बुलडोजर से गिराई गई नेहरू की मूर्ति, कांग्रेस ने बीजेपी की चुप्पी पर दागे सवाल, मच गया बवाल
बीजेपी राज में जो हो जाए वही कम है। सरकार सत्ता में आने के बाद बीजेपी नेता इस कदर लोगों के जहन में नफरत भरने लगते हैं जिसकी कोई हद नहीं है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बीजेपी राज में जो हो जाए वही कम है। सरकार सत्ता में आने के बाद बीजेपी नेता इस कदर लोगों के जहन में नफरत भरने लगते हैं जिसकी कोई हद नहीं है।
देश में बीजेपी राज से पहले शायद ही ऐसा कभी हुआ होगा जब इस तरह का नफरती बीज बोया गया हो जिससे लोगों को नुकसान पहुंचा हो या देश की अखंडता पर सवाल उठे हों। लेकिन जबसे बीजेपी की सरकार सत्ता में आई है तबसे कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है जिसकी पहले कल्पना नहीं की थी। खैर अब बीजेपी की सरकार का तो सबकुछ मुमकिन है। तभी तो लोग बेख़ौफ़ होकर जो मन में आ रहा वही कर रहे हैं बिना किसी रोक टोक के। इसी बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसकी वजह से सियासी बवाल मचा हुआ है। इस मामले को लेकर विपक्ष से लेकर जनता तक आगबवूला है और न सिर्फ असम की बीजेपी सरकार पर बल्कि केंद्र में बैठी मोदी सरकार पर भी जमकर सवाल उठा रहे हैं। और सत्ता के नशे में चूर बीजेपी नेता इन मामलों पर बोलने से कतरा रहे हैं चुप्पी साढ़े हुए बैठे हैं।
असम के कछार में जवाहरलाल नेहरू की मूर्ति को कुछ अज्ञात लोगों ने तोड़ दिया. CCTV में कैद हुई इस घटना से राजनीतिक बवाल मच गया है. लोग इस घटना की आलोचना कर रहे हैं और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं. पाइलापूल बाजार में हुई यह घटना आज देश भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। जहां अज्ञात लोगों ने एक एक्सकेवेटर मशीन की मदद से नेहरू जी की 10 फुट ऊंची मूर्ति को गिरा दिया। सुबह के समय जब लोग घूमने निकले, तो उन्होंने मूर्ति को टूटा हुआ पाया। स्थानीय कांग्रेस नेता प्रदीप कुमार डे ने इसे लेकर बताया कि पहले पुलिस ने कहा कि मूर्ति खुद गिर गई, लेकिन सीसीटीवी फुटेज में साफ दिखा कि कुछ लोग रात में मशीन से इसे तोड़ रहे थे। पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की है, एक्सकेवेटर को जब्त कर लिया है और एक व्यक्ति को हिरासत में लिया है, जबकि ड्राइवर फरार है। जांच जारी है, लेकिन अभी तक अपराधियों की पहचान या मकसद का पता नहीं चला है।
प्रदीप कुमार डे ने कहा कि मूर्ति 2000 में नेहरू कॉलेज के सामने लगाई गई थी, जो 1965 में बना था। उन्होंने कहा कि स्वर्गीय पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष मोहन देव और असम के पूर्व मंत्री दिनेश प्रसाद गोआला भी मूर्ति लगाने के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उन्होंने कहा, “1953 में उसी इलाके में नेहरू के नाम पर एक हाई स्कूल बनाया गया था। हमारे यहां पहले प्रधानमंत्री को सम्मान देने का एक शानदार कल्चर है।” कांग्रेस ने इस घटना पर FIR दर्ज कराई है। इस घटना ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। कांग्रेस पार्टी ने इसे इतिहास पर हमला बताया और असम की भाजपा सरकार पर चुप्पी साधने का आरोप लगाया। कांग्रेस के असम अध्यक्ष गौरव गोगोई ने कहा कि यह कायरतापूर्ण हरकत है और असम के लोग इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे।
असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने इस घटना की निंदा की और दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की। उन्होंने कहा कि ऐसा कृत्य केवल एक प्रतिमा को नष्ट करना ही नहीं है। यह एक महान नेता और विशिष्ट स्वतंत्रता सेनानी की विरासत का अपमान है, जिन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी। गोगोई ने कहा कि भले ही राजनीतिक विचारधारा में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इस तरह के अनैतिक कृत्यों के माध्यम से लोकतांत्रिक इतिहास को मिटाने का कोई भी प्रयास अस्वीकार्य है।
बीजेपी सरकार पर बोला हमलाउन्होंने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि बीजेपी के कार्यकाल में ऐसी शर्मनाक घटना घटने के बावजूद सरकार ने इस मामले पर ‘चिंताजनक चुप्पी’ बनाए रखी है। लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता ने कहा कि भारत और असम की ताकत बहुलवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों को कायम रखने में निहित है और हमें हर कीमत पर इनकी रक्षा करनी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों से इस कृत्य में शामिल लोगों की तुरंत पहचान करने और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आग्रह किया।
कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष अभिजीत पॉल ने इस तोड़फोड़ की तुलना बांग्लादेश के फाउंडिंग प्रेसिडेंट शेख मुजीबुर रहमान की मूर्तियों को गिराने से की है। बता दें कि अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद मुजीबुर हुई थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नेहरू एक फ्रीडम फाइटर थे जिन्होंने भारत का भविष्य बनाया। अभिजीत पॉल ने कहा, “उनकी मूर्ति को तोड़ना शर्मनाक है।
