HC जज का वोटर लिस्ट से नाम हटाया, एक ही बूथ से 340 मतदाता गायब

जस्टिस मुंशी ने कहा कि जज बनने से पहले भी उनकी जांच हुई थी और कोलेजियम और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति हुई थी।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या ठीक चुनावों से पहले ज्ञानेश कुमार अपने असली रंग में सामने आ गए हैं? क्या आम आदमी के साथ साथ एक खास विशेष वर्ग के जजों को भी निशाना बनाया जा रहा है?

पश्चिम बंगाल चुनाव सर पर हैं और ज्ञानेश कुमार तो अब निष्पक्ष होने का नाटक भी नहीं कर रहे हैं। क्योंकि इस वक्त मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए जो हो रहा है, आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

हाईकोर्ट में जिन जजों की नियुक्ति से पहले उनकी पूरी जाँच होती है और कोलेजियम और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, उनको चुनाव आयोग के आम कर्मचारी रिजेक्ट कर रहे हैं। यही नहीं एक बूथ से 340 मुस्लिम वोटरों के नाम एक साथ डिलीट कर दिए गए हैं। और इनमें उस बूथ का बूथ लेवल ऑफिसर का नाम भी शामिल है

जिसके ऊपर लोगों को मतदाता लिस्ट से जोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तो कैसे मोदी शाह के एक इशारे पर ज्ञानेश कुमार बीजेपी की बी टीम बनकर काम कर रहे हैं और कैसे ममता बनर्जी को हराने के लिए चुनाव आयोद ने जाल बिछाया है,

पश्चिम बंगाल चुनाव में जैसे जैसे वोटिंग की तारीख नजदीक पहुंच रही है, ज्ञानेश कुमार बीजेपी को जिताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। कपड़े देखकर लोगों की पहचान करने वाले महामानव के इशारों पर काम करने वाले ज्ञानेश कुमार नाम देखकर विशेष वर्ग की पहचान कर रहे हैं और एस झटके में उन्हें वोटर लिस्ट से उड़ा रहे हैं।

इससे चुनाव आयोग को फर्क नहीं पड़त कि नाम कितना बड़ा है। आप सोचिए हाईकोर्ट में जिन जजों की नियुक्ति से पहले उनकी पूरी जांच होती है और कोलेजियम और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं और इसके बावजूद उन्हें वोटर लिस्ट से हटा दिया जाए तो ये हैरान करने वाला है। पश्चिम बंगाल में कुछ ऐसा ही हुआ है कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज शहीदुल्लाह मुंशी का नाम भी वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है।

जज बनने से पहले भी उनकी जाँच हुई होगी फिर जाकर कहीं वो जज बने होंगे लेकिन फिर भी उनका नाम वोटर लिस्ट से ऐसे उड़ा दिया गया जैसे वो इस देश का नागरिक ही न हों। इनके अलावा बशीरहाट नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र में एक बूथ से 340 मुस्लिम वोटरों के नाम एक साथ डिलीट कर दिए गए।

इनमें उस बूथ का बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ मोहम्मद शफीउल आलम का नाम भी शामिल है। चुनाव से पहले वोटर लिस्ट की एसआईआर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग ने 23 मार्च को एसआईआर के बाद पहली सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट जारी की। इसमें उन वोटरों के नाम शामिल हैं जिनके मामलों का फ़ैसला न्यायिक अधिकारियों ने किया है।

ऐसे मामलों को एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखा गया था और इसकी जाँच न्यायिक अधिकारी कर रहे थे। पूर्व जस्टिस शहीदुल्लाह मुंशी ने बताया कि उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। उनकी पत्नी सहाना और बड़े बेटे इफ्तेखार का मामला अभी भी अंडर एडजुडिकेशन है, जबकि छोटे बेटे इब्तेहाज ने नया वोटर बनने के लिए आवेदन किया है।

जस्टिस मुंशी ने कहा कि जज बनने से पहले भी उनकी जांच हुई थी और कोलेजियम और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति हुई थी। फिर भी नाम हटाना हैरान करने वाला है। उन्होंने कहा कि 60 लाख मामलों का फैसला कम समय में करना पड़ा, इसलिए प्रक्रिया ‘मैकेनिकल’ बनकर रह गई। कोई ध्यान से नहीं देख रहा है।

पूर्व जज ने कहा, ‘अब तक सिर्फ मेरा नाम हटाया गया है। यह बहुत शर्मनाक और दर्दनाक है। बहुत परेशानी हुई। उन्होंने मेरे सारे दस्तावेज ले लिए और कहा कि अपलोड कर देंगे, लेकिन कोई रसीद तक नहीं दी।’

पूर्व जज ने आश्चर्य जताया कि पासपोर्ट समेत सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद नाम कैसे हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि हमें अंधेरे में रखा गया, अगर बताया होता कि और दस्तावेज चाहिए तो हम दे देते। एक दस्तावेज काफी होना चाहिए था। वो बोलबाजार क्षेत्र में वोट डालते थे, लेकिन अब एंटली शिफ्ट हो गए हैं। उन्होंने अपील करने के लिए आधिकारिक कारण का इंतजार करने की बात कही। पश्चिम बंगाल में 19 अपीलेट ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जहां पूर्व जजों की अध्यक्षता में सुनवाई होगी।

एक जज के साथ जब ये सब हो रहा है तो आम आदमी के साथ क्या क्या हो रहा होगा। इसका अंदाजा लगाना है तो आप बशीरहाट नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र के बड़ो गोबरा गांव का मामला देखिए जहां बूथ नंबर 5 से 340 मुस्लिम वोटरों के नाम एक साथ हटा दिया गया है। न कोई नोटिस नो कोआ सुनवाई बस एक क्लिक पर 340 लोगोम के नाम गायब कर दिए गए।

ये सभी वोटर पहले अंडर एडजुडिकेशन में थे। सप्लीमेंट्री लिस्ट में इनके नाम डिलीट कर दिए गए। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस बूथ का बीएलओ मोहम्मद शफीउल आलम का नाम भी डिलीट हो गया है। सोचिए जिसके कंधो पर जिम्मेदारी होती है कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में शामिल होने से छूट न जाए ।

एसआईआर के टाइम पर जिस बीएलओ ने घरघर जाकर ज्ञानेश कुमार के एक एक आदेशों का पालन करते हुए वोटर लिस्ट तैयार की होगी उसी वोटर लिस्ट उसी बीएलओ का नाम उड़ा दिया गया।

जैसे ही 340 लोगों का नाम कटने का मामला सामने आया स्थानीय लोगों में गुस्सा भड़क उठा। सौ से ज्यादा लोग बीएलओ के घर और सड़कों पर प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर नाम हटाए गए हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार प्रभावित वोटर काजीरुल मंडल ने कहा कि चुनाव आयोग के लिए 11 में से एक दस्तावेज काफी है, फिर भी कई लोगों ने 3-4 दस्तावेज दिए, लेकिन नाम फिर भी हटा दिए गए। बीएलओ आलम ने बताया कि उन्होंने खुद इन वोटरों को फॉर्म भरने में मदद की और दस्तावेज अपलोड किए, फिर भी नाम हटा दिए गए। अब देखिए बूथ में कुल 992 वोटर थे।

38 नाम मौत या शिफ्टिंग की वजह से सामान्य रूप से हटाए गए। 358 वोटरों को सुनवाई के लिए बुलाया गया था। इनमें से 18 के मामले ड्राफ्ट लिस्ट में सुलझ गए, लेकिन बाकी 340 को डिलीट कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार लोगों ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग पर राजनीतिक दबाव है और यह किसी खास पार्टी के फायदे के लिए किया जा रहा है। बीएलओ आलम ने ट्रिब्यूनल में अपील करने की बात कही है।

तो अब सवाल और भी बड़ा हो जाता है कि क्या यह सब महज एक “तकनीकी गलती” है या फिर इसके पीछे कोई सुनियोजित रणनीति काम कर रही है? जब पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के तहत 60 लाख से ज्यादा वोटरों के मामलों की जांच हो रही हो और अलग-अलग रिपोर्टों में 13 लाख, 8 लाख या 14 लाख तक नाम हटाए जाने की बात सामने आ रही हो, लेकिन चुनाव आयोग अब तक साफ-साफ आंकड़े देने से बच रहा हो, तो शक और गहरा होना लाजमी है।

चुनाव आयोग भले ही यह दावा कर रहा है कि उसका मकसद फर्जी, डुप्लिकेट और मृत वोटरों को हटाकर लिस्ट को साफ करना है, लेकिन जिस तरह से एक पूर्व जज का नाम बिना ठोस कारण के हटा दिया जाता है, और एक ही बूथ से 340 लोगों के नाम एक झटके में गायब कर दिए जाते हैं, वो इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या ये सिर्फ लापरवाही है या फिर जानबूझकर किसी खास वर्ग को निशाना बनाया जा रहा है?

सबसे बड़ी चिंता की बात ये है कि अगर एक हाईकोर्ट के पूर्व जज तक इस सिस्टम की खामियों से नहीं बच पा रहे हैं, तो आम आदमी की क्या स्थिति होगी? जिन लोगों ने अपने सारे दस्तावेज जमा किए, नियमों का पालन किया, फिर भी उनका नाम सूची से हटा दिया गया — ये किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।

अब नजरें अपीलेट ट्रिब्यूनल पर टिकी हैं, जहां पूर्व जज मुंशी और बशीरहाट के सैकड़ों प्रभावित वोटर अपनी लड़ाई लड़ेंगे। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या उन्हें समय रहते न्याय मिल पाएगा, या फिर चुनाव खत्म होने के बाद ये न्याय सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा?

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