योगी सरकार की छवि पर दाग लगवा रहे अधिकारी
इतने हादसों के बाद भी कानपुर में अवैध निर्माणों की भरमार

- कहां सो गया प्रवर्तन दस्ता
- अतिरिक्त स्लैब, पार्किंग में निर्माण से लेकर बेसमेंट तक, जांच के दायरे
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क / प्रांजुल मिश्रा
कानपुर। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस और शहरों के सुनियोजित विकास का दावा करती है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। दिल्ली से लेकर लखनऊ-कानपुर में हुए हादसों में कितने लोगों की जाने जा चुकीं हैं चार दिन नियम कानून याद आते हैं उसके बाद फिर से अधिकारी भेड़ चाल चलने लग जाते हैं। कानपुर की सडक़ों, बाजारों और घनी आबादी वाले इलाकों में भवन निर्माण के नियमों के पालन को लेकर उठ रहे सवाल इस दावे की जमीनी हकीकत परखने की मांग कर रहे हैं।
शहर में जगह-जगह बहुमंजिला इमारतों के निर्माण, पार्किंग की जगह पर व्यावसायिक गतिविधियों और स्वीकृत मानचित्र से इतर निर्माण की शिकायतें सामने आतीं रहतीं हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल कानपुर विकास प्राधिकरण यानी केडीए के प्रवर्तन तंत्र की सक्रियता और जवाबदेही को लेकर है।चमनगंज, बेकनगंज, प्रेम नगर, बांस मंडी, स्वरूप नगर, आर्य नगर, जाजमऊ, कृष्णा नगर, बिरहाना रोड, पटकापुर और 80 फीट रोड समेत शहर के विभिन्न हिस्सों में निर्माण संबंधी शिकायतों की निष्पक्ष जांच की जरूरत है। कहीं पुराने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की जगह नई इमारतें खड़ी होने पर सवाल हैं, तो कहीं संकरी सडक़ों और सीमित पार्किंग वाले क्षेत्रों में बहुमंजिला निर्माण की स्थिति की पड़ताल जरूरी है। सवाल यह नहीं कि शहर में इमारतें क्यों बन रही हैं, बल्कि यह है कि क्या हर निर्माण स्वीकृत नक्शे, निर्धारित ऊंचाई, भू-उपयोग, पार्किंग और अग्नि सुरक्षा के मानकों के अनुरूप हो रहा है? शहर में भवन निर्माण के नियमों के अनुपालन की जांच केवल बाहर से इमारत देखकर पूरी नहीं हो सकती। कई मामलों में असली स्थिति स्वीकृत मानचित्र और मौके पर मौजूद निर्माण की तुलना से ही स्पष्ट होती है। जांच में इन बिंदुओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए— स्वीकृत नक्शे के मुकाबले वास्तविक मंजिलों और अतिरिक्त स्लैब की संख्या कितनी है? बेसमेंट का स्वीकृत उपयोग क्या है और वहां वास्तव में दुकान, कार्यालय, गोदाम या अन्य व्यावसायिक गतिविधि तो नहीं चल रही?
सरकार की छवि पर डेंट लगा रहे अधिकारी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ नीति का मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि विभागीय कार्रवाई की पारदर्शिता से भी होता है। जब किसी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं और शिकायतों का समाधान दिखाई नहीं देता, तो जनता के बीच पूरे प्रशासन को लेकर संदेह पैदा हो सकता है। इसलिए केडीए के लिए जरूरी है कि वह जोनवार निर्माणों का रिकॉर्ड सार्वजनिक करे, शिकायतों पर समयबद्ध जांच कराए और प्रमाणित उल्लंघनों पर कार्रवाई की जानकारी दे। केवल प्रवर्तन जोन 1्र में 250-300 से ज़्यादा अवैध निर्माण हैं अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, फिर भी जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति की असली परीक्षा यही है कि नियम तोडऩे वाले चाहे कितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, उन पर कार्रवाई हो और निगरानी में लापरवाही करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाए। कानपुर की जनता को केवल नोटिसों और आश्वासनों की नहीं, सुरक्षित भवनों, खुली पार्किंग, बाधारहित फुटपाथ और जाम से राहत की जरूरत है। अब निगाहें केडीए के उच्चाधिकारियों पर हैं कि वे जोन-1 समेत शहर के संवेदनशील क्षेत्रों में निष्पक्ष जांच कराकर निर्माण संबंधी शिकायतों की सच्चाई सामने लाते हैं या नहीं। सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—जब शहर में निर्माण तेजी से हो रहे हैं, तो प्रवर्तन तंत्र की निगरानी कितनी प्रभावी है और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो उसकी जवाबदेही आखिर किसकी होगी?
