सरकार के दावों पर उठे सवाल, ‘अब नहीं आऊंगा दोस्त’ VIDEO रुला देगा

LPG संकट के बीच सूरत से अपने घर लौट रहे एक शख्स का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है... अब नहीं आऊंगा दोस्त... 

4पीएम न्यूज नेटवर्कः अब नहीं आऊंगा दोस्त, अब नहीं आऊंगा… रविवार की सुबह सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर एक ऐसा दृश्य देखने को मिला.. जो दिल को छू गया.. हजारों प्रवासी मजदूर, ज्यादातर उत्तर प्रदेश.. बिहार और ओडिशा से आए.. अपने सामान के साथ ट्रेन पकड़ने के लिए जुट गए थे.. स्टेशन पर लंबी-लंबी कतारें लगी हुई थी.. गर्मी, प्यास और थकान से लोग बेहाल थे.. जब उधना-हसनपुर ट्रेन के लिए यात्रियों को लाइन में खड़ा किया जा रहा था.. तभी कुछ लोगों ने लाइन तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश की.. स्थिति बेकाबू हो गई.. पुलिस और आरपीएफ के जवानों को भीड़ काबू में लाने के लिए हल्का बल प्रयोग करना पड़ा.. लाठीचार्ज होते ही अफरा-तफरी मच गई.. कई यात्री लोहे की बैरिकेडिंग.. और जालियों पर चढ़कर कूदते हुए भागने लगे.. वीडियो में दिख रहा था कि लोग एक-दूसरे को धक्का दे रहे थे.. और महिलाएं-बच्चे भी इस भीड़ में फंस गए थे..

इस भीड़ के बीच एक वीडियो खासतौर पर वायरल हो गया.. एक युवक, भीड़ में धकेला जा रहा था, बेहद थके और उदास स्वर में कह रहा था.. कि अब नहीं आऊंगा दोस्त, अब नहीं आऊंगा, बता देना.. उसकी आवाज में दर्द, बेबसी और निराशा साफ झलक रही थी.. वह सूरत छोड़कर घर लौट रहा था.. कई दिनों से गैस नहीं मिल रही थी.. खाना बनाना मुश्किल हो गया था.. फैक्ट्री में काम भी प्रभावित हो रहा था.. उस युवक की तरह हजारों मजदूर अब कह रहे हैं.. कि गैस संकट ठीक होने पर भी वे शायद वापस न आएं.. यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैला.. और लोगों के दिलों को झकझोर गया.. यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि पूरे संकट की कहानी है..

आपको बता दें कि यह संकट अचानक नहीं आया.. फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका.. और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू किए.. ईरान ने जवाब में दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, को प्रभावित कर दिया.. दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन इसी रास्ते से होता है.. भारत LPG का बड़ा आयातक देश है.. हम अपनी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत LPG विदेश से मंगाते हैं.. और उसमें से 90 प्रतिशत से ज्यादा सप्लाई मिडिल ईस्ट से.. मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आती है.. जंग शुरू होते ही जहाज रुक गए या रास्ता बदलना पड़ा.. सप्लाई चेन टूट गई..

घरेलू गैस सिलेंडर की किल्लत मार्च से ही गहराने लगी.. ब्लैक मार्केट में 14.2 किलो का सिलेंडर हजारों रुपये में बिकने लगा.. कुछ जगहों पर कीमत 4000 तक पहुंच गई.. सामान्य सब्सिडी वाली कीमत भी प्रभावित हुई.. सूरत इस संकट का सबसे बड़ा शिकार बना.. क्योंकि यहां की टेक्सटाइल इंडस्ट्री देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है.. सूरत को भारत की मैन-मेड फाइबर राजधानी कहा जाता है.. यहां लाखों प्रवासी मजदूर पावरलूम, प्रोसेसिंग यूनिट्स और छोटी-बड़ी फैक्टरियों में काम करते हैं..

इन मजदूरों की जिंदगी बहुत साधारण होती है.. वे सस्ते कमरों में रहते हैं.. और छोटे LPG सिलेंडर पर खाना बनाते हैं.. जब गैस की सप्लाई रुक गई.. तो रोजमर्रा का खाना बनाना मुश्किल हो गया.. कई मजदूरों ने बताया कि 15–20 दिन से गैस नहीं मिल रही.. एजेंसी पर लाइन लगाते तो स्टॉक खत्म बता दिया जाता है.. ब्लैक मार्केट में इतनी महंगी गैस कि रोज की कमाई का बड़ा हिस्सा सिर्फ खाना पकाने में चला जाता.. एक मजदूर रोहित पासवान ने कहा कि गैस की कमी से काम भी प्रभावित हो रहा है.. खाना नहीं बनता तो रहना कैसे संभव..

टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर असर और गहरा पड़ा.. उद्योग को रोजाना करीब 15 हजार गैस सिलेंडर की जरूरत होती है.. लेकिन सप्लाई सुस्त पड़ने से कई यूनिट्स ने उत्पादन कम कर दिया या कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया.. पहले यहां रोजाना 6.5 करोड़ मीटर कपड़ा तैयार होता था.. लेकिन संकट के चलते यह घटकर 4.5 करोड़ मीटर रह गया.. कई फैक्टरियां आधी क्षमता पर चल रही हैं.. मजदूरों की कमाई घट गई। नौकरी का भरोसा टूट गया..

