अविमुक्तेश्वरानंद विवाद पर सियासी पारा हाई, बाबा रामदेव के बयान से मचा हड़कंप!
भाजपा राज में इस कदर की अंधेर चल रही है जिसकी कोई सीमा नहीं है। सत्ता के नशे में भाजपाई इस कदर चूर हो चुके हैं कि वो किसी का भी अपमान कर रहे हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भाजपा राज में इस कदर की अंधेर चल रही है जिसकी कोई सीमा नहीं है। सत्ता के नशे में भाजपाई इस कदर चूर हो चुके हैं कि वो किसी का भी अपमान कर रहे हैं।
यही हाल है सूबे का जहां शंकराचार्य की सरेआम बेज्जती की जा रही है और सत्ता का सुख भोग रहे नेता ये सब बस देख रहे हैं। दरअसल माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या के मौके पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को रोके जाने और उनके समर्थकों के साथ धक्का-मुक्की की घटना अब चर्चा में बनी हुई है इसे लेकर विपक्ष और अन्य लोग भाजपा पर हमलावर हैं। प्रदेश की योगी सरकार और प्रसाशन की सह से ये सब हो रहा है।
अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने जानबूझकर उनका अपमान किया और उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाई। वे इतने नाराज हुए कि माघ मेला में ही धरने पर बैठ गए और विरोध जताने लगे। इस घटना ने पूरे सनातन समाज में हलचल मचा दी, क्योंकि एक तरफ शंकराचार्य जैसे बड़े संत थे, तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस की व्यवस्था।
इस विवाद पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य जैसे अन्य संतों ने भी टिप्पणी की और अविमुक्तेश्वरानंद पर कुछ आरोप लगाए, जैसे कि वे राजनीति में ज्यादा रुचि रखते हैं या कुछ पुराने मुद्दों पर उनका रुख अलग है। लेकिन इस पूरे मामले पर योग गुरु बाबा रामदेव ने अपनी राय दी, जो काफी चर्चा में आई। रामदेव ने कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे अपने संतों और योगियों को अपमानजनक शब्दों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी साधु के लिए ऐसी भाषा इस्तेमाल करना गलत है और शर्मनाक भी।
रामदेव ने शंकराचार्य को भगवान शंकर का जीवंत रूप बताया और कहा कि उनसे कोई विवाद नहीं होना चाहिए। वे बोले कि संतों को झगड़ों में नहीं पड़ना चाहिए, खासकर तीर्थ स्थलों पर जहां स्नान या पालकी जैसे मुद्दों पर बहस नहीं होनी चाहिए। रामदेव ने आगे कहा कि माघ मेला नाम जप, ध्यान और तपस्या के लिए है, न कि अहंकार दिखाने के लिए। एक सच्चा साधु अहंकार को खत्म करता है, न कि बढ़ाता है। इसी संदर्भ में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि कुछ लोग देश को इस्लामीकरण करना चाहते हैं, कुछ ईसाईकरण और कुछ गजवा-ए-हिंद जैसी सोच रखते हैं। सनातन धर्म के दुश्मन बाहर बहुत हैं, इसलिए कम से कम हम संतों को आपस में नहीं लड़ना चाहिए। उनका मतलब था कि हिंदू समाज को एकजुट रहना चाहिए, न कि छोटी-छोटी बातों पर बंटना।
वहीं इस मामले पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि ससम्मान स्नान होगा तभी वापसी होगी. शंकराचार्य ने सवाल उठाया कि अगर अखिलेश यादव फोन कर सकते हैं तो योगी आदित्यनाथ फोन क्यों नहीं करते और भाजपा नेताओं को पीड़ा क्यों नहीं हो रही, जबकि वे स्वयं को हिंदुओं का बड़ा हितैषी बताते हैं. उन्होंने कहा कि वे जो भी कहते हैं उसके पीछे कारण बताते हैं, लेकिन जब राजनेता धर्म की बात करते हैं तो वह स्वीकार्य होता है और जब शंकराचार्य बोलते हैं तो उसे गलत ठहराया जाता है. उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग माफी नहीं मांगेंगे, उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ेगा, क्योंकि वे स्वयं कुछ नहीं करेंगे, बल्कि कर्म का फल अपने आप भोगना पड़ता है.



