हेट स्पीच में बीजेपी सीएम का नाम लेने पर भड़के CJI,  रद्द की याचिका

असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के चुनाव से पहले ही शायद बुरे दिन शुरु हो चके हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क:असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के चुनाव से पहले ही शायद बुरे दिन शुरु हो चके हैं।

एक ओर जहां हिमंता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार करते हुए बड़ी राहत दी है और इसको राजनीति घटनाक्रम मानते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने का आदेश जारी किया तो वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट से बच कर निकलने के बाद भी बेंगलूरु में हिमंता के खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज हो गई है और पूरे मामले पर बेंगलूरु पुलिस न सिर्फ बडा एक्शन ले सकती है बल्कि गिरफ्तारी तक मामला जा सकता है।  ऐसे में असम चुनाव के बीच में हिमंता की न सिर्फ मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं बल्कि सुप्रीम कोर्ट में दायर एक और याचिका हिमंता के लिए जी जंजाल बनने वाली है। कैसे बेंगलूरु में हिमंता के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और कैसे सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका हिमंता के लिए जी का जंजाल बनने वाली है.

असम में जब से चुनाव करीब आए हैं सीएम हिमंता बिस्वा सरमा चुनाव जीतने के लिए नफरती पॉलिटिक्स के पोस्टर बॉय बनने की कोशिश में लगे हैं।

पिछले दिनों उन्होंने असम के मुस्मिलों को मियां कहते हुए उसके वोट कटवाने, उनको पांच के जगह चार रुपए देने सहित कई विवादित बयान दिए। हिमंता का दावा था कि वो मुस्लिम को नहीं बल्कि बांग्लादेशी मुस्लिमों के लिए कह रहे हैं लेकिन क्योंकि मियां का मतलब बंगाल से मुस्लिमों से होता है इसलिए मुस्लिम समाज मना रहा है कि ये सीधे मुस्लिमों पर करारा वार है। इसलिए मुस्लिम संगठन जमीअत-उल-उमेला’-ए-हिंद और अन्य मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया था, यहां तक कि मुस्लिमों संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ याचिका भी दायर की थी लेकिन जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने इसको एक राजनीति याचिका और चुनाव के समय होने वाला बवंडर मानते हुए न सिर्फ याचिका को सुनने से इंकार कर दिया बल्कि साफतौर पर कहा कि इस को पहले गुवाहटी हाईकोर्ट ले जाने की सलाह दे दी। याचिका में हिमंत के खिलाफ एफआईआर के साथ एफआईटी गठित करने की मांग वायरल वीडियो के विरुद्ध की गई थी।

पिछले दिनों असम बीजेपी के एक्स हैंडल पर एक वीडियो डाउनलोड किया गया था। जिसमें हिमंता के मुस्लिम समुदया के लोगों पर निशाने राइफल से निशाना लगाते हुए दिख रहे थे। हालांकि जैसे ही ये वीडियो वायरल हुआ और हंगामा बढ़ा तो तुरंत की इस वीडियो को डिलीट करा दिया गया लेकिन एक बीजेपी के अधिकारिक एक्स से वीडियो अपलोड होना और इसमें सीएम का होना न सिर्फ ये उनके संवैधानिक पद की मार्यादा पर सवाल खड़ा करता है नो मर्सी जैसे शब्द सीएम की गरिमा को भी ठेंस पहुंचाते है। हलांकि इस पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट ने सुनने से इंकार कर दिया है लेकिन अब बेंगलूरु में हिमंता के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई है।

खबरों के अनुसार बेंगलुरु के एक पुलिस स्टेशन में हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ आईपीसी और भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि नफरती भाषण यानी श्हेट स्पीच। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि हिमंता ने चुनावी रैलियों और सार्वजनिक मंचों से एक खास समुदाय के खिलाफ जहर उगला है। आरोप ये है कि उनके शब्द समाज को जोड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसे दो हिस्सों में बांटने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। बेंगलुरु की धरती से उनके खिलाफ उठी यह आवाज इस बात का सबूत है कि भले ही आप असम में मुख्यमंत्री हों, लेकिन आपके शब्द अगर देश के सौहार्द को बिगाड़ेंगे, तो कानून के हाथ आप तक जरूर पहुँचेंगे। सवाल ये है कि क्या हिमंता बेंगलुरु पुलिस का सामना करेंगे या सत्ता की ढाल के पीछे छिपेंगे?

