गलगोटिया वालों ने कटवाई नाक, मोदी के सपनों पर फिरा पानी

मोदी सरकार बार- बार दावा कर रही है कि आने वाले दिनों में भारत एआई की तीन महाशक्तियों में शामिल होगा।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या हुआ जब एक निजी ने AI समिट में जब ऐसा फर्जीवाड़ा किया जिससे न सिर्फ सरकार की फजीहत हुई बल्कि पूरी दुनिया में भारत सी नात कटवा दी।

मोदी सरकार बार- बार दावा कर रही है कि आने वाले दिनों में भारत एआई की तीन महाशक्तियों में शामिल होगा। लेकिन यह सपना किस तरह पूरा किया जाएगा इसका नमूना मोदीजी को आदर्श मानने  गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने दिल्ली के एआई इंपैक्ट समिट में पेश कर दिया है। उसने एक ऐसा कारनामा किया है जिससे न सिर्फ युनिवर्सिटी का नाम खराब हुआ है बल्कि पूरी दुनिया में भारत को मजाक का पात्र बना दिया है। इंटरनेशनल मीडिया हम पर हंस रही है। तो इस युनिवर्सिटी ने एआई समिट में ऐसा क्या प्रदर्शन किया है जिसने मोदी जी के सपनों पर पानी फेर दिया है और सरकार ने युनिवर्सिटी के खिलाफ क्या ऐक्शन लिया है.

यूपी के ग्रेटर नोएडा में एक यूनिवर्सिटी जिसका नाम गलगोटिया यूनिवर्सिटी है। इस युनिवर्सिटी ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में हिस्सा लेने के लिए इस युनिवर्सिटी की टीम ने पराए माल को अपना बता कर ऐसे परोसा की पड़ोसी देश चाइना के भी पसीने छूट गए। आप इस रोबो डॉग को देखिए।  ये कोई आम रोबो डॉग नहीं है। इस कुत्ते को गलगोटिया यूनिवर्सिटी के छात्रों ने बड़ी जी तोड़ मेहनत और लंबी तपस्या के बाद मिशन में फेल होने के बाद इंटरनेट से खरीदा है।

जिस कुत्ते को अपना बता कर युनिवर्सिटी ने एआई समिट में पेश किया उसका असली मालिक भारत नहीं बल्कि चाइना निकला। यही तो वो फॉर्मूला है जिससे मोदी जी 2047 में भारत को विकसित भारत बनाने का सपना देख रहे हैं। दरअसल हुआ ये कि DD न्यूज ने AI समिट से कल एक Video डाली जिसमें समिट के दौरान मीडिया इंटरैक्शन में गलगोटिया युनिवर्सिटी की एक महिला प्रोफेसर ने दावा किया कि उनकी गलगोटिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने “ओरियन” नामक रोबॉटिक डॉग विकसित किया है। इतना ही नहीं मैडम ये भी दावा भी किया कि यूनिवर्सिटी ने 350 करोड़ रुपये की लागत से एआई लैब स्थापित करने की योजना बनाई है। उन्होंने यह भी बताया कि यह मशीन निगरानी और मॉनिटरिंग करने में सक्षम है और कैंपस में कहीं भी घूम सकती है।

जिस रोबो डॉग को मंत्री अश्विनी वैष्णव से लेकर गलगोटिया युनिवर्सिटी और दूरदर्शन तक ने इसे भारतीय आविष्कार बताने में कोई कसर नही छोड़ी। जिसे मोदी जी का विजन बताया गया। उसकी असलियत सामने आने वाली थी। इस वीडियो के वायरल होते ही युनिवर्सिटी का सारा भेद खुल गया। जिस रोबोडॉग को  यूनिवर्सिटी ने “ओरियन” बुला रही थी और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस द्वारा विकसित बताकर दिखाया गया था। जो समिट में यह यूनिवर्सिटी के पवेलियन में सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करने वाली चीजों में से एक था। वो रोबोडॉग असल में यूनिट्री कंपनी का Go2 मॉडल निकला, जो ऑनलाइन चीनी प्लेटफॉर्म्स पर लगभग 2-3 लाख रुपये में उपलब्ध है। मतलब भारतीय माल बोलकर युनिवर्सिटी वालों ने समिट में चाइना का माल चिपका दिया।