कुछ लोग नेहरू को उनके पॉलिटिकल विचारों की वजह से नापसंद करते हैं, लेकिन उनकी मूर्ति को तोड़ना मुझे याद दिलाता है कि शेख हसीना के गिरने के बाद बांग्लादेश के फादर की मूर्तियों को कैसे तोड़ा गया था। दोनों के पीछे का आइडिया एक ही है।” अभिजीत पॉल ने बीजेपी की चुप्पी पर सवाल उठाया और और ज़्यादा गुस्सा दिखाने की अपील की। अभिजीत पॉल ने कहा, “यह इलाका BJP विधायक कौशिक राय के चुनाव क्षेत्र में आता है। राय मंत्री हैं, लेकिन उन्होंने इसके खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा है।”
गौरतलब है कि छोटे-छोटे मुद्दों को उठाने वाली बीजेपी सरकार और सीएम सरमा इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। भाजपा सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन पुलिस का कहना है कि वे मामले की गंभीरता से जांच कर रहे हैं। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब देश में राजनीतिक तनाव बढ़ा हुआ है, और विपक्षी दल अक्सर सत्ताधारी पार्टी पर ऐतिहासिक व्यक्तियों के सम्मान को नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हैं।
नेहरू जी भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने आजादी के बाद देश को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी मूर्तियां पूरे देश में हैं, और ऐसी घटनाएं पहले भी कुछ जगहों पर हुई हैं, लेकिन यह असम में पहली बार इतनी बड़ी घटना है।
इस घटना के बाद यह समझना बेहद जरूरी है कि मूर्ति तोड़ना सिर्फ एक मूर्ति का नुकसान नहीं है, बल्कि यह देश के इतिहास और विरासत पर हमला है। जैसा की हम सभी जानते हैं कि नेहरू जी ने भारत को आधुनिक बनाने के लिए कई योजनाएं बनाईं, जैसे पंचवर्षीय योजनाएं, वैज्ञानिक संस्थान और शिक्षा का प्रसार। असम जैसे राज्य में, जहां विविधता है, नेहरू जी की नीतियां एकता को मजबूत करने वाली रही हैं। लेकिन आजकल राजनीति में वैचारिक मतभेद इतने गहरे हो गए हैं कि लोग ऐतिहासिक व्यक्तियों को भी निशाना बनाते हैं।
इस घटना से स्थानीय लोग दुखी हैं, क्योंकि पाइलापूल इलाका शांतिपूर्ण है और वहां नेहरू जी की मूर्ति कई सालों से खड़ी थी। कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर इसकी निंदा की और कहा कि भाजपा की नफरत मूर्तियां तोड़ सकती है, लेकिन नेहरू जी के विचारों को नहीं मिटा सकती।
असम सरकार को चाहिए कि वह सुरक्षा बढ़ाए और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाए। देश में लोकतंत्र है, जहां मतभेद व्यक्त करने के लिए बातचीत और बहस है, न कि हिंसा। नेहरू जी खुद अहिंसा के समर्थक थे, और उनकी स्मृति को इस तरह अपमानित करना गलत है।इस घटना का व्यापक संदर्भ देखें तो, भारत में मूर्तियों को तोड़ने की घटनाएं पहले भी हुई हैं। मिसाल के लिए, 2018 में कुछ राज्यों में लेनिन और पेरियार की मूर्तियां तोड़ी गईं, जो राजनीतिक विवादों से जुड़ी थीं। असम में भी जातीय और राजनीतिक तनाव रहते हैं, लेकिन नेहरू जी की मूर्ति का तोड़ा जाना एक नया मामला है।
सियासी पंडितों का यह मानना है कि सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहें और नफरत ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देती हैं। सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा और जागरूकता से लोगों को एकजुट रखे। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के करीबी पर आरोप लगाया, लेकिन बिना सबूत के यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है। सच्चाई खोजने के लिए हमें तथ्यों पर भरोसा करना चाहिए, न कि पक्षपात पर।
नेहरू जी के योगदान को याद करें: उन्होंने आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थान बनाए, जो आज देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं। असम में भी नेहरू जी की नीतियों से चाय बागान, तेल उद्योग और शिक्षा का विकास हुआ। इसलिए, उनकी मूर्ति तोड़ना सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि पूरे राज्य के इतिहास का अपमान है।
आगे चलकर, इस घटना से सबक लेना चाहिए। पुलिस को सीसीटीवी कैमरों को बढ़ाना चाहिए और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। इस मामले को लेकर बीजेपी सरकार को ही खुलकर सामने आना चाहिए और ऐसी घटनाओं की न सिर्फ कड़ी निंदा करनी चाहिए बल्कि एकजुट होकर ऐसी घटनायें न हों इसे लेकर ठोस कदम उठाना चाहिए।
देश का विकास तभी होगा जब हम अतीत का सम्मान करेंगे और भविष्य की ओर देखेंगे। नेहरू जी ने कहा था कि भारत एक विचार है, जो विविधता में एकता रखता है। असम जैसे बहुभाषी राज्य में यह विचार और भी महत्वपूर्ण है। उम्मीद है कि जांच जल्द पूरी होगी और दोषी पकड़े जाएंगे, ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। कुल मिलाकर, यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि राजनीति में कितनी कड़वाहट आ गई है, लेकिन हमें इसे दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। खैर बीजेपी राज में ऐसी घटनाएं आम होती जा रही है। जिनपर लगाम लगाने की जरूरत है।



