IITs में 80 के दशक का एडमिशन सिस्टम, एलुमनाई ने साझा कीं पुरानी यादें
IIT बॉम्बे के स्टूडेंट साहिल वाकोडे के कथित सुसाइड के बाद IIT मद्रास के एलुमनाई रमेश श्रीवत्स ने अपने अनुभव साझा किए हैं. उन्होंने कहा कि 1980 के दशक में IIT में जाति को लेकर बहुत जागरूकता थी.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: IIT बॉम्बे के स्टूडेंट साहिल वाकोडे के कथित सुसाइड के बाद IIT मद्रास के एलुमनाई रमेश श्रीवत्स ने अपने अनुभव साझा किए हैं. उन्होंने कहा कि 1980 के दशक में IIT में जाति को लेकर बहुत जागरूकता थी.
80 के दशक में IITs ‘जाति केंद्रित’ जगह थी
IIT बाॅम्बे के स्टूडेंट साहिल वाकोडे के कथित सुसाइड के बाद IIT मद्रास के एलुमनाई रमेश श्रीवत्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो पोस्ट किया है. उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखते हुए अपने पुराने IIT मद्रास के दिनों का याद किया है, जिसमें उन्होंने व्यंग्यात्मक तौर पर लिखा है कि 1980 के दशक में IITs जाति केंद्रित जगह थी.
बदलता रहता था जाति का क्रम
IIT मद्रास के एलुमनाई रमेश श्रीवत्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट में किए वीडियो में कहा है कि 1980 के दशक में स्टूडेंट्स के बीच ऊंच-नीच का क्रम एंट्रेंस रैंक से बदलकर ब्रांच, GPA और करियर प्लान पर आधारित हो गया था, जो जन्म से मिलने वाली जाति से अलग था और स्टूडेंट्स के परफॉर्मेंस और पढ़ाई के साथ बदल सकता था.
जाति को लेकर बहुत जागरूकता थी
IIT मद्रास के एलुमनाई रमेश श्रीवत्स ने अपनी पोस्ट में कहा है कि वह 80 के दशक में IIT मद्रास में थे, और वहां जाति को लेकर बहुत जागरूकता थी. वह जोर देते हुए कहते हैं कि वहां स्टूडेंट्स की जाति हर साल बदलती रहती थी, जो JEE से लेकर ब्रांच, GPA और करियर तक बदलती रहती है, लेकिन कभी भी आपके जन्म से जुड़ी जाति की बात नहीं होती थी.
6 महीने रैंक की जगह ब्रांच बन गई जाति
IIT मद्रास के एलुमनाई रमेश श्रीवत्स ने वीडियो में IIT में अपने अनौपचारिक एकेडमिक और प्रोफेशनल क्रम का वर्णन किया है. वह याद करते हुए कहते हैं कि IIT मद्रास में हर साल जाति बदल जाती थी. शुरुआत में जेईई रैंक स्टूडेंट्स की जाति थी, लेकिन यह क्रम ज़्यादा समय तक नहीं चला. छह महीने के अंदर ही रैंक की जगह ब्रांच ने ले ली.
इसमें कंप्यूटर साइंस सबसे ऊपर थी, उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और दूसरी ब्रांच थीं. उन्होंने कहा कि दूसरे और तीसरे साल तक, ब्रांच का भी प्राथमिकता क्रम में महत्व कम हो गया था, क्योंकि स्टूडेंट्स ज़्यादातर अपनी ही ब्रांच तक सीमित रहते थे. फिर GPA का दौर आया. इसमें जो स्टूडेंट्स बिना अधिक पढ़े अच्छे GPA लाते थे, वे “जीनियस” ग्रुप में आते थे. तो वहींकड़ी मेहनत करके अच्छे GPA लाने वाले “कैश काऊ” (कमाऊ) माने जाते थे. तो वहीं बहुत पढ़ने के बाद कम GPA लाने वालों को अलग कैटेगरी में रखा जाता था.



