मोदी के गुजरात मॉडल की खुली पोल, ₹74,176 करोड़ के कर्ज में किसान
गुजरात में किसानों पर बढ़ते कर्ज को लेकर सियासी सवाल खड़े हो रहे हैं... ₹74,176 करोड़ के कर्ज के आंकड़े ने सरकार के विकास मॉडल पर...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात को लंबे समय से देश के विकास और आर्थिक प्रगति के एक बड़े मॉडल के तौर पर पेश किया जाता रहा है.. बीजेपी सरकार के विकास मॉडल का प्रचार करते हुए गुजरात की सड़कों, उद्योगों, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर की तस्वीरें अक्सर सामने रखी जाती हैं.. लेकिन इसी गुजरात की एक दूसरी तस्वीर भी है.. जो सीधे राज्य के किसानों की स्थिति से जुड़ी हुई है.. सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात के किसान करीब ₹74,176 करोड़ के भारी-भरकम कृषि ऋण के बोझ तले दबे हुए हैं.. ऐसे में सवाल उठता है कि जिस गुजरात मॉडल को देश के सामने विकास की मिसाल बताया जाता है.. उस मॉडल में किसान आखिर किस स्थिति में हैं.. क्या विकास की इस तस्वीर में किसानों की परेशानियों के लिए भी जगह है..
बकाया कृषि ऋण के मामले में गुजरात देश के राज्यों में 10वें स्थान पर बताया जा रहा है.. यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है.. बल्कि हजारों-लाखों किसान परिवारों की आर्थिक स्थिति से जुड़ी गंभीर चिंता को सामने रखता है.. खेती करने वाला किसान जब अपनी फसल तैयार करता है.. तो उसके सामने कई तरह के खर्च होते हैं.. खेत की जुताई से लेकर बीज, खाद, सिंचाई, कीटनाशक.. और डीजल तक हर चीज पर उसे पैसा खर्च करना पड़ता है.. इसके अलावा मौसम की अनिश्चितता और बाजार में फसल के दाम का उतार-चढ़ाव उसकी परेशानी को और बढ़ा देता है.. अगर फसल अच्छी न हो या उसे उसकी उपज का उचित मूल्य न मिले.. तो किसान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि वह अपना कर्ज कैसे चुकाए..
किसानों की मुश्किल सिर्फ कर्ज तक सीमित नहीं है.. खेती की लागत लगातार बढ़ने से किसानों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ता जा रहा है.. बीज और खाद की कीमतों से लेकर डीजल और सिंचाई के खर्च तक, खेती का पूरा गणित किसान के लिए चुनौती बनता जा रहा है.. एक तरफ उत्पादन की लागत बढ़ती है.. तो दूसरी तरफ बाजार में फसल की कीमत हमेशा किसान के नियंत्रण में नहीं होती.. किसान अपनी उपज बेचने के लिए मंडी और बाजार की व्यवस्था पर निर्भर रहता है.. ऐसे में यदि उसे लागत के मुताबिक कीमत नहीं मिलती.. तो उसकी पूरी मेहनत का आर्थिक लाभ किसी और के हिस्से में चला जाता है.. यही वजह है कि खेती करने वाला परिवार कई बार अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए भी कर्ज लेने को मजबूर हो जाता है..
सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसानों के ऊपर इतना बड़ा कृषि ऋण बकाया होने के बावजूद उन्हें राहत क्यों नहीं मिल रही है.. छोटे और सीमांत किसान पहले से ही सीमित संसाधनों के साथ खेती करते हैं.. उनके पास जमीन कम होती है.. आमदनी सीमित होती है और खेती पर निर्भरता ज्यादा होती है.. ऐसे किसान के लिए कुछ हजार या कुछ लाख रुपये का कर्ज भी बहुत बड़ा आर्थिक बोझ बन सकता है.. जब यही कर्ज लगातार बढ़ता जाता है.. तो किसान के सामने अगली फसल के लिए निवेश करने की क्षमता भी कम होती जाती है.. वह पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेने की स्थिति में पहुंच सकता है.. इस तरह कर्ज का एक ऐसा चक्र बन जाता है.. जिससे बाहर निकलना उसके लिए बेहद मुश्किल हो जाता है..
वहीं दूसरी ओर, किसानों के बीच यह सवाल लगातार उठता रहा है कि सरकार की आर्थिक नीतियों में बड़े उद्योगों.. और आम किसानों के साथ समान प्राथमिकता क्यों दिखाई नहीं देती.. विपक्ष का आरोप है कि बड़े उद्योगपतियों के करोड़ों रुपये के कर्ज को लेकर सरकारें जिस तरह के फैसले लेती हैं.. उसी स्तर की राहत छोटे और सीमांत किसानों को क्यों नहीं मिलती.. किसान संगठनों और विपक्षी दलों की ओर से लंबे समय से कृषि ऋण.. और किसानों की आर्थिक स्थिति को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं.. उनका कहना है कि अगर देश की अर्थव्यवस्था में किसान.. और कृषि क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.. तो किसानों को भी कर्ज के बोझ से राहत देने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए..
गुजरात के किसानों की स्थिति को समझने के लिए खेती की बढ़ती लागत को भी देखना जरूरी है.. आज किसान सिर्फ खेत में मेहनत नहीं करता.. बल्कि उसे खेती शुरू करने से पहले ही बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है.. ट्रैक्टर और मशीनरी का खर्च, डीजल, बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई.. और कीटनाशक जैसी लागतें मिलकर खेती का बजट बढ़ा देती हैं.. इसके बाद अगर मौसम ने साथ नहीं दिया, बारिश कम या ज्यादा हो गई, फसल में बीमारी आ गई या बाजार में दाम गिर गए.. तो किसान की पूरी आर्थिक योजना बिगड़ सकती है.. ऐसे हालात में किसान के पास अक्सर एक ही विकल्प बचता है.. कर्ज.. यही वजह है कि कृषि क्षेत्र में कर्ज केवल आर्थिक सहायता का साधन नहीं रह जाता.. बल्कि कई परिवारों के लिए मजबूरी बन जाता है..
किसान जब बैंक या किसी अन्य वित्तीय स्रोत से कर्ज लेता है, तो उसकी उम्मीद होती है कि फसल बिकने के बाद वह रकम वापस कर देगा.. लेकिन समस्या तब पैदा होती है.. जब फसल की कीमत उम्मीद के मुताबिक नहीं मिलती.. मान लीजिए किसान ने एक फसल तैयार करने में जितनी रकम खर्च की.. बाजार में बेचने के बाद उससे कम पैसा मिला.. ऐसी स्थिति में किसान अपने पुराने कर्ज की पूरी रकम नहीं चुका पाता.. अगली फसल के लिए उसे फिर पैसे की जरूरत पड़ती है.. और वह दोबारा कर्ज लेने को मजबूर हो सकता है.. इस तरह एक फसल का नुकसान अगली फसल की शुरुआत को भी प्रभावित करता है.. धीरे-धीरे किसान की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जाती है और कर्ज का बोझ बढ़ता जाता है..