कागजों में तो पार्किंग गाडिय़ां सडक़ पर, जाम की कीमत जनता चुकाए?
कानपुर पहले ही यातायात के दबाव से जूझ रहा है। व्यस्त बाजारों और घनी आबादी वाले इलाकों में सडक़ की चौड़ाई सीमित है। ऐसे में यदि किसी व्यावसायिक भवन की निर्धारित पार्किंग का इस्तेमाल दुकान, कार्यालय या फ्लैट के लिए किया जाता है, तो वहां आने वाले लोगों के वाहन सडक़ या फुटपाथ पर खड़े होने की आशंका बढ़ जाती है। इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। पैदल चलने वालों को फुटपाथ छोडक़र सडक़ पर उतरना पड़ सकता है, दोपहिया और चारपहिया वाहनों की आवाजाही बाधित होती है और आपातकालीन सेवाओं के लिए रास्ता मुश्किल हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि भवन निर्माण की अनुमति देते समय पार्किंग की जरूरतों का आकलन कैसे किया जा रहा है? क्या निर्माण पूरा होने के बाद यह सत्यापित किया जाता है कि पार्किंग निर्धारित स्थान पर ही उपलब्ध है? यदि स्वीकृत पार्किंग का व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा है, तो उसकी निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी है? नक्शे में पार्किंग दिखाकर जमीन पर उसका दूसरा इस्तेमाल होने की शिकायतों की जांच जरूरी है।
दिल्ली से लखनऊ-कानपुर तक हादसों की चेतावनी, सुरक्षा पर सवाल?
देश के अलग-अलग शहरों में हुए हादसे यह याद दिलाते हैं कि भवन निर्माण, अग्नि सुरक्षा और आपातकालीन निकास के नियम केवल कागजी औपचारिकताएं नहीं हैं। उनकी अनदेखी लोगों की जान पर भारी पड़ सकती है। दिल्ली के सत्य निकेतन में अप्रैल 2022 में निर्माणाधीन इमारत ढहने से मजदूरों की मौत हुई थी। लखनऊ के हजरतगंज स्थित लेवाना सूट्स होटल में 5 सितंबर 2022 को आग लगने से चार लोगों की मौत हुई। दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर में 27 जुलाई 2024 को राव आईएएस स्टडी सर्किल के बेसमेंट में पानी भरने से तीन सिविल सेवा अभ्यर्थियों की जान चली गई। इन घटनाओं ने भवन सुरक्षा, जल निकासी, स्वीकृत उपयोग और संबंधित विभागों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए। कानपुर भी ऐसी त्रासदियों से अछूता नहीं रहा है। मई 2022 में हमराज कॉम्प्लेक्स में भीषण आग लगी थी अरबों रुपयों का नुकसान हुआ था। वहीं, मई 2025 में चमनगंज के प्रेम नगर क्षेत्र की एक बहुमंजिला आवासीय-सह-व्यावसायिक इमारत में आग लगने से एक दंपति और उनकी तीन बेटियों समेत पांच लोगों की मौत हो गई थी। उस इमारत में जूता निर्माण से जुड़ी गतिविधियां भी संचालित हो रही थीं। आग लगने के कारणों और सुरक्षा संबंधी पहलुओं की जांच की जरूरत ने एक बार फिर घनी आबादी वाले इलाकों में भवनों के इस्तेमाल और आपातकालीन पहुंच के सवालों को सामने ला दिया। इन घटनाओं को कानपुर के हर निर्माण में अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन वे यह जरूर बताती हैं कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी की आशंका को हल्के में नहीं लिया जा सकता। कानपुर में भी यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आवासीय और व्यावसायिक उपयोग के नियमों, अग्नि सुरक्षा, निकास मार्ग और भवन की संरचनात्मक सुरक्षा से समझौता न हो। शहर में अवैध निर्माणों की शिकायतें लगातार सामने आती हैं, तो केवल भवन स्वामियों को नोटिस देकर मामला समाप्त नहीं किया जा सकता। विभाग को यह बताना होगा कि किन क्षेत्रों में कितने निर्माणों का निरीक्षण हुआ, कितने मामलों में उल्लंघन पाया गया और कितने मामलों में प्रभावी कार्रवाई की गई…।
सीएम की सख्ती के बाद भी अधिकारी काट रहे मौज
