तुण्डारे बाबा मंदिर के संरक्षण का शुभारम्भ
झाड़ियों में दबी विरासत को मिली नई सांस

- एएसआई ने शुरू कराया वैज्ञानिक साफ-सफाई और संरक्षण कार्य
- अधिवक्ता एवं समाजिक कार्यकर्ता सैय्यद मोहम्मद हैदर रिज़वी के प्रयासों से सीतापुर के ऊंचगांव में पुरातात्विक धरोहर को बचाने की पहल शुरू
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। इतिहास जब उपेक्षा की झाडिय़ों में गुम होने लगे विरासत पर अतिक्रमण के साये मंडराने लगें और पुरखों की निशानियां समय की धूल में दबने लगें तब उन्हें बचाने की लड़ाई सिर्फ पत्थरों को बचाने की लड़ाई नहीं रह जाती। यह अपनी ऐतिहासिक स्मृति सांस्कृतिक पहचान और आने वाली पीढिय़ों के प्रति जिम्मेदारी का सवाल बन जाती है। सीतापुर के महमूदाबाद तहसील स्थित ऊंचगांव के प्राचीन तुण्डारे बाबा मंदिर के संरक्षण की शुरुआत इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वर्षों से उपेक्षा और झाडिय़ों से घिरे इस ऐतिहासिक स्थल पर अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने आवश्यक अनुमतियां प्राप्त होने के बाद वैज्ञानिक साफ-सफाई और संरक्षण संबंधी कार्य प्रारम्भ कर दिया है।
इस पहल के पीछे लखनऊ के अधिवक्ता और विरासत संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता सैय्यद मोहम्मद हैदर रिज़वी के निरंतर प्रयास रहे हैं। पत्राचार से लेकर जनप्रतिनिधियों से संवाद और सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से जानकारी जुटाने तक, उन्होंने इस भूले-बिसरे स्मारक का विषय संबंधित अधिकारियों के समक्ष लगातार उठाया। अब संरक्षण प्रक्रिया का आरम्भ उन प्रयासों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
1955-56 के उत्खनन में सामने आया था स्थल
उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, तुण्डारे बाबा मंदिर का यह स्थल वर्ष 1955-56 में हुए उत्खनन के दौरान प्रकाश में आया था। पुरातात्विक महत्व से जुड़े इस स्थल पर समय के साथ उपेक्षा और झाडिय़ों का विस्तार होता गया। ऐतिहासिक महत्व रखने वाली धरोहरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि समय रहते उनकी पहचान, सुरक्षा और संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। एएसआई द्वारा संरक्षण संबंधी कार्रवाई शुरू होना इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। वैज्ञानिक तरीके से साफ-सफाई और संरक्षण कार्य से स्थल की स्थिति को समझने तथा उसकी ऐतिहासिक विशेषताओं को सुरक्षित रखने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, धरोहर के इतिहास, काल निर्धारण और पुरातात्विक विशेषताओं से जुड़े निष्कर्ष प्रमाणित अभिलेखों एवं विशेषज्ञों के अध्ययन के आधार पर ही सामने आने चाहिए।
सामाजिक जिम्मेदारी और साझा विरासत व सद्भाव का सवाल
रिज़वी का मानना है कि विरासत का संरक्षण केवल प्राचीन ईंटों और पत्थरों को बचाना नहीं, बल्कि समाज की साझा सांस्कृतिक स्मृतियों और इतिहास को सुरक्षित रखना भी है। किसी ऐतिहासिक स्थल का महत्व उसकी स्थापत्य विशेषताओं तक सीमित नहीं होता, वह स्थानीय समाज की स्मृतियों, परंपराओं और ऐतिहासिक पहचान से भी जुड़ा होता है। तुण्डारे बाबा मंदिर का संरक्षण क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर को नई पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकता है। इससे स्थानीय लोगों में अपनी विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने और आने वाली पीढिय़ों को इतिहास से जोडऩे का अवसर भी मिलेगा।
एक स्मारक की खोज से शुरू हुई विरासत बचाने की मुहिम
सैय्यद मोहम्मद हैदर रिज़वी ने बताया कि ख़ैराबाद, सीतापुर स्थित मक्का दर्जी स्मारक के संरक्षण के प्रयासों के दौरान उन्हें तुण्डारे बाबा मंदिर के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने इस स्थल की स्थिति और संरक्षण की आवश्यकता को लेकर संबंधित अधिकारियों तक बात पहुंचाने के प्रयास किए। लगातार पत्राचार, जनप्रतिनिधियों से संवाद और सूचना का अधिकार अधिनियम के उपयोग के जरिए उन्होंने इस विषय को आगे बढ़ाया। यह घटनाक्रम बताता है कि ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में जागरूक नागरिकों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। सरकारी विभागों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले संरक्षण कार्यों को गति देने के लिए नागरिकों की पहल, अभिलेखों की पड़ताल और निरंतर संवाद कई बार उपेक्षित विषयों को फिर से चर्चा में ला सकते हैं।
विरासत बचेगी, तभी इतिहास की कड़ी आगे बढ़ेगी
तुण्डारे बाबा मंदिर में संरक्षण कार्य की शुरुआत एक उम्मीद जगाती है कि उपेक्षित ऐतिहासिक स्थलों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित रखने के प्रयास निरंतर आगे बढ़ेंगे। अब महत्वपूर्ण होगा कि संरक्षण कार्य विशेषज्ञों की देखरेख में निर्धारित मानकों के अनुरूप आगे बढ़े और स्थल के ऐतिहासिक महत्व से संबंधित प्रमाणित जानकारी भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।