मार्च के अंत तक करीब 3 लाख मजदूर, यानी उद्योग के करीब 30 प्रतिशत कामगार, सूरत छोड़ चुके थे.. अप्रैल में यह संख्या और बढ़ गई.. मजदूर कह रहे थे कि काम तो उपलब्ध है, लेकिन घर में खाना नहीं बनता तो यहां रहकर क्या करें.. कई ने फैसला कर लिया कि गैस ठीक होने पर भी वापस नहीं लौटेंगे.. इससे उद्योग में कामगारों की और कमी हो रही है.. 19 अप्रैल सुबह करीब 11 बजे उधना स्टेशन पर स्थिति बिगड़ गई.. यूपी और बिहार जाने वाली ट्रेनों के लिए स्पेशल ट्रेनें चलाई गई थीं.. लेकिन मांग बहुत ज्यादा थी.. 8000 से ज्यादा यात्री जमा हो गए.. कतारें स्टेशन के बाहर तक फैल गईं..

गर्मी 40 डिग्री से ऊपर थी.. पानी और छाया की कमी से कई लोग बेहोश हो गए.. जब ट्रेन आई तो लोग लाइन तोड़कर चढ़ने लगे.. पुलिस और आरपीएफ ने स्थिति नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज किया.. वीडियो में यात्री बैरिकेडिंग पार करते और जालियों पर चढ़ते दिखे.. कई लोग मामूली घायल हुए.. कुछ महिलाएं और बच्चे रोते हुए दिखे.. रेलवे अधिकारियों ने बताया कि दोपहर तक छह ट्रेनों से 21 हजार से ज्यादा यात्रियों को रवाना कर दिया गया.. फिर भी भीड़ कम नहीं हुई..

वेस्टर्न रेलवे के पीआरओ अनुभव सक्सेना ने कहा कि समर सीजन शुरू हो गया है.. इसलिए यात्री संख्या बढ़ी है.. हमने पूरी व्यवस्था की है.. पहली स्पेशल ट्रेन जयनगर के लिए सुबह 1:30 बजे रवाना हुई.. मधुबनी के लिए 5:30 बजे.. कुल 21 हजार से ज्यादा यात्री गए.. अतिरिक्त टिकट काउंटर खोले गए हैं.. और आरपीएफ के जवान तैनात हैं.. उन्होंने कहा कि स्थिति नियंत्रण में है.. लेकिन जब लोग लाइन तोड़ते हैं.. तो सख्ती करनी पड़ती है.. रेलवे ने अतिरिक्त ट्रेनें चलाईं.. लेकिन मैनेजमेंट की चुनौती बड़ी थी.. स्टेशन पर पानी, छाया.. और बुनियादी सुविधाओं की कमी भी दिखी..

वहीं यह भीड़ सिर्फ समर वेकेशन की वजह से नहीं थी.. पिछले दो-तीन महीनों से LPG संकट के चलते मजदूरों का पलायन लगातार जारी था.. छुट्टियां शुरू होते ही दोनों वजहें जुड़ गईं और यात्रियों की संख्या दोगुनी हो गई.. रेलवे अधिकारी मानते हैं कि LPG क्राइसिस ने स्टेशनों पर भीड़ बढ़ाई है.. कई मजदूर कह रहे थे कि फैक्टरियां बंद या कम क्षमता पर चल रही हैं, इसलिए घर लौट रहे हैं..

संकट सिर्फ सूरत तक सीमित नहीं है। पूरे देश में LPG की किल्लत है.. दिल्ली, मुंबई, नोएडा और अन्य शहरों में भी लाइनें लग रही हैं.. होटल, रेस्टोरेंट और छोटे उद्योग प्रभावित हैं.. सरकार ने घरेलू उपयोग को प्राथमिकता दी है.. इंडस्ट्री को गैस कम दी जा रही है.. पाइप्ड नैचुरल गैस को बढ़ावा दिया जा रहा है.. लेकिन अभी राहत नहीं मिल रही.. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि संकट 3–4 साल तक रह सकता है, अगर जंग लंबी चली तो..

मजदूरों की जिंदगी सबसे ज्यादा प्रभावित हुई.. वे सालों से सूरत में मेहनत करते आए हैं.. यहां अच्छी कमाई होती थी.. परिवार को गांव भेजते थे.. अब सब उलट गया.. एक महिला ने बताया कि 15 दिन से गैस नहीं मिल रही.. बच्चे को लेकर गांव जा रही हूं.. पति यहां रह गए.. कई परिवार बिखर गए.. गांव लौटने पर वहां काम नहीं मिलेगा, बेरोजगारी बढ़ेगी.. अर्थव्यवस्था को भी झटका लग रहा है.. सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री निर्यात में बड़ी भूमिका निभाती है.. मजदूरों की कमी से उत्पादन घटेगा तो ऑर्डर प्रभावित होंगे..

 

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