सरकार की नीतियों का वास्तविक असर तभी दिखाई देता है, जब सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली पारदर्शी हो और नियम तोडऩे वालों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई हो। यदि किसी क्षेत्र में निर्माण कार्य शुरू होने के बाद भी लंबे समय तक मानकों के उल्लंघन की शिकायतें बनी रहती हैं, तो संबंधित प्रवर्तन अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। केडीए के जोन-1 के प्रवर्तन प्रभारी अतुल राय की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप हैं कि क्षेत्र में कुछ निर्माणों में अतिरिक्त स्लैब डालकर इमारतों का विस्तार किया जा रहा है और बेसमेंट का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य से अलग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। इन आरोपों की पुष्टि के लिए स्वीकृत मानचित्रों, संशोधित अनुमतियों, स्थल निरीक्षण रिपोर्ट, सीलिंग और ध्वस्तीकरण संबंधी अभिलेखों का परीक्षण जरूरी है। यदि किसी निर्माण में स्वीकृत नक्शे से अधिक स्लैब डाले गए हैं, पार्किंग क्षेत्र को दुकानों या कार्यालयों में बदला गया है अथवा बेसमेंट का उपयोग नियमों के विरुद्ध हो रहा है, तो यह केवल भवन स्वामी का मामला नहीं रह जाता। ऐसे मामलों में यह भी जांचना होगा कि निर्माण के दौरान निरीक्षण किसने किया, उल्लंघन की जानकारी विभाग तक कब पहुंची और समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
अब इंस्टाग्राम पर भी अपनी बात रखेंगी सोनिया गांधी
- बिलॉन्गिंग अ जर्नी ऑफ लव की पहली झलक साझा की
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने इंस्टाग्राम पर पदार्पण करते हुए अपने आगामी संस्मरण बिलॉन्गिंग अ जर्नी ऑफ लव की पहली झलक साझा की। 544 पन्नों की यह आत्मकथा अल्फ ्रेड ए. नॉफ और हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा 10 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जाएगी। इसमें उनके व्यक्तिगत जीवन, राजीव गांधी से मुलाकात और जीवन की त्रासदियों का उल्लेख है। सोशल मीडिया पर पहली बार कदम रखते हुए, कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने गुरुवार को इंस्टाग्राम पर अपनी शुरुआत की।
उन्होंने इस प्लेटफॉर्म पर अपनी आने वाली संस्मरण पुस्तक, बिलॉन्गिंग अ जर्नी ऑफ लव की एक झलक के साथ खुद को पेश किया। सोनिया गांधी ने अपनी पहली पोस्ट में लिखा, नमस्ते सभी को, आप सबके साथ इस पल को साझा करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है, पेश है मेरी किताब बिलॉन्गिंग अ जर्नी ऑफ लव की पहली झलक। उन्होंने आगे लिखा कि यह प्यार, कर्तव्य, नुकसान और अपना स्थान खोजने की कहानी है। मुझे आप सभी के साथ इसे साझा करने का बेसब्री से इंतजार है। यह पोस्ट उस किताब की पहली झलक दिखाती है, जिसे 10 नवंबर, 2026 को रिलीज़ किया जाना है। 544 पन्नों की इस आत्मकथा को अल्फ्रेड ए. नॉफ द्वारा वैश्विक स्तर पर प्रकाशित किया जा रहा है, जबकि भारत में इसे हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा रिलीज़ किया जाएगा। बिलॉन्गिंग अ जर्नी ऑफ़ लव की शुरुआत 1965 में इंग्लैंड के कैम्ब्रिज से होती है, जब 19 साल की छात्रा सोनिया माइनो की मुलाकात राजीव गांधी से हुई।
अपनों को खोने के दुख ने ही मुझे राजनीति में धकेला
गांधी ने पहले भी अपने परिवार के बारे में लिखा है, लेकिन यह नया संस्मरण उनके जीवन और अनुभवों के एक अधिक व्यक्तिगत विवरण के रूप में पेश किया जा रहा है। नॉप्फ द्वारा जारी एक बयान में उन्होंने कहा कि उनके परिवार के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन बहुत कम ही ऐसे वृत्तांत हैं जिनमें परिवार के सदस्यों की प्रेरणाओं, कार्यों और मानवीय कमियों को सही ढंग से दर्शाया गया हो। उन्होंने कहा कि दिल टूटने और अपनों को खोने के दुख ने ही मुझे राजनीति की सार्वजनिक दुनिया में धकेल दिया। उससे पहले तक, मैंने अपनी निजता (प्राइवेसी) को बहुत सख्ती से बचाकर रखा था।

सीजेपी नेताओं ने मांगा और वक्त
- सौरव दास और आशुतोष रांका आज नहीं होंगे पेश क्राइम ब्रांच भेज सकती है नया समन
