मोदी के कारनामों से मोहन भागवत ने खुद को किया अलग, बीजेपी और संघ के बीच खींची लकीर
मोहन भगवत ने कहा है कि आरएसएस किसी के "खिलाफ” नहीं है और न ही वह सत्ता चाहता है या "दबाव समूह” बनने का लक्ष्य रखता है, बल्कि उसका उद्देश्य समाज को एकजुट करना है। मतलब यहां भी मोहन भागवत ने खुद को और संघ को बीजेपी और नरेंद्र मोदी से अलग कर लिया।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या मोदी के फंसते ही मोहन भागवत ने उनसे दूरी बनाई? क्या जिस संघ की मोदी ने लाल किले से सराहना की थी अब उसने प्रधानमंत्री मोदी से खुद से अलग कर लिया है?
ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि आरएसएस चीफ मोहन भागवत का एक स्टेटमेंट सामने आया है एक बार फिर संघ से बीजेपी के रिश्ते को चर्चा में ला दिया है। और सबसे खास बात ये है कि उनका ये बयान ऐसे समय में आया है जब मोदी जी अंतराष्ट्रीय और कई आंतरिक मुद्दों पर बुरी तरह से घिर चुके हैं। तो मोहन भागवत ने मोदी जी के अच्छे दिनों को लेकर क्या बयान दिया है जिससे जिसने बीजेपी और आरएसएस को दो भागों में बांटकर रख दिया है।
कहते हैं कि डूबते जहाज से चूहे सबसे पहले भागते हैं। अब देखिए मोदी जी का संघ का प्रति कितना प्रेम है न ये किसी से छिपा है और न उन्होंने कभी इसे छ्पाने की कोशिश की है। और ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि संघ भी चुनावों के दौरान भाजपा के लिए जमीन पर कितनी मेहनत करता है। लेसिन आरएसएस चीफ मोहन भागवत का एक ताजा बयान सामने आया है जिसने सबको चौंका दिया है। इस बयान ने बीजेपी के अंदर खलबली मचा दी है। हिंदुस्तान में छपी इस रिपोर्ट के मुताबिक मोहन भागवत ने बीजेपी और आरएसएस के बीच लकीर खींचते हुए साफ कहा है कि भाजपा के अच्छे दिन आरएसएस के चलते आएं हैं।
मतलब अच्छे दिन का वादा करके सत्ता पर काबिज हुए मोदी जी के अच्छे दिन खुद संघ के बदौलत आए हैं। इस खबर के मुताबिक सरसंघचालक मोहन भागवत का कहना है कि राम मंदिर आंदोलन के लिए आरएसएस ने प्रतिबद्धता दिखाई थी और जिसने इसका साथ दिया, उसे फायदा मिला। इस तरह उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि संघ के नेतृत्व में चले राम मंदिर आंदोलन का फायदा भाजपा को चुनावी राजनीति में भी मिला। मतलब मोहन भागवत दबे अल्फाजों में मोदी जी और उनकी टीम को यहां ये मैसेज दे गए हैं कि ‘हम तुमसे नहीं बल्कि तुम हमसे हो’। वहीं जनसत्ता एक्स्प्रेस में छपी इस रिपोर्ट के मुताबिक, संघ प्रमुख ने कहा कि कई लोगों को लगता है कि नरेन्द्र मोदी आरएसएस की वजह से प्रधानमंत्री हैं, लेकिन मोदी भले ही एक राजनीतिक दल का नेतृत्व करते हैं और आरएसएस के कई स्वयंसेवक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं, “राजनीतिक दल एक अलग इकाई है और वह आरएसएस का हिस्सा नहीं है।”
इसमें आगे लिखा है कि मोहन भगवत ने कहा है कि आरएसएस किसी के “खिलाफ” नहीं है और न ही वह सत्ता चाहता है या “दबाव समूह” बनने का लक्ष्य रखता है, बल्कि उसका उद्देश्य समाज को एकजुट करना है। मतलब यहां भी मोहन भागवत ने खुद को और संघ को बीजेपी और नरेंद्र मोदी से अलग कर लिया। लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वो ऐसा क्यों कह रहे हैं। जब प्रधानमंत्री मोदी खुद को आरएसएस से अलग करने की कोशिश नहीं करते हैं तो मोहन भागवत क्यों बीजेपी और आरएसएस के बीच में ये लाइन खींचना जरूरी समझ रहे हैं।
अपको याद होगा कि 2024 के आम चुनाव के दौरान तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि हम आरएसएस के बिना भी चुनाव में जीत हासिल कर सकते हैं। हमें आरएसएस की जरूरत नहीं है। उनकी ये एक स्टेटमेंट भाजपा पर इतनी भारी पड़ी थी कि आरएसएस ने बीच रास्ते में बीजेपी का साथ छोड़ दिया था और कह दिया था कि जाओ अब अपने बल पर चुनाव जीतकर दिखा दो। जिसका नतीजा ये हुआ कि चार सौ पार की सपना देखने वाले प्रधानमंत्री बैसाखियों पर आ गए। उसके बाद से प्रधानमंत्री मोदी ट्रैक पर वापिस आ गए और संघ को खुश करनें में लग गए। उन्होंने संघ के सौ साल पूरे होने पर 100 रुपये का सिक्का जारी किया।
