने की बजाय माहौल को गरम किया जा रहा है। भावनाओं से, नारों से और इतिहास की राख से।

एफआईआर दर्ज 10 हिरासत में

दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में अवैध अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद तनाव की स्थिति है। पत्थरबाजी की घटना को लेकर दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। इस मामले में करीब 10 लोगों को भी हिरासत में लिया गया है। पुलिस के मुताबिक तुर्कमान गेट के पास फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास के इलाके में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है जहां देर रात एमसीडी ने अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया। पत्थरबाजी की घटना के सिलसिले में अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। अभी सीसीटीवी फुटेज और बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग की मदद से पत्थर फेंकने वालों की पहचान की जा रही है।

मलिक मोतासिम खान ने उठाये सवाल

जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतासिम खान ने दिल्ली के तुर्कमान गेट के पास अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि तुर्कमान गेट के पास मस्जिद को लेकर मुसलमानों का मानना है कि यह वक्फ की जमीन है और उनकी प्रॉपर्टी है। मस्जिद के नजदीक मुस्लिम समुदाय के लोगों ने दवाखाना, बारात घर और कुरान की तालीम के लिए कुछ कमरे बनाए थे। मस्जिद के साथ उससे जुड़ी हुई एक जगह होती है जहां लोग नमाज के लिए तैयारी करते हैं। मुसलमानों का कहना है कि यह वक्फ की जमीन है जबकि सरकार का दावा है कि यह सरकारी जमीन है और इस पर कब्जा किया गया है। यही असली विवाद है। उन्होंने कहा इतनी जल्दी कार्रवाई की गई? यह प्रशासन की ज्यादती है। मान लिया जाए कि अवैध अतिक्रमण था लेकिन वहां बने वजूखाने और अन्य सुविधाओं को लेकर बातचीत हो सकती थी। रात को बुलडोजर और ट्रक लेकर आए व सैकड़ों पुलिसवाले खड़े हो गए जिससे दहशत फैली।

हवा जहरीली लेकिन टीवी पर बहसें सुरीली

दिल्ली इस वक्त दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में एक हैं। एक्यूआई जानलेवा स्तर पर है। स्कूल बंद हैं अस्पताल भरे हुएं और लोगों को सांस लेना एक चुनौती बन चुका है। लेकिन टीवी स्क्रीन पर हवा नहीं दिखती। दम घुटता नहीं दिखता। दिखते हैं तो सिर्फ नारे, विवाद, और उबाल। यह संयोग है? या रणनीति? जब सवाल सरकार से पूछे जाने चाहिए कि हवा जहरीली क्यों है समाधान क्यों नहीं है और जवाबदेही किसकी है तब बहस मोड़ दी जाती है राष्ट्रविरोधी नारे की ओर। तब कैमरे पहुंच जाते हैं विश्वविद्यालयों में। तब इतिहास से तुर्कमान गेट निकालकर वर्तमान में फिट कर दिया जाता है।

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