ED के शिकंजे में पूर्व कलेक्टर, गुजरात सरकार ने किया सस्पेंड, ब्यूरोक्रेसी में हड़कंप
पूर्व कलेक्टर राजेंद्र पटेल की मुश्किलें और बढ़ गई हैं... प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बीच गुजरात सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया है...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात में हाल ही में एक बड़े भ्रष्टाचार के मामले ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिला दिया है.. 2015 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. राजेंद्र कुमार पटेल.. जो सुरेंद्रनगर जिले के पूर्व कलेक्टर थे.. उनको प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया है.. यह गिरफ्तारी रिश्वतखोरी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के एक केस में हुई है.. जिसमें कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग में बदलने के आवेदनों को मंजूरी देने के बदले में रिश्वत लेने का आरोप है.. गुजरात सरकार ने भी उन्हें तुरंत सस्पेंड कर दिया है.. यह मामला न केवल गुजरात की नौकरशाही में हलचल मचा रहा है.. बल्कि पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की मिसाल बन सकता है..
आपको बता दे कि डॉ. राजेंद्र कुमार पटेल मूल रूप से गुजरात के अहमदाबाद के रहने वाले हैं.. और उन्होंने डेंटल सर्जरी की पढ़ाई पूरी की.. और फिर यूपीएससी परीक्षा पास करके आईएएस बने.. सुरेंद्रनगर कलेक्टर के रूप में उनकी पोस्टिंग के दौरान यह कांड हुआ.. ईडी की जांच से पता चला कि उन्होंने.. और उनके साथी अधिकारियों ने एक संगठित रैकेट चलाया था.. जिसमें रिश्वत की रकम का बंटवारा तय था.. इस मामले ने गुजरात की आईएएस लॉबी पर बड़ा दाग लगाया है.. और चर्चा है कि आगे और भी खुलासे हो सकते हैं.. अब हम इसकी शुरुआत से लेकर वर्तमान स्थिति तक विस्तार से देखते हैं..
डॉ. राजेंद्र कुमार पटेल 2015 बैच के गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी हैं.. उन्होंने अपनी सेवा की शुरुआत में विभिन्न पदों पर काम किया.. और हाल ही में सुरेंद्रनगर जिले के कलेक्टर बने.. कलेक्टर के रूप में उनकी जिम्मेदारी जिले की प्रशासनिक व्यवस्था संभालना थी.. जिसमें राजस्व संबंधी मामले, भूमि उपयोग में बदलाव.. और अन्य महत्वपूर्ण फैसले शामिल थे.. सुरेंद्रनगर गुजरात का एक महत्वपूर्ण जिला है.. जहां कृषि और औद्योगिक विकास तेजी से हो रहा है.. यहां कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग में बदलने के लिए कई आवेदन आते हैं.. जिसमें फैक्ट्री, आवासीय कॉलोनी या व्यावसायिक उपयोग आदि शामिल थे..
जानकारी के मुताबिक गुजरात सरकार की इंटीग्रेटेड ऑनलाइन रेवेन्यू एप्लीकेशंस पोर्टल पर ऐसे आवेदनों को जमा किया जाता है.. कलेक्टर के पास इनकी अंतिम मंजूरी का अधिकार होता है। पटेल के समय में.. ईडी की जांच से पता चला कि इन आवेदनों को तेजी से पास करने के लिए एक तय रेट पर रिश्वत ली जा रही थी.. रिश्वत की दर 5 से 10 रुपये प्रति वर्ग मीटर तक थी.. इससे साफ होता है कि यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं था.. बल्कि एक संगठित गिरोह का काम था.. पटेल को पिछले हफ्ते कलेक्टर पद से हटा दिया गया था.. जब ईडी ने उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया..
पटेल का बैकग्राउंड देखें तो वे एक पढ़े-लिखे और योग्य अधिकारी लगते थे.. बीडीएस करने के बाद उन्होंने सिविल सर्विसेज ज्वॉइन की.. लेकिन सुरेंद्रनगर में उनकी पोस्टिंग ने उन्हें भ्रष्टाचार के जाल में फंसा दिया.. चर्चा है कि इस रैकेट में शामिल अन्य अधिकारी भी थे.. जैसे डिप्टी मामलातदार चंद्रसिंह मोरी, आवासीय अतिरिक्त कलेक्टर आरके ओझा, मामलातदार मयूर दवे.. और क्लर्क मयूर सिंह गोहिल शामिल थे.. ईडी ने इनके बीच रिश्वत के बंटवारे का पूरा हिसाब-किताब उजागर किया है..
वहीं यह मामला दिसंबर 2025 के अंत में सामने आया.. जब ईडी ने सुरेंद्रनगर कलेक्टरेट में छापेमारी की.. ईडी ने डिप्टी मामलातदार चंद्रसिंह मोरी के घर से 67.5 लाख रुपये नकद जब्त किए.. मोरी को गिरफ्तार किया गया और पूछताछ में उन्होंने पूरा रैकेट उगल दिया.. मोरी ने बताया कि रिश्वत की रकम का 50 फीसदी हिस्सा कलेक्टर पटेल को जाता था.. 10 फीसदी खुद मोरी को, 25 फीसदी अतिरिक्त कलेक्टर ओझा को, 10 फीसदी मामलातदार दवे को.. और 5 फीसदी क्लर्क गोहिल को जाता था.. यह बंटवारा एक तय फॉर्मूले के अनुसार था..