जैसे ही युनिवर्सिटी के दावे का खुलासा हुआ सोशल मीडिया पर तो तलका मच गया। गलगोटिया वालों की जमकर ट्रोलिंग होने लग गई। लोग युनिवर्सिटी समेत एआई समिट में इनको एंट्री देने वाले अफसरों और डीडी जैसे राष्ट्रीय चैनेल पर सवाल उठाने लग गए जिसने इनका इंटरव्यू लिया। कई यूजर्स ने इसे “मेक इन इंडिया” की भावना के खिलाफ बताया। लोग ट्रोल करने पर आए तो यहां के छात्रों के पुराने वीडियो भी वायरल होने लगे। पता चला कि ये तो वही युनिवर्सिटी है जिसके होनहार छात्र है जिनको लोकसभा चुनाव के वक्त बीजेपी आईटी सेल ने दिल्ली कांग्रेस दफ़्तर के बाहर ले जा कर प्रदर्शन करवा रहे थे। जिनको ये भी मालूम नहीं था कि उनको नोएडा से बस में भरके ले क्यों जाया जा रहा था।

लेकिन हद तो तब हो गई जब रोबोडॉग वाली बात इंटरनेशनल मीडिया तक पहुंच गई। सोचिए भारत की कितनी बड़ी बेइज्जती हुई होगी जब खुद चीनी मीडिया ने इसे लेकर लिखा कि भारत चीनी खोज को अपना बता रही है। इसके बाद तो यूनिवर्सिटी पर थूथू शुरू हो गई। अब इतनी छीछालेदर होने के बाद यूनिवर्सिटी को सामने आकर अपनी सफाई देनी पड़ी। युनिवर्सिटी ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि रोबोडॉग उनकी टीम ने विकसित किया है, बल्कि यह चीनी रोबोटिक्स फर्म यूनिट्री से खरीदा गया है और छात्रों के लिए लर्निंग टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने X पर जारी सफाई में कहा, “हाल ही में यूनिट्री से प्राप्त रोबोडॉग हमारे छात्रों के लिए एक लर्निंग टूल है। यह सिर्फ प्रदर्शन के लिए नहीं है, बल्कि एक चलती-फिरती क्लासरूम है। हमारे छात्र इससे प्रयोग कर रहे हैं, इसकी सीमाओं का परीक्षण कर रहे हैं और अपनी नॉलेज बढ़ा रहे हैं। स्पष्ट कर दें: गलगोटिया ने यह रोबोडॉग नहीं बनाया है और न ही कभी ऐसा दावा किया है।” यूनिवर्सिटी ने आगे कहा कि इनोवेशन की कोई सीमा नहीं होती और लर्निंग भी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि वे अमेरिका, चीन और सिंगापुर जैसे ग्लोबल इनोवेशन हब्स से एडवांस्ड टेक्नोलॉजी लाकर छात्रों को रियल-वर्ल्ड एक्सपोजर देते हैं। छात्र इन टेक्नोलॉजीज का अध्ययन करते हैं, उन पर सवाल उठाते हैं और उनमें सुधार करते हैं। यूनिवर्सिटी ने अपने बड़े लक्ष्य पर जोर देते हुए कहा, “यह सिर्फ टेक्नोलॉजी आयात करने की बात नहीं है, बल्कि युवा इनोवेटर्स को इंस्पायर करने और भारत से दुनिया के लिए वर्ल्ड-क्लास सॉल्यूशंस बनाने की है। हम माइंड्स बना रहे हैं जो जल्द ही ऐसी टेक्नोलॉजीज को डिजाइन, इंजीनियर और मैन्युफैक्चर करेंगे।”