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सीजेपी नेता सौरव दास और आशुतोष रांका आज दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के सामने पूछताछ के लिए पेश नहीं होंगे, उन्होंने अधिक समय मांगा है। दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के सूत्रों के अनुसार, पुलिस उन्हें एक नया नोटिस जारी करने की उम्मीद है। जानकारी के लिए बात दें कि सीजेपी के दो प्रमुख नेता सौरव दास और आशुतोष रांका आज दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के समक्ष पूछताछ के लिए उपस्थित होने थे।
लेकिन उन्होंने दिल्ली पुलिस से इस मामले में पेश होने के लिए अधिक समय देने का अनुरोध किया है। बता दें कि दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने सीजेपी नेताओं सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे को जांच में शामिल होने के लिए आज तलब किया था। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक, तिहाड़ जेल से रिहा होने के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका को क्राइम ब्रांच ने नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए बुलाया।
केरलम में अवैध पटाखा निर्माण के दौरान धमाका, मां-बेटे झुलसे और मकान ढहा
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
पलक्कड। केरलम में पलक्कड के ओट्टापलम में अवैध रूप से पटाखे बनाने वाली इकाई में विस्फोट होने से 60 वर्षीय महिला समेत दो लोग घायल हो गए और उनका घर पूरी तरह नष्ट हो गया। यह इकाई उनके घर में ही संचालित हो रही थी।
घायलों की पहचान जानकी और उनके बेटे शाजेश (35) के रूप में हुई है। दोनों ओट्टापलम के मणिक्कपारा के निवासी हैं। पुलिस के अनुसार, दोनों अपनी आजीविका चलाने के लिए पटाखे बनाने और बेचने का काम करते थे।
सुप्रीम कोर्ट की केंद्र सरकार को करारी फटकार
- शीर्ष अदालत बोली- अदालतें दखल दे सकती हैं, हमारे हाथ बंधे नहीं हैं
- स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को लेकर दी नसीहत
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। देश में एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन के बीच अब सुप्रीम कोर्ट ने इशारों-इशारों में सरकार को नसीहत दे डाली है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संवैधानिक अदालतों के पास चुनावों में दखल देने की शक्ति है। अगर असंवैधानिक या गैर-कानूनी तरीकों की वजह से चुनावों की निष्पक्षता पर खतरा आता है, तो अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं। हालांकि, आम तौर पर चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक दखल सीमित ही रहता है।
दरअसल, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने आंध्र प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी, युवाजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी को अंतरिम राहत देते हुए यह टिप्पणी की। पार्टी ने आरोप लगाया कि हिंसा और बाधाओं के कारण, उनके लगभग दो-तिहाई उम्मीदवार शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए अपना नामांकन दाखिल नहीं कर सके। न्यायिक संयम का आधार यह है कि चुनाव प्राधिकरणों की स्वतंत्रता बनी रहे और चुनाव तय समय-सीमा के भीतर पूरे हों।
संवैधानिक ढांचे के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव बहुत जरूरी
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक ढांचे के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव बहुत जरूरी हैं, और उम्मीदवारों का नामांकन दाखिल कर पाना इस प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है। अदालत ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान का एक बुनियादी ढांचा हैं। नामांकन दाखिल करके ऐसे चुनावों में हिस्सा लेने का अधिकार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया का ही एक पहलू है। अदालत ने माना कि संविधान के तहत स्थानीय निकायों के चुनाव कराने और उनकी निगरानी करने की जिम्मेदारी स्श्वष्ट (राज्य चुनाव आयोग) की है।



