चुनाव आयोग में बहुमत नहीं तो फैसले कैसे वैध : कपिल सिब्बल

एसआईआर विवाद देश में सियासी इमजरजेंसी जैसे हालात

  • एसआईआर पर विद्रोह चुनाव आयोग के घर में ही फूटी बगावत की चिंगारी
  • बाहर विपक्ष का हल्लाबोल अंदर असहमति की गूंज

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। क्या आपको पता है कि सिर्फ देश की जनता ही नहीं देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था चुनाव आयोग भी पिछले कई महीनों से बेचैनी में था। जिस चुनाव आयोग के फैसले से देश का लोकतंत्र चलता है जिस संस्था के हाथ में करोड़ों मतदाताओं की किस्मत और वोटर लिस्ट की चाबी होती है उसी तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर एसआईआर को लेकर ऐसी हलचल मची है कि अब मामला एटम बम की तरह फूटा है और पूरे देश में इसकी गूंज सुनाई दे रही है।
दस महीने, दस महीने तक सवाल, दस महीने तक आपत्तियां और अब सामने आया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई। कुछ आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के उन फैसलों को लेकर थीं जिनके बारे में दोनों का कहना था कि उन्हें जानकारी या मंजूरी नहीं थी। एक मामले में कार्रवाई को अनधिकृत और गैरकानूनी तक बताया गया। अब जरा इस तस्वीर को समझते हैं। चुनाव आयोग में तीन सदस्य है एक तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दूसरी तरफ दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी और दोनों की तरफ से बार बार लिखित आपत्तियों का दर्ज करना तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ ठीक चल रहा था। क्या एसआईआर सिर्फ वोटर लिस्ट की सफाई थी या फिर वोटर लिस्ट से आगे बढ़कर मामला अब वोटर के अधिकार और चुनावी व्यवस्था के नियंत्रण तक पहुंच गया है। जिस प्रकार के आरोप सपूर्ण विपक्ष पहले लगा चुका है और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बार बार दोहरा रहे हैं कि वोटों की चोरी की जा रही है। तेजस्वी यादव ने कहा है कि उनकी सरकार हाईजैक कर ली गयी।

फिर आया वोटर डाटा का सवाल

वह डाटा जिसके आधार पर तय होना है कि कौन वोट देगा और किसका नाम सूची में रहेगा। दोनों चुनाव आयुक्तों ने डेटा के क्रमिक केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई। मामला इतना गंभीर था कि आईटी व्यवस्था और चुनावी रोल से जुड़े अधिकारों को लेकर कैबिनेट सचिव तक पत्र भेजे गए। गोवा में 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया जहां स्थानीय अधिकारी पात्रता से संतुष्ट थे लेकिन सॉफ्टवेयर के स्तर पर उनकी स्वीकृति दर्ज नहीं हो पा रही थी। अब बताइए यह सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी है या लोकतंत्र के दरवाजे पर लगा ऐसा ताला जिसकी चाबी सिस्टम के पास चली जाए उधर देश में एसआईआर को लेकर पहले से बवाल है। बिहार से शुरू हुई प्रक्रिया 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची और ड्राफ्ट रोल में 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जाने की बात सामने आई। दिल्ली में लाखों मतदाताओं को नोटिस दिए गए। अदालत में प्रक्रिया पर सवाल उठे। और अब उसी एसआईआर पर केंद्र में बैठे चुनाव आयोग के भीतर से दो सदस्यों की लगातार आपत्तियां सामने आ गई हैं। मतलब आग बाहर थी ही अब धुआं घर के भीतर से भी दिखाई दे रहा है। इस पूरे प्रकरण पर विपक्ष भी मैदान में उतर आया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी समेत विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई जांच और एसआईआर पर रोक या वापसी जैसी मांगें उठाई हैं। अरविंद केजरीवाल ने तो एसआईआर रद्द करने और पुराने वोटर रोल बहाल करने की मांग तक कर दी है।

आपत्तियां छोटी मोटी नहीं है

चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां कोई छोटी-मोटी फाइलों पर नहीं थीं नए वोटर कौन होंगे किसका नाम वोटर लिस्ट से हटेगा किसका नाम दोबारा जोड़ा जाएगा फार्म क्यों बदला गया वोटर डाटा किसके नियंत्रण में रहेगा और सबसे बड़ा सवाल जमीन पर वोटर लिस्ट तैयार करने वाले अधिकारियों की ताकत क्या धीरे धीरे दिल्ली के केंद्रीय सिस्टम के हाथ में जा रही है यानी जिस एसआईआर को को लेकर सड़क से संसद और अदालत तक सवाल उठ रहे थे अब उसकी तपिश चुनाव आयोग के अंदर तक पहुंच चुकी है। फार्म 6 का मामला तो और भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। नए वोटर को भरने वाले इस वैधानिक फॉर्म में एसआईआर से जुड़ा नया सवाल जोड़े जाने पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई। रिकॉर्ड पर इसे अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए इसे हटाने की मांग तक हुई।

‘एक व्यक्ति कैसे ले सकता है महत्वपूर्ण फैसले’

एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का मामला सामने आने के बाद राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सीधा हमला बोला। उनहोंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ज्ञानेश कुमार के साथ आयोग के बाकी दो सदस्यों का बहुमत नहीं था इसके बावजूद फैसले कैसे लिए गए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग तीन सदस्यों की संस्था है और महत्वपूर्ण फैसले बहुमत से होने चाहिए उनके मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में 14 बार फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराई लेकिन उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया। कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि अगर दो आयुक्त किसी निर्णय के खिलाफ हैं तो उसे केवल एक सदस्य के स्तर पर कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है? उन्होंने कहा कि फार्म 6 में बदलाव से लेकर एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों तक में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिब्बल ने मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित करने एसआईआर प्रक्रिया रोकने और हाल में हुए बिहार तथा अन्य चुनावों को लेकर भी कार्रवाई की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर के तहत अब तक करोड़ों नाम प्रभावित हुए हैं और पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। उनहोंने कहा कि चुनाव आयोग तीन सदस्यों की संस्था है अगर दो सदस्य किसी फैसले पर आपत्ति दर्ज करते हैं और फिर भी फैसला लागू होता है तो आखिर उस फैसले की वैधानिक और संस्थागत जवाबदेही किसकी होगी?

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