दिवालिया होंगे कई राज्य? | जेब खाली, विकास ठप | मोदी के फैसले पर दैनिक भास्कर का खुलासा
दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट ने देश की वित्तीय स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं... रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार के हालिया फैसलों...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः भारत में पिछले एक दशक से राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने के लिए मुफ्त योजनाओं.. और सब्सिडी का सहारा ले रही हैं.. वहीं ये योजनाएं लोगों को आकर्षित तो करती हैं.. लेकिन राज्यों की आर्थिक हालत को खराब कर रही हैं.. बिजली, पानी, राशन, महिलाओं के लिए नकद हस्तांतरण.. जैसी मुफ्त सुविधाएं देने से राज्यों का खर्च बढ़ रहा है.. जबकि कमाई सीमित है.. जिसका नतीजा यह है कि सड़कें बनाने.. स्कूलों में सुधार करने या स्वास्थ्य सेवाओं पर पैसा नहीं बचता.. कई राज्य कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं.. और उनका विकास रुक रहा है..
भारत के कई राज्यों में चुनाव के समय पार्टियां बड़े-बड़े वादे करती हैं.. जिसमें मुफ्त बिजली, महिलाओं को हर महीने नकद राशि, मुफ्त बस यात्रा और मुफ्त राशन जैसी सुविधाए शामिल होती हैं.. वहीं ये वादे सत्ता पाने का आसान तरीका तो लगते हैं.. लेकिन ये योजना लागू करने पर राज्य का बजट बिगड़ जाता है.. 2025-26 के बजट अनुमानों के अनुसार.. राज्य कुल मिलाकर 1.68 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा.. इन योजनाओं पर खर्च करने वाले हैं.. जो देश की जीडीपी का 0.5% है.. यह रकम विकास कार्यों से कटकर जा रही है..
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और अन्य रिपोर्ट्स बताती हैं कि.. राज्यों की कमाई का बड़ा हिस्सा अब वेतन, पेंशन, ब्याज और सब्सिडी पर चला जाता है.. 2023-24 में राज्यों की कमाई का 53 फीसदी हिस्सा वेतन.. पेंशन और ब्याज पर खर्च हुआ.. जबकि सब्सिडी पर 9 फीसदी फीसदी खर्च हुआ.. कुल मिलाकर, 62 फीसदी कमाई इन जरूरी खर्चों में चली गई.. बाकी बचा पैसा विकास पर लगाना मुश्किल हो रहा है.. कई राज्यों में तो कमाई का सिर्फ 20-25 फीसदी ही हाथ में बचता है.. पंजाब जैसे राज्य में यह सिर्फ 7 फीसदी है..
आपको बता दें कि ये योजनाएं न केवल खर्च बढ़ाती हैं.. बल्कि कर्ज भी बढ़ाती हैं.. राज्यों को इन्हें चलाने के लिए बाजार से कर्ज लेना पड़ता है.. 2025 में कई राज्यों का कर्ज उनकी जीडीपी के एक तिहाई या उससे ज्यादा हो गया है.. अगर यह चलन जारी रहा.. तो आने वाले सालों में मूलधन चुकाने का बोझ और बढ़ेगा..
वहीं पंजाब एक ऐसा राज्य है.. जहां मुफ्त योजनाओं का असर सबसे ज्यादा दिख रहा है.. यहां की सरकार ने मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिए नकद हस्तांतरण.. और अन्य सब्सिडी दी हैं.. जिसका नतीजा 2024-25 में पंजाब का कर्ज जीडीपी का 44.5 फीसदी हो गया है.. 2023-24 में, राज्य की कमाई का 107 फीसदी हिस्सा वेतन, पेंशन.. और ब्याज पर चला गया.. यानी कमाई से ज्यादा खर्च हुआ.. जानकारी के अनुसार सब्सिडी पर 21 फीसदी खर्च हुआ.. जिसमें 90 फीसदी बिजली सब्सिडी थी..
इस साल पंजाब को 90 हजार करोड़ रुपये का मूलधन चुकाना है.. लेकिन हाथ में बचा पैसा इतना नहीं है.. अक्टूबर 2025 तक राज्य ने 20 हजार करोड़ का कर्ज बाजार से लिया है.. वहीं अगर ये योजनाएं जारी रहीं.. तो कर्ज और बढ़ेगा.. जिसको लेकर विशेषज्ञ कहते हैं कि पंजाब की अर्थव्यवस्था किसानों पर निर्भर है.. लेकिन सब्सिडी से उत्पादकता नहीं बढ़ रही है.. बल्कि, राज्य दिवालिया होने की कगार पर है..
आपको बता दें कि राजस्थान भी इसी समस्या से जूझ रहा है.. यहां का कर्ज 2024-25 में जीडीपी का 35 फीसदी है.. राज्य को इस साल 1.50 लाख करोड़ का मूलधन चुकाना है.. अब तक 32 हजार करोड़ का कर्ज लिया गया है.. लेकिन बकाया इतना ज्यादा है कि चुकाने के लिए और कर्ज लेना पड़ेगा.. सब्सिडी पर 14 फीसदी कमाई खर्च हो रही है.. खास बात यह है कि राजस्थान में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं अटकी हुई हैं.. लगभग 45 गीगावॉट की सौर और पवन ऊर्जा क्षमता रुकी पड़ी है.. क्योंकि सरकार बिजली खरीद समझौतों पर हस्ताक्षर नहीं कर पा रही है.. 2025 में, 4,300 मेगावॉट सोलर क्षमता ट्रांसमिशन की कमी से पूरी तरह बंद है.. यह 65 हजार करोड़ की परियोजनाएं हैं.. जो जीआईबी (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) संरक्षण.. और ट्रांसमिशन देरी से रुकी हैं.. अगर ये चलतीं, तो राज्य को कमाई होती, लेकिन मुफ्त बिजली देने से बिजली कंपनियां घाटे में हैं..
बिहार में चुनावी वादे पूरे करने पर बोझ इतना बढ़ सकता है कि राज्य के पूंजीगत व्यय का 25 गुना हो जाएगा.. 2024-25 में कर्ज जीडीपी का 35 फीसदी है.. राज्य की अपनी कमाई कम है.. और केंद्र से ट्रांसफर पर निर्भरता ज्यादा है.. मुफ्त राशन, नकद हस्तांतरण जैसी योजनाएं लागू करने से विकास कार्य रुक सकते हैं.. बीबीसी की रिपोर्ट कहती है कि बिहार जैसे राज्यों में सब्सिडी से कर्ज बढ़ रहा है.. और राज्य दिवालिया हो सकता है..
मध्य प्रदेश में ‘मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना’ चल रही है.. जिसमें 21-60 साल की महिलाओं को 1 हजार 250 रुपये महीना मिलते हैं.. 2025-26 में इसका बजट 18 हजार 669 करोड़ है.. इससे राज्य का राजस्व अधिशेष 1.1 फीसदी से घटकर 0.4 फीसदी रह गया.. कर्ज जीडीपी का 30 फीसदी है.. सब्सिडी पर खर्च औसत से कम है.. लेकिन नई योजनाएं बोझ बढ़ा रही हैं..
महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में कमाई का बड़ा हिस्सा वेतन और पेंशन पर जाता है.. मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहन योजना में महिलाओं को 1 हजार 500 रुपये महीना मिलते हैं.. और बजट 36,000 करोड़ का है.. वहीं कर्ज जीडीपी का 18 फीसदी है.. जो लक्ष्य के अंदर है.. लेकिन योजनाएं विकास को प्रभावित कर रही हैं.. बता दें कि कर्नाटक में ‘गृह लक्ष्मी योजना’ से 2,000 रुपये महीना महिलाओं को दी जा रही है.. जिसका बजट 28 हजार 608 करोड़ रूपये है.. इससे राजस्व अधिशेष से घाटा हो गया.. जिसका कर्ज 26 फीसदी है.. 7वां वेतन आयोग से सालाना 20 हजार 208 करोड़ ज्यादा खर्च हो रहा है..
जिसको लेकर 12 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त योजनाओं पर कड़ी टिप्पणी की.. जस्टिस बी.आर. गवाई और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने कहा कि ये योजनाएं लोगों को काम करने से रोक रही हैं.. जस्टिस गवाई ने कहा कि इन फायदों से लोग काम नहीं करना चाहते.. हम परजीवियों की फौज तो नहीं खड़ी कर रहे.. और उन्होंने केंद्र से कहा कि गरीबों को मुख्यधारा में लाने के कदम बेहतर हैं.. न कि मुफ्त चीजें देकर.. यह टिप्पणी दिल्ली में बेघरों के लिए नाइट शेल्टर पर सुनवाई के दौरान आई.. कोर्ट ने कहा कि मुफ्त राशन से लोग काम छोड़ देते हैं.. और यह राष्ट्रीय विकास में बाधा है..
आपको बता दें कि कोर्ट ने केंद्र को 6 हफ्तों में एफिडेविट दाखिल करने को कहा.. जिसमें योजनाओं के कार्यान्वयन की जानकारी हो.. यह पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने फ्रीबीज पर सवाल उठाया.. पहले भी चुनावी वादों पर बहस हुई है.. रिटायर्ड आईएएस और राज्य वित्त विशेषज्ञ अजीत केसरी कहते हैं कि मुफ्त योजनाएं घोषित करते समय आय के स्रोत देखने जरूरी हैं.. नई सरकार पुरानी योजनाएं बंद नहीं करती.. क्योंकि लोगों के नाराज होने का डर होता है.. असम सरकार ने पुरानी योजनाएं खत्म की.. अगर अन्य राज्य ऐसा करें तो बोझ कम हो सकता है.. केसरी का मानना है कि सब्सिडी से पहले बजट का मूल्यांकन जरूरी है.. वरना राज्य की सेहत बिगड़ती है..
वहीं अन्य विशेषज्ञ मानते है कि फ्रीबी कल्चर राज्य को वित्तीय संकट में धकेल रहा है.. विकास से पैसा हटकर जा रहा है.. वहीं आंकड़ो की बात करे तो पीआरएस इंडिया की ‘स्टेट ऑफ स्टेट फाइनेंस 2025’ रिपोर्ट बताती है कि.. राज्यों का कुल कर्ज मार्च 2025 तक जीडीपी का 27.5 फीसदी है.. जो एफआरबीएम लक्ष्य 20 फीसदी से ज्यादा है.. वहीं ब्याज भुगतान 10 फीसदी सालाना बढ़ रहा है.. सब्सिडी पर 3.18 लाख करोड़ खर्च हो रहा है.. जिसमें 53 फीसदी बिजली पर खर्च हो रहा है..
आरबीआई की रिपोर्ट्स भी यही कहती हैं कि सब्सिडी से उपयोगिता कंपनियां कर्ज में डूब रही हैं.. 15वां वित्त आयोग ने सब्सिडी के देर से भुगतान को चक्रवृद्धि समस्या बताया.. फोर्ब्स इंडिया के अनुसार, 2025-26 में पंजाब का डेट-जीडीपी 44.5 फीसदी, राजस्थान 35 फीसदी, बिहार 35 फीसदी, मध्य प्रदेश 30 फीसदी.. हिमाचल, केरल जैसे राज्य 40 फीसदी से ऊपर है…