  इससे पहले इसी मामले को लेकर एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी हैदराबाद में एफआईआर करा चुके हैं। ऐसे में भले से ही सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इंकार कर दिया हो लेकिन लगातार हिमंता की मुश्किलें लगातार हो रहे एफआईआर से बढने वाली है।  आज भी सुप्रीम में आज भी हेड स्पीच को लेकर एक याचिका दायर की गई थी,  जिसमें हिमंता के पुराने बयानों पर कार्रवाई की मांग की गई थी। हालांकि, तकनीकी आधार पर कोर्ट ने फिलहाल सुनवाई से इनकार कर दिया, लेकिन इसके पीछे का संदेश बड़ा गहरा है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि हेट स्पीच यानी नफरती भाषण देने वालों पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे वो कोई भी हो।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उच्च संवैधानिक पद पर बैठे लोगों के नफरत भड़काने वाले बयानों को लेकर दाखिल याचिका को कुछ खास लोगों के खिलाफ बताया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को राजनीति के परे जाकर याचिका दाखिल करनी चाहिए.याचिकाकर्ता ने कुछ लोगों का जिक्र किया है और कई दूसरे लोगों के बयानों को सुविधापूर्वक तरीके से छोड़ दिया है।

याचिकाकर्ताओं के लिए पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने माना कि याचिका में कुछ खास नेताओं का नाम लिखना सही नहीं था. उन्होंने दो हफ्ते में संशोधित याचिका दाखिल करने की बात कही। सामाजिक कार्यकर्ता रूप रेखा वर्मा समेत 12 लोगों की याचिका में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मुस्लिम-विरोधी वीडियो समेत यूपी, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश के नेताओं के भी बयानों का जिक्र किया गया था। सप्रीम कोर्ट ने कहा कि – हम भी चाहते हैं कि समाज में भाईचारा हो और लोग जिम्मेदारी से अपने बयान दें, लेकिन अगर याचिकाकर्ता का मकसद कुछ खास लोगों को ही निशाना बनाना हो, तो ऐसी याचिका की सुनवाई नहीं हो सकती। हालांकि माना जा रहा है कि अगले हफ्ते ये याचिका फिर से दायर होगी तो इसमे हेड स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट बड़ा फैसला सुना सकती है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट में लगातार असम सीएम को मिली राहत को हिमंता की टीम भुनाने की  कोशिश की, लेकिन असल में कानून का शिकंजा कसता जा रहा है। कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर मामले को निचली अदालतों या संबंधित राज्यों की पुलिस के पाले में डाल दिया है। यानी अब हिमंता को हर उस राज्य की पुलिस को जवाब देना होगा, जहाँ उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज हैं। अब मुख्यमंत्री को वकीलों की फौज तैयार करनी होगी, क्योंकि बेंगलुरु की एफआईआर सिर्फ शुरुआत है!

हिमंता बिस्वा सरमा कभी कांग्रेस के संकटमोचक थे, आज बीजेपी के पोस्टर बॉय हैं। लेकिन इस पोस्टर के पीछे जो सच्चाई है, वो डराने वाली है। हिमंता ने अपनी राजनीति का आधार ही धु्रवीकरण को बना लिया है। कभी मिया मुसलमानों के खिलाफ बयान, कभी मदरसों पर ताले लगाने की बात, तो कभी राहुल गांधी के खिलाफ अभद्र टिप्पणियां। एक मुख्यमंत्री का काम होता है सबको साथ लेकर चलना, विकास की बातें करना। लेकिन हिमंता के भाषणों में विकास कम और दुश्मन की तलाश ज्यादा दिखती है। क्या यह एक मुख्यमंत्री को शोभा देता है कि वो लगातार नफरत की आग में घी डालने का काम करे?

बेंगलुरु में दर्ज एफआईआर इसी राजनीति के खिलाफ एक बड़ा प्रहार है। यह संदेश है कि बोली अगर गोली का काम करेगी, तो कानून अपना काम जरूर करेगा। जिस तरह से लगातार हिमंता बिस्वा सरमार के खिलाफ एफआईआर हो रहे हैं और इसी के साथ असम में चुनाव होते हैं और ऐसे में अगर हैदराबार से लेकर बेंगलूरु ने जांच शुरु की तो मामला बीच चुनाव में फंस सकता है।  ऐसे में बड़ा सवाल कि क्या हिमंता बिस्वा सरमा गिरफ्तार होंगे?  बेंगलुरु पुलिस ने अगर अपनी जांच को ईमानदारी से आगे बढ़ाया, तो हिमंता को पूछताछ के लिए हाजिर होना पड़ेगा। और अगर सबूत पुख्ता हुए, तो गिरफ्तारी की नौबत भी आ सकती है।

असम में बैठकर धमकियां देना आसान है, लेकिन जब दूसरे राज्य की पुलिस कानून की किताब लेकर खड़ी होती है, तो सत्ता की हनक फीकी पड़ जाती है। क्या बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व हिमंता को बचाने के लिए आगे आएगा? या फिर अपनी कुर्सी और इमेज को बचाने के लिए हिमंता को खुद ही बेंगलुरु के चक्कर काटने पड़ेंगे? यह मामला सिर्फ एक एफआईआर का नहीं है, बल्कि यह उन सभी नेताओं के लिए चेतावनी है जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए नफरत का सहारा लेते हैं। आज बेंगलुरु में एफआईआर हुई है, कल किसी और शहर में होगी। कानून का पहिया धीरे चलता है, लेकिन जब चलता है तो बड़े-बड़े सूरमाओं को धूल चटा देता है। अब देखना ये है कि हिमंता अपनी जुबान पर लगाम लगाते हैं या फिर सलाखों की ओर अपने कदम बढ़ाते हैं।

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