सात दिन में वोटर लिस्ट में जुड़ गया राघव चड्ढा का नाम

  • बाकी देश क्यों तरस रहा है?
  • आप ने उठाये गंभीर सवाल, कहा बैक डोर से जोड़ा गया नाम
  • देश मांगे जवाब- जिस देश में डिजिटल क्रांति के जनक नंदन नीलेकणि का नाम 2००2 के रिकॉर्ड से नहीं मिल रहा वहां
  • राघव चड्ढा के नाम के लिए सात दिन की रफ्तार आखिर किस लोकतांत्रिक एक्सप्रेस से आई

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। एक आम हिंदुस्तानी अपना नाम मतदाता सूची में बचाए रखने के लिए इन दिनों कागजों की गठरी लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। बीएलओ की चिरौरी कर रहा है वह पुराने रिकॉर्ड तलाश रहा है दावे आपत्तियां दाखिल कर रहा है लेकिन एसआईआर में कटा नाम नहीं जुड़ पा रहा है वही राष्ट्रवाद का ताजा ताजा जूस पीकर आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी ज्वाइन करने वाले नेता राघव चड्ढा हैं जिनका वोटिंग लिस्ट में नाम महज सात दिनों के भीतर जोड़ दिया गया।
उनका नाम पंजाब की वोटिंग लिस्ट से कट गया था बाद में बिजली की तेजी की तरह दिल्ली की वोटिंग लिस्ट में जुड़ गया है। राघव चड्ढा का नाम जुडऩे के बाद देश में भूचाल सी स्थिति पैदा हो गयी है और आम वोटर खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है। सोशल मीडिया पर राघव चड्ढा प्रकरण पर मीम बनाए जा रहे हैं और मजाक उठाती रील की भरमार है। आम आदमी पार्टी ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उनका नाम बैक डोर से जोड़ा गया गया है जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि सात दिनों की प्रक्रिया के बाद उनका नाम जुड़ा है।

बोला चुनाव आयोग सब नियम के मुताबिक हुआ है

दिल्ली सीईओ कार्यालय के मुताबिक राघव चड्ढा ने 26 अगस्त को फार्म —6 के जरिए आवेदन किया और 2 सितंबर को आवेदन मंजूर हुआ। आयोग का कहना है कि ड्राफ्ट रोल प्रकाशित होने के बाद भी स्वीकृत नामों को अंतिम क्रमांक के बाद जोड़ा जा सकता है। ठीक है मान लिया लेकिन फिर सवाल खत्म कहां हुआ सवाल तो अब शुरू हुआ है अगर प्रक्रिया इतनी साफ है अगर सब कुछ नियम के मुताबिक है अगर सात दिन में आवेदन की जांच सत्यापन और मंजूरी पूरी करना बिल्कुल सामान्य है तो फिर आम आदमी के लिए भी यही व्यवस्था क्यों नहीं? क्यों नहीं चुनाव आयोग देश को बता देता कि राघव चड्ढा के आवेदन में कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए। किस स्तर पर सत्यापन हुआ कितने समय में हुआ किस अधिकारी ने जांच की और सबसे अहम क्या यही प्रक्रिया एसआईआर में अपना नाम खो चुके हर भारतीय के लिए भी उतनी ही तेजी से उपलब्ध है?

