53 शहरों की डराने वाली तस्वीर, आखिर क्यों बढ़ रही हैं मौतें?
एनसीआरबी 2024 की रिपोर्ट बताती है कि भारत के बड़े शहरों में सड़क हादसे, आग, रेलवे दुर्घटनाएं और आत्महत्या तेजी से बढ़ती चिंता बन चुके हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: एनसीआरबी 2024 की रिपोर्ट बताती है कि भारत के बड़े शहरों में सड़क हादसे, आग, रेलवे दुर्घटनाएं और आत्महत्या तेजी से बढ़ती चिंता बन चुके हैं. देश के 53 बड़े शहरों में एक साल में 69 हजार से ज्यादा आकस्मिक मौतें होना एक बड़ा अर्बन क्राइसिस है.
22 जून को लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर वाली इमारत में लगी भीषण आग में 15 छात्रों की मौत ने भारत के शहरों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए. इस हादसे ने दिखाया कि बिल्डिंग नियमों का उल्लंघन और हादसे के बाद जागने वाली व्यवस्था आज भी बड़ी समस्या बनी हुई है. दूसरी ओर सरकार शहरों के तेजी से विकास और शहरीकरण को देश की तरक्की का रास्ता बता रही है, लेकिन जमीनी तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि देश के 53 बड़े शहरों में एक साल के भीतर 69,378 लोगों की आकस्मिक मौत हुई. इनमें सबसे ज्यादा जानें सड़क हादसों, आग, रेलवे दुर्घटनाओं और आत्महत्या के मामलों में गईं. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर भारत के शहरों में यह संकट क्यों बढ़ रहा है और रिपोर्ट इसके पीछे कौन-कौन सी वजहें बताती है.
शहरों में एक साल में 69 हजार से ज्यादा लोगों की मौत
एनसीआरबी की “एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2024” रिपोर्ट के अनुसार, देश के 53 ऐसे शहर, जिनकी आबादी 10 लाख या उससे ज्यादा है, वहां वर्ष 2024 में 69,378 लोगों की आकस्मिक मौत दर्ज की गई. रिपोर्ट के मुताबिक इन शहरों में प्रति एक लाख आबादी पर आकस्मिक मौत की दर 43.2 रही, जबकि पूरे देश का औसत 33.3 प्रति लाख है. यानी बड़े शहरों में दुर्घटनाओं से मौत का खतरा राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है. रिपोर्ट का कहना है कि तेजी से हो रहा शहरी विकास सुरक्षा के लिहाज से पर्याप्त नहीं है.
सड़क हादसे बने सबसे बड़ी वजह
रिपोर्ट के अनुसार, 53 बड़े शहरों में 73,426 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं. इनमें 63,519 लोग घायल हुए और 17,797 लोगों की मौत हो गई. कुल सड़क हादसों में करीब 40.3 प्रतिशत घटनाएं शहरी इलाकों में हुईं और इनमें से लगभग एक तिहाई हादसे रिहायशी इलाकों के आसपास हुए. दिल्ली में सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटना में मौतें दर्ज की गईं, जबकि जयपुर और बेंगलुरु इसके बाद रहे. रिपोर्ट के अनुसार, 52.8 प्रतिशत हादसों की वजह तेज रफ्तार रही, 30.1 प्रतिशत मामले लापरवाही से वाहन चलाने के थे और सिर्फ 2.6 प्रतिशत हादसे शराब पीकर ड्राइविंग से जुड़े पाए गए.
आग और रेल हादसों ने भी छीनी हजारों जिंदगियां
रिपोर्ट बताती है कि 2024 में देशभर में आग लगने की 5,971 घटनाओं में 5,888 लोगों की मौत हुई. इनमें 60 प्रतिशत से ज्यादा मौतें घरों और रिहायशी इमारतों में लगी आग से हुईं. रिपोर्ट के मुताबिक, अवैध निर्माण, खराब रखरखाव, फायर सेफ्टी की कमी और आपातकालीन रास्तों का बंद होना ऐसी घटनाओं की बड़ी वजह बनता है. वहीं रेलवे ट्रैक और रेलवे परिसरों में 25 हजार से ज्यादा दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 22 हजार से अधिक लोगों की जान चली गई. इनमें अधिकांश लोग ट्रेन से गिरने या ट्रैक पार करते समय ट्रेन की चपेट में आने से मारे गए.
शहरों में आत्महत्या के मामले भी चिंताजनक
एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार. 2024 में शहरों में आत्महत्या की दर 16.3 प्रति लाख आबादी रही, जबकि राष्ट्रीय औसत 12.2 प्रति लाख है. देशभर में दर्ज 1,70,746 आत्महत्याओं में से 26,150 मामले 53 बड़े शहरों से सामने आए. दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और मुंबई में कुल शहरी आत्महत्याओं का लगभग एक तिहाई हिस्सा दर्ज किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा आत्महत्या दैनिक मजदूरी करने वालों ने की. इसके बाद स्वरोजगार करने वाले, नौकरीपेशा लोग, बेरोजगार और छात्र शामिल रहे. रिपोर्ट इसे आर्थिक और सामाजिक दबाव से भी जोड़ती है.
गर्मी, ठंड और जलवायु संकट भी बन रहे खतरा
रिपोर्ट में “फोर्सेज ऑफ नेचर” कैटेगरी के तहत हीट स्ट्रोक, ठंड, बाढ़ और बिजली गिरने जैसी घटनाओं से 2024 में 917 मौतें दर्ज की गईं. रिपोर्ट यह भी बताती है कि हीट स्ट्रोक से होने वाली कई मौतें दर्ज ही नहीं हो पातीं और प्रदूषण से होने वाली मौतें भी इसमें शामिल नहीं हैं. रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु से जुड़े जोखिम केवल प्राकृतिक कारणों का नतीजा नहीं हैं, बल्कि शहरों की योजना, आवास, सार्वजनिक सुविधाओं और सामाजिक असमानता का भी बड़ा असर इन घटनाओं पर पड़ता है.
क्या है उपाय?
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शहरी विकास को केवल नई इमारतों, चौड़ी सड़कों और तेज यातायात तक सीमित नहीं रखा जा सकता. शोधकर्ताओं का मानना है कि शहरों में सुरक्षित सड़कें, मजबूत फायर सेफ्टी, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, पैदल यात्रियों के लिए सुविधाएं, सस्ती और सुरक्षित आवास व्यवस्था, जलवायु के अनुरूप योजना और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. रिपोर्ट यह भी कहती है कि अगर शहरों की योजना में लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी गई तो विकास के बावजूद ऐसे हादसे लगातार बढ़ते रहेंगे.



