AI समिट में मोदी का एक्शन देख सोशल मीडिया पर हो गई ट्रोलिंग, खास दोस्त ने भी कस दिया तंज

प्रधानमंत्री मोदी जी की आदत है कि मंच देखते ही उनको लंबे भाषण और लंबी - लंबी फेकने का मन करने लगता है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या हुआ जब विदेशी मेहमानों ने बंद कमरे में उड़ाया मोदी जी का मजाक? आखिर क्यों मोदी के पुराने दोस्त ने कसा तंज? क्या एआई समिट को चुनावी रैली समझ बैठे पीएम मोदी?

जब से राजधानी दिल्ली में एआई समिट का आयोजन हुआ है तभी, बीजेपी वालों की भद पिट रही है। उन्होंने सोचा था कि वो इसे पीएम मोदी की महान उपलब्धियों की लिस्ट में जोड़ देंगे लेकिन एआई समिट के नाम पर जो मजाक हुआ वो पूरी दुनिया ने देखा। ये इवेंट चर्चा में तो चल रहा है लेकिन सारे गलत कारणों के चलते। कभी महामानव वहां अचानक फोटो खिंचवाने पहुंच जाते हैं जिससे लोगों को भारी अव्यवस्था का सामना करना पड़ता है।

तो कभी कोई लंपट युनिवर्सिटी चाइना के माल को अपना माल बताकर इंटरनेशनल बेइज्जती करा देती है। तो वहीं अब इसके आखिरी दिन भी मोदी जी ने मंच पर विदेशी मेहमानों के सामने कुछ ऐसी हरकतें की, जिसके बाद उनके विदेशी मेहमान भी उनका मजाक उड़ाते हुए देखे गए। यही नहीं यूके पूर्व प्रधानमंत्री ने भी व्यवस्थाओं को लेकर ऐसा तंज कसा की मोदी जी के साथ उनकी फेवरेट सीएम रेखा गुप्ता जी को भी शर्म आ जाए।

प्रधानमंत्री मोदी जी की आदत है कि मंच देखते ही उनको लंबे भाषण और लंबी – लंबी फेकने का मन करने लगता है। 19 फरवरी को भारत मंडपम में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान भी मोदी जी ने अपने विदेशी मेहमानों के लामने भी कुछ ऐसा ही किया। इस मौके पर मोदी ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के लिए भारत के ‘मानव विजन’ का अनावरण किया।

लेकिन सवाल उठता है कि महामानव ने आखिर मानव विजन क्यों नाम दिया? तो इसके पीछे ऐसा लॉजिक दिया गया कि आप हंस हंस कर लोटपोट हो जाएंगे। M का मतलब Moral and Ethical Systems। सोचिये महामानव जी ऐसा विजन लाए जिसमें Moral और Ethical System सी बात हो रही है। इसके बाद A से Accountable Governance। मोदी जी आप Accountability की बात तो न ही करिए। इसके बाद N से National Sovereignty। मतलब अपना डेटा अपने देश में रहो। फिर A से Accessible and Inclusive और V से Valid and Legitimate। मतलब एक Alphabet के बाद एक दो शब्द और जोड़ दिया और विजन का नाम रख दिया मानव। मतलब एआई जैसा ईवेंट और तुकबंदी चुनावी रैली जैसी।

तो आपने देखा कि कैसे महामानव ने मानव विजन को लेकर कैसी बड़ी बड़ी बातें की। लेकिन इस शो की हाइलाइट बनी ये तस्वीर जब मोदी जी दुनिया के बड़े बड़े लीडर्स और बड़ी बड़ी कंपनियों के फाउंडर्स के साथ ऐसे हाथ उठाकर पोज करने लगे जैसे ये कोई एआई समिट नहीं बलकि एनडीए की रैली हो। आप देखिए कि जैसे ही मोदी जी इनके हाथ पकड़ कर खडे़ किये तो ये लोग कितने असहज हो गए और चौंक कर एक दूसरे की शक्ल देखने लगे और मन ही मन हंसने लगे। लेकिन सबसे ज्यादा किसी पर लोगों का ध्यान गया तो मोदी जी के लेफ्ट साइड खड़े इस इंसान पर गया।

देखिए जैसे ही मोदी जी हाथ उठाने वाला पोज किया ये शख्स कंफ्यूज हो गया और उसने अपना दूसरा हाथ उठाया तो लेकिन अपने बगल वाले का हाथ पकड़ा ही नहीं। क्योंकि इसक  पीछे एक बड़ी वजह थी। दरअसल मोदी जी के बगल में खड़ा ये शख्स कोई और नहीं बल्कि ओपन AI के CEO सैम अल्टमैन थे और इनके ठीक बगल में