इंदिरा गांधी को बनाया औजार, राहुल पर वार

  • निशिकांत दुबे एक बार फिर संकटमोचक की भूमिका में सामने आए
  • सांसद निशिकांत दुबे के तरकश के तीर इतिहास के सबसे विस्फोटक अध्याय से निकाले गये
  • इससे पूर्व में सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में 4पीएम पर भी लगा चुके हैं आरोप
  • संसद में राहुल गांधी द्वारा भारत माता को बेच देने जैसे आरोपों से बौखला गयी सरकार

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बजट सत्र में दागे गए सवाल अब केवल सवाल नहीं रहे। वह सियासत के आसमान में उठे ऐसे बवंडर बन चुके हैं जिसने सत्ता की सबसे मजबूत दीवारों को भी हिला दिया है।
संसद के भीतर शुरू हुआ यह हमला अब राजनीतिक चक्रवात में बदल चुका है और इस चक्रवात से बचने के लिए सत्ता ने एक बार फिर अपने सबसे भरोसेमंद योद्धा को मैदान में उतारा है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे एक बार फिर संकटमोचक की भूमिका में सामने आए हैं। लेकिन इस बार उनके तरकश का तीर केवल राहुल गांधी नहीं, बल्कि इतिहास के सबसे विस्फोटक अध्याय से निकाला गया है।

राहुल गांधी पर राष्ट्र विरोधी ताकतों का साथ देने का अरोप

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा है कि उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ मूल प्रस्ताव शुरू किया है और उन पर राष्ट्र विरोधी ताकतों के साथ होने का आरोप लगाया। यह कदम लोकसभा में एक दिन पहले हुई तीखी बहस के बाद सामने आया जब राहुल गांधी ने भारत अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया था कि इस समझौते में भारत और उसके नागरिकों के हितों से समझौता किया गया है और भारत माता को बेच दिया गया है। उनके इस बयान पर सत्तापक्ष के सांसदों ने जोरदार विरोध किया और इसे असंसदीय बताते हुए रिकार्ड से हटाने की मांग की। इसके बाद भाजपा सांसदों ने विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने की घोषणा की और राहुल गांधी पर सदन को गुमराह करने का आरोप लगाया।

इंदिरा गांधी पर हो चुकी कार्रवाई को बनाया आधार

निशिकांत दुबे ने दिसंबर 1978 की उस घटना से तुलना की, जब इसी तरह के प्रस्ताव के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता समाप्त कर दी गई थी और उन्हें जेल भी भेजा गया था। संसदीय प्रक्रिया में मूल प्रस्ताव एक स्वतंत्र और स्पष्ट प्रस्ताव होता है, जिसे सदन के सामने निर्णय या राय व्यक्त करने के लिए रखा जाता है। इसे स्वीकार कर सदन में पेश किए जाने के बाद इस पर बहस होती है और अंत में मतदान कराया जाता है।निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी पर विशेषाधिकार हनन का आरोप लगाते हुए उनके लोकसभा सदस्य पद को रद्द करने और भविष्य के चुनाव लडऩे से अयोग्य ठहराने की मांग की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट में 1978 के संसदीय रिकार्ड के अंश भी दिखाए और लिखा कि इसी तरह के प्रस्ताव के आधार पर इंदिरा गांधी की सदस्यता समाप्त हुई थी और उन्हें जेल भेजा गया था। 1978 का मामला 22 नवंबर 1978 को लोकसभा में पेश किए गए मूल प्रस्ताव से जुड़ा था। यह प्रस्ताव विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट के आधार पर लाया गया था जिसमें इंदिरा गांधी को सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन का दोषी पाया गया था।

राहुल के चाचा संजय गांधी भी आये जद में

आरोप 1975 के आपातकाल के दौरान की गई कार्रवाई से जुड़े हैं। जिनमें उनके पुत्र संजय गांधी की मारुति परियोजना की जांच कर रहे चार सरकारी अधिकारियों को कथित रूप से बाधित करने डराने-धमकाने और झूठे मामले दर्ज कराने का उल्लेख था। लंबी बहस के बाद 19 दिसंबर 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा लाया गया प्रस्ताव पारित हुआ। इसके परिणामस्वरूप इंदिरा गांधी को लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया और उन्हें संसदीय सत्र की शेष अवधि के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया गया। हालांकि यह निष्कासन स्थायी नहीं रहा और 7 मई 1981 को सातवीं लोकसभा ने निर्णय वापस ले लिया जब इंदिरा गांधी प्रचंड बहुमत के साथ फिर सत्ता में लौटीं।

संदेश साफ है

निशिकांत दुबे ने सीधा हमला करते हुए राहुल गांधी की दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के उस राजनीतिक पतन की याद दिलाई हैं। जब दिसंबर 1978 में विशेषाधिकार हनन के प्रस्ताव के बाद उनकी लोकसभा सदस्यता समाप्त कर दी गई थी और उन्हें जेल तक जाना पड़ा था। यह केवल एक ऐतिहासिक संदर्भ नहीं है। राहुल गांधी को यह एक खुली चेतावनी है संदेश साफ है संसद की तलवार इतिहास में भी चली है और आज भी चल सकती है। दरअसल पूरा घटनाक्रम उस समय भड़का जब राहुल गांधी ने संसद के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर सीधे तीखे और असहज करने वाले आरोप लगाए। आरोप इतने तीखे थे कि सत्ता पक्ष ने पहले उन्हें हल्के में लेने की कोशिश की फिर नैरेटिव बदलने का प्रयास किया लेकिन जब कोई रणनीति काम नहीं आई तब संसदीय नियमों के हथियार को धार देने का फैसला किया गया। सरकार ने सीधे कार्रवाई से कदम पीछे खींचे क्योंकि इससे राहुल गांधी को राजनीतिक सहानुभूति मिल सकती थी। लेकिन रणनीति बदली गई और अब वही हमला एक निजी सदस्य के प्रस्ताव के जरिए किया जा रहा है।

कांग्रेस ने प्रस्ताव को खारिज किया

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सरकार की ओर से लगाए गए आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल समर्थन करना नहीं बल्कि सवाल पूछना और जवाबदेही तय करना भी है। पार्टी का कहना है कि विपक्ष के नेता को सरकार और प्रधानमंत्री की नीतियों की आलोचना करने का संवैधानिक और नैतिक अधिकार प्राप्त है। विशेष रूप से तब जब मुद्दे सीधे तौर पर देश की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों के भविष्य और आम जनता की आर्थिक स्थिरता से जुड़े हों। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में ऊर्जा क्षेत्र में लिए जा रहे फैसले और किसानों से जुड़े नीतिगत बदलाव केवल आर्थिक नहीं है बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व के विषय भी हैं। ऐसे में यदि विपक्ष इन मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगता है या नीतियों पर सवाल उठाता है तो इसे राष्ट्रविरोधी या गैर जिम्मेदाराना करार देना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार आलोचना से बचने के लिए राजनीतिक आरोपों का सहारा ले रही है जबकि उसे ठोस तथ्यों और पारदर्शिता के साथ जवाब देना चाहिए।

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