जम्मू-कश्मीर: 21.81 लाख किताबों की गहन जांच, 4,249 विवादित पुस्तकें हटाई गईं
जम्मू-कश्मीर में 21 लाख से अधिक किताबों की जांच की गई है, जिनमें से 4,249 को 'आपत्तिजनक' या 'राष्ट्रविरोधी' सामग्री के कारण हटा दिया गया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: जम्मू-कश्मीर में 21 लाख से अधिक किताबों की जांच की गई है, जिनमें से 4,249 को ‘आपत्तिजनक’ या ‘राष्ट्रविरोधी’ सामग्री के कारण हटा दिया गया. यह कार्रवाई फरवरी 2025 में शुरू हुई थी.
जम्मू-कश्मीर में अब किताबें भी जांच के दायरे में हैं. विधानसभा में सरकार की ओर से दिए गए आंकड़ों ने पूरे मामले को बड़ा बना दिया है. सरकार के मुताबिक प्रदेश में अब तक 21 लाख 81 हजार 582 किताबों और प्रकाशनों की जांच की जा चुकी है. इनमें से 4,249 किताबों को लाइब्रेरी और सार्वजनिक संस्थानों से हटा दिया गया है.
सरकार का कहना है कि इन किताबों में आपत्तिजनक या राष्ट्रविरोधी सामग्री पाई गई थी. लेकिन इस कार्रवाई को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं कि आखिर किताबों की जांच का पैमाना क्या है और किस आधार पर किसी किताब को संस्थानों से हटाने का फैसला लिया जा रहा है?.
विधानसभा में सामने आया पूरा आंकड़ा
मंगलवार (22 सितंबर) को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में स्वतंत्र विधायक शेख खुर्शीद अहमद के सवाल के जवाब में सरकार ने किताबों की जांच से जुड़े आंकड़े सामने रखे. उच्च शिक्षा विभाग के मुताबिक 21,81,582 किताबों और प्रकाशनों की जांच पूरी हो चुकी है, जबकि 1,752 किताबें अभी विशेषज्ञों की जांच के लिए कॉलेजों के निदेशकों के पास भेजी गई हैं. यानी किताबों की जांच का यह सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है.
फरवरी 2025 में शुरू हुई थी कार्रवाई
किताबों की जांच का यह अभियान फरवरी 2025 में शुरू हुआ था. उस समय जम्मू-कश्मीर पुलिस ने श्रीनगर में कुछ किताबों की दुकानों और लाइब्रेरियों पर छापेमारी की थी. पुलिस ने कार्रवाई के दौरान 668 किताबें जब्त की थीं. आरोप था कि इन किताबों के जरिए प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है.
इसके बाद अगस्त 2025 में गृह विभाग ने 25 किताबों को जब्त घोषित कर दिया. इन किताबों के प्रकाशन, बिक्री और प्रसार पर रोक लगा दी गई. इनमें एजी नूरानी, अरुंधति रॉय, क्रिस्टोफर स्नेडन और सुमंत्र बोस जैसे लेखकों की किताबें भी शामिल थीं.
स्कूलों की किताबों पर भी हुआ था विवाद
किताबों को लेकर विवाद केवल लाइब्रेरियों तक सीमित नहीं रहा. सरकारी स्कूलों में उपलब्ध कराई गई दो किताबों को लेकर भी बड़ा विवाद सामने आया था.’Personalities and Legends of Jammu and Kashmir’ और ‘Great Personalities of Jammu and Kashmir’ नाम की किताबों में अलगाववादी नेताओं के उल्लेख को लेकर सरकार ने आपत्ति जताई थी. इसके बाद जांच के आदेश दिए गए और शिक्षा विभाग के 8 अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया.
सरकार का तर्क क्या है?
सरकार का कहना है कि किताबों की जांच किसी खास विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ मानदंडों के तहत की जा रही है.उच्च शिक्षा विभाग के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया का मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसा माहौल बनाना है, जिसमें संवैधानिक मूल्यों, अकादमिक स्वतंत्रता, आलोचनात्मक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा मिले.
अब सवाल भी उठ रहे हैं
हालांकि सरकार की इस कार्रवाई पर सवाल भी उठ रहे हैं. विधायक शेख खुर्शीद अहमद ने आरोप लगाया है कि किताबों को लाइब्रेरियों और संस्थानों से हटाने की कार्रवाई कहीं जम्मू-कश्मीर के इतिहास और ज्ञान को एक खास नजरिए से पेश करने की कोशिश तो नहीं है, क्योंकि किताब सिर्फ कागज और शब्द नहीं होती. किसी भी समाज के लिए किताबें उसके इतिहास, विचार और बहस का रिकॉर्ड भी होती हैं.
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि 21.81 लाख किताबों की जांच के दौरान आखिर कौन तय कर रहा है कि क्या राष्ट्रविरोधी है और क्या नहीं?. क्या किताब को हटाने से पहले उसकी पूरी विषयवस्तु, संदर्भ और अकादमिक महत्व को भी देखा जा रहा है?.
फिलहाल सरकार की जांच जारी है और 1,752 किताबों की विशेषज्ञ जांच बाकी है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि इनमें से कितनी किताबों को क्लीन चिट मिलती है और कितनी पर कार्रवाई जारी रहती है.