सिर्फ सात दिन

अब जरा देश के उस नागरिक से पूछिए जिसका नाम एसआईआर में कट गया है कि भाई तुम्हारा नाम वापस जुड़ा वह कहेगा साहब अभी कोशिश कर रहे हैं कागज पूरे हैं पता नहीं कौन सा कागज चाहिए। बीएलओ कभी मिला कभी नहीं मिला पुराना रिकॉर्ड ढूंढ रहे हैं दावा दाखिल किया है अब पता नहीं कब सुनवाई होगी। तो फिर सवाल उठेगा ही जिस चुनावी मशीनरी के सामने आम आदमी अपने वोट की जिंदगी बचाने के लिए सांस फुला रहा है उसी मशीनरी में राघव चड्ढा का नाम सात दिन में कैसे दौड़ गया। और यहीं से कहानी में असली उछाल आता है। क्योंकि आम आदमी अकेला नहीं है जो एसआईआर की प्रक्रिया में उलझा है। देश के सबसे बड़े कारोबारी नामों में शामिल नंदन नीलेकणि और उनका परिवार भी कर्नाटक में उस सूची में दिखाई दिया जहां 2002 की पुरानी मतदाता सूची से नाम मैप नहीं हो पाया। उन्हें अनमैप्ट विद लास्ट एसआईआर श्रेणी में रखा गया है। सोचिए इंफोसिस के सह संस्थापक नंदन नीलेकणि देश की डिजिटल क्रांति के बड़े चेहरों में से एक उनका परिवार भी पुराने वोटर रिकॉर्ड की मैपिंग में अटक सकता है। तो फिर सवाल और बड़ा है जिस देश में नंदन नीलेकणि का नाम 2002 के रिकॉर्ड से नहीं मिल रहा वहां राघव चड्ढा के नाम के लिए सात दिन की रफ्तार आखिर किस लोकतांत्रिक एक्सप्रेस से आई?

आम आदमी पार्टी ने उठाया गंभीर प्रश्न

आम आदमी पार्टी का आरोप है कि राघव चड्ढा का नाम बैक डोर से जोड़ा गया। पार्टी ने उनके फार्म-6 को सार्वजनिक करने की मांग की है और सवाल उठाया है कि 31 अगस्त को ड्राफ्ट रोल प्रकाशित होने के बाद उनका नाम किस प्रक्रिया के तहत शामिल हुआ। आप ने आरोप लगाया कि चड्ढा का नाम बिना उचित प्रक्रिया के जोड़ा गया। पार्टी ने चुनाव आयोग से सवाल किया कि जब एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है और ड्राफ्ट रोल प्रकाशित हो चुका है तब इतनी जल्दी नाम जोडऩे की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई। यही वह सवाल है जिस पर चुनाव आयोग को सबसे स्पष्ट जवाब देना चाहिए। क्योंकि दूसरी तरफ देश के नागरिक एसआईआर को लेकर अलग-अलग तरह की परेशानियों से गुजर रहे हैं। दिल्ली में ही दावे और आपत्तियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। कुछ ही दिनों में लाखों दावे और आपत्तियां दाखिल होने की खबर सामने आई है। राघव चड्ढा का मामला व्यवस्था की कसौटी बन चुका है। राघव चड्ढा अब बीजेपी के राज्यसभा सांसद हैं उन्होंने अप्रैल 2026 में आप छोड़कर बीजेपी का दामन थामा था। उनका राजनीतिक सफर पंजाब में नाम हटना और फिर दिल्ली में नाम जुडऩा इन तीनों घटनाओं को एक साथ रखकर देखा जाए तो राजनीतिक सवाल स्वाभाविक है।

क्या एक सांसद और बड़े राजनीतिक चेहरे के मामले में व्यवस्था ज्यादा संवेदनशील है?

अगर जवाब नहीं में आता है तो फिर चुनाव आयोग को यही पारदर्शिता आम नागरिक के लिए भी दिखानी होगी। अगर राघव चड्ढा का आवेदन 26 अगस्त को आया और 2 सितंबर को मंजूर हो गया तो आयोग को यह बताने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि आवेदन किस स्तर पर जांचा गया किन दस्तावेजों के आधार पर मंजूरी दी गई और प्रक्रिया में कौन कौन से चरण पूरे किए गए। क्योंकि इससे राघव चड्ढा पर आरोप साबित नहीं होगा बल्कि उल्टा उनकी स्थिति साफ होगी। यही लोकतांत्रिक तरीका है। चुनाव आयोग देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण संस्थान है। इसलिए उससे सवाल पूछे जाने पर सवाल पूछने वालों को लोकतंत्र-विरोधी बताना भी उचित नहीं होगा। उलटे जितना बड़ा संस्थान होगा उतनी ही ज्यादा पारदर्शिता की अपेक्षा होगी।

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