डाक टिकट जारी किया, यहां तक की स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले से आरएसएस की सराहना करते हुए उसे दुनिया की सबसे बड़ी एनजीओ बता दी। मतलब जिस संगठन का इतिहास अंगेजो के लिए मुखबिरी का रहा, जिसने स्वतंत्रता दिवस को माननेसे इनकार किया उसकी स्वतंत्रता दिवस के दिन सरहाना हुई और वो भी लाल किले की प्रचीर से। यहां तक की लगभग हर संवैधानिक पद पर संघ के लोगों को बैठा दिया। मतलब एक प्रधानमंत्री रहते हुए उसने जो आरएसएस के लिए जो किया जा सकता था वो सब किया। जिसके बाद ऐसा लगा कि आरएसएस ने जैसे उनको माफ सा कर दिया। लेकिन अब लगता है कि एक बार फिर से मोहन भागवत के दिमाग में कुछ और चल रहा है और तभी अब उनके ऐसे ऐसे बयान सामने आ रहे हैं जो बीजेपी की टेंशन बढ़ा रहे हैं।
अभी आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम हुआ जिसमें बॉलिवुड के कई बड़े बड़े सुपरस्टार हाजिरी लगाने पहुंचे थे।वर्ली क्षेत्र के नेहरू सेंटर में आयोजित दो दिवसीय व्याख्यान शृंखला ‘संघ की 100 साल की यात्रा : नये क्षितिज’ के पहले दिन भागवत ने कहा कि आरएसएस ने बहुत पहले ही तय कर लिया था कि वह समाज के एकीकरण के अलावा कोई और काम नहीं करेगा और एक बार यह काम पूरा हो जाने के बाद वह कोई अन्य एजेंडा नहीं अपनाएगा। तो अब सवाल उठ रहा है कि आखिर मोहन भागवत को क्या जरूरत पड़ी है कि वो संघ पर लगे दागों का मिटाने के लिए कार्यक्रम कर रहे हैं। बॉलीवुड से लोगों को बुला रहे हैं और खुद राजनीति से अलग रखकर सबके लिए दरवाजे खोलने की बात कर रहे हैं। क्या वो यहां ये जताने की कोशिश कर रहे हैं कि संघ बीजेपी का मातृ संगठन है या मोदी जी के बुरे दिन आते ही मोहन भागवत उनसे किनारा कर रहे हैं।
तो कुल मिलाकर तस्वीर साफ होती जा रही है। मोहन भागवत के बयान कोई साधारण वैचारिक स्पष्टीकरण नहीं हैं, बल्कि ये समय, शब्द और संदर्भ—तीनों के लिहाज से बेहद सियासी हैं। जिस वक्त प्रधानमंत्री मोदी अंतरराष्ट्रीय दबाव, घरेलू असंतोष, गठबंधन की मजबूरियों और 2024 के झटके से उबरने की कोशिश कर रहे हैं, ठीक उसी वक्त संघ प्रमुख का बार-बार ये कहना कि आरएसएस राजनीति से अलग है, बीजेपी का हिस्सा नहीं है और सत्ता उसका लक्ष्य नहीं है—ये अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है। सवाल ये नहीं है कि संघ राजनीति में है या नहीं, सवाल ये है कि वो खुद को इस वक्त क्यों अलग दिखाना चाहता है।
मोदी सरकार ने पिछले दस सालों में आरएसएस को वो सम्मान, वो संस्थागत जगह और वो वैचारिक वैधता दी, जो शायद पहले कभी नहीं मिली। लाल किले से तारीफ, संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां, प्रतीकात्मक सम्मान, सब कुछ हुआ। इसके बावजूद अगर आज संघ ये कह रहा है कि “हम तुमसे नहीं, तुम हमसे हो” और साथ ही ये भी जोड़ रहा है कि “राजनीतिक दल एक अलग इकाई है”, तो ये सिर्फ दूरी नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है। चेतावनी कि सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन संगठन रहता है।
जेपी नड्डा के एक बयान ने जो नुकसान किया था, उसकी याद संघ ने शायद अभी भुलाई नहीं है। 2024 में बीजेपी को जो राजनीतिक सबक मिला, उसमें संघ की चुप्पी भी एक बड़ा फैक्टर थी। अब शताब्दी वर्ष के बहाने संघ खुद को सांस्कृतिक, सामाजिक और सर्वसमावेशी साबित करने में जुटा है, ताकि अगर कल हालात और बिगड़ें तो उस पर सत्ता की नाकामी का ठीकरा न फूटे। यही वजह है कि बॉलीवुड, बुद्धिजीवी और गैर-राजनीतिक मंचों की बात हो रही है। संघ शायद ये साफ कर देना चाहता है कि अगर मोदी के अच्छे दिन खत्म होते हैं, तो वो कहानी सिर्फ मोदी और बीजेपी की होगी, संघ की नहीं। इसलिए सवाल वाजिब है कि क्या ये वैचारिक संतुलन है या सियासी आत्मरक्षा? जवाब वक्त देगा, लेकिन इतना तय है कि बीजेपी और आरएसएस के रिश्ते में खिंची ये नई लकीर आने वाले दिनों में और गहरी हो सकती है।