यूनिवर्सिटी कह रही है कि ‘हमने कभी नहीं कहा कि हमने बनाया है।’ तो यहां सीधा सवाल उठता है कि अगर आपने इसे नगज बनाया तो ये यूनिट्री का कुत्ता समिट में सिर्फ ‘मॉर्निंग वॉक’ करने आया था? वहां तो आप इसे ऐसे टहला रहे थे जैसे कल ही गलगोटिया के हॉस्टल में पैदा हुआ हो। स्टिकर हटाना भूल गए या चिपकाना ज्यादा जरूरी था? अब देखिए एक तरफ जहां युनिवर्सिटी झूठ बोलसर बचकर निकलना चाह रही थी। तो वहीं एक्स ने नए फीचर ने कम्युनिटी नोट ने यूनिवर्सिटी की लारी पोल खोल दी। X पर एक कम्युनिटी नोट ने यूनिवर्सिटी की सफाई को गलत और भ्रामक बताया, उसके मुताबिक युनिवर्सिटी वालों ने रोबो डॉग को “ओरियन” नाम दिया था और टीम द्वारा विकसित होने का दावा किया गया था।’

युनिवर्सिटी का झूठ पकड़ा जाने लगा। सरकार से सवाल पूछे जाने लगे तो आनन फानन में खबर आई कि चीन में बने रोबोडॉग विवाद के चलते गलगोटिया यूनिवर्सिटी को AI समिट एक्सपो खाली करने को कहा गया है। वहीं इस बीच इसको लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरना भी शुरू कर दिया। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इसको लेकर एक्स पर लिखा कि “भारत की प्रतिभा और डेटा का लाभ उठाने के बजाय, एआई समिट एक असंगठित पीआर तमाशा बन गया है – भारतीय डेटा बिक्री के लिए उपलब्ध, चीनी उत्पाद प्रदर्शित।”

तो अब सवाल सीधा है कि क्या यही है “विकसित भारत 2047” का रोडमैप? जहां पराए माल पर अपना स्टिकर चिपकाकर उसे इनोवेशन का नाम दे दिया जाए? जहां एआई समिट जैसे बड़े मंच पर असली काम से ज्यादा दिखावे को प्राथमिकता दी जाए? अगर देश को एआई की महाशक्ति बनाना है तो उसके लिए पारदर्शिता, रिसर्च में निवेश, और असली प्रतिभा को मंच देना पड़ेगा। न कि पीआर इवेंट्स में चमक-दमक दिखाकर तालियां बटोरनी होंगी।

यह मामला सिर्फ एक रोबोडॉग का नहीं है। यह उस सोच का आईना है जिसमें “दिखा दो कि हमने कर दिया” ज्यादा अहम है, बजाय इसके कि सच में किया भी है या नहीं। जब एक यूनिवर्सिटी विदेशी प्रोडक्ट को अपने सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की देन बताने लगे, और सरकारी मंचों से उसे बिना जांचे-परखे बढ़ावा मिल जाए, तो सवाल सिर्फ उस संस्थान पर नहीं बल्कि पूरे सिस्टम पर उठते हैं। क्या किसी ने वेरिफिकेशन किया? क्या किसी ने तकनीकी दावों की जांच की? या बस कैमरे चल रहे थे, मोदी जी की फोटो लगी थी और विजन 2047 का पोस्टर चमक रहा था?

सबसे बड़ी चोट देश की साख पर लगती है। जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह खबर मज़ाक बन जाए, जब पड़ोसी देश की कंपनी का प्रोडक्ट भारतीय आविष्कार बताकर पेश किया जाए, तब नुकसान सिर्फ ट्रोलिंग तक सीमित नहीं रहता। वहीं अगर सच में भारत को एआई में अग्रणी बनाना है, तो उसे फर्जीवाड़े से नहीं, ईमानदार रिसर्च, स्टार्टअप्स को असली सपोर्ट और जवाबदेही की सख्त व्यवस्था से बनाना होगा। वरना ऐसे “ओरियन” आते रहेंगे, नाम बदलते रहेंगे, और सपनों पर पानी फिरता रहेगा।

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