ईडी की जांच से पता चला कि सुरेंद्रनगर में सौराष्ट्र घारखेड टेनेंसी सेटलमेंट एंड एग्रीकल्चरल लैंड्स ऑर्डिनेंस.. 1949 के तहत लैंड यूज चेंज के आवेदनों को प्रोसेस करने में यह रैकेट चल रहा था.. पटेल खुद आईओआरए पोर्टल से आवेदनों को डाउनलोड करते थे.. और रिश्वत की दर तय करते थे.. ईडी ने एक ‘हिसाब शीट’ बरामद की.. जिसमें 800 से ज्यादा आवेदनों का जिक्र था.. और इनसे कुल 10 करोड़ रुपये से ज्यादा की रिश्वत इकट्ठा की गई थी..
24 दिसंबर 2025 को पटेल को कलेक्टर पद से हटा दिया गया.. और बिना किसी नई पोस्टिंग के ट्रांसफर कर दिया गया.. इसके बाद, 2 जनवरी 2026 को ईडी ने पटेल को गांधीनगर से गिरफ्तार किया.. और उन्हें अहमदाबाद की स्पेशल PMLA कोर्ट में पेश किया गया.. जहां जज केएम सोजित्रा ने उन्हें 7 जनवरी तक ईडी की कस्टडी में भेज दिया.. ईडी ने 10 दिन की रिमांड मांगी थी.. लेकिन कोर्ट ने 5 दिन दी.. ईडी का कहना है कि पटेल से पूछताछ जरूरी है.. क्योंकि उन्होंने रिश्वत के पैसे को लॉन्डर किया.. और इसमें और भी लोग शामिल हो सकते हैं..
गुजरात एंटी-करप्शन ब्यूरो ने भी पटेल और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की है.. एसीबी की शिकायत पर ईडी ने PMLA के तहत केस दर्ज किया.. यह जांच अब और गहराई में जा रही है.. और संभावना है कि इसमें राजनीतिक कनेक्शन भी उजागर होंगे.. आरोप बहुत गंभीर हैं.. ईडी के अनुसार, पटेल ने ‘स्पीड मनी’ के रूप में रिश्वत ली.. यानी आवेदनों को जल्दी पास करने के लिए.. लैंड यूज चेंज के लिए सौराष्ट्र क्षेत्र में विशेष नियम हैं.. और इनका दुरुपयोग किया गया.. पटेल के पर्सनल असिस्टेंट जयराजसिंह झाला रिश्वत इकट्ठा करते थे.. और पटेल को सौंपते थे.. ईडी ने मोरी के बयान का हवाला दिया.. जिसमें कहा गया कि पटेल 50% हिस्सा लेते थे..
वहीं यह रैकेट इतना संगठित था कि रिश्वत की दरें तय थीं.. 5 से 10 रुपये प्रति वर्ग मीटर थी.. अगर कोई आवेदन बड़ा होता, तो रिश्वत भी ज्यादा है.. ईडी ने दावा किया कि कुल 1500 करोड़ रुपये की भूमि से जुड़ा स्कैम है.. लेकिन रिश्वत की रकम 10 करोड़ से ज्यादा है.. यह मनी लॉन्ड्रिंग इसलिए क्योंकि रिश्वत के पैसे को वैध दिखाने के लिए इस्तेमाल किया गया.. पटेल पर यह भी आरोप है कि उन्होंने सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर किया.. पहले भी उनके खिलाफ फर्जी दस्तावेजों की शिकायत थी.. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.. अब ईडी की जांच से पूरा नेक्सस खुल रहा है.. इसमें जिला प्रशासन के कई स्तर के अधिकारी शामिल थे.. जो रिश्वत का बंटवारा कर रहे थे..
प्रवर्तन निदेशालय भारत की एक प्रमुख जांच एजेंसी है.. जो मनी लॉन्ड्रिंग और आर्थिक अपराधों की जांच करती है.. इस मामले में ईडी ने PMLA (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002) के तहत कार्रवाई की.. ईडी ने पहले मोरी को गिरफ्तार किया.. फिर पटेल को.. जांच में ईडी ने छापेमारी की.. दस्तावेज जब्त किए और गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए..
कोर्ट में ईडी ने कहा कि पटेल ने रिश्वत मांगी और ली.. जो स्पीड अप्रूवल के बदले थी.. ईडी अब पटेल के बैंक अकाउंट्स, संपत्तियों और कनेक्शंस की जांच कर रही है.. संभावना है कि इसमें और गिरफ्तारियां होंगी.. गुजरात सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने 2 जनवरी से पटेल को सस्पेंड माना है.. नियम के अनुसार अगर कोई अधिकारी 48 घंटे से ज्यादा कस्टडी में रहता है, तो सस्पेंशन अनिवार्य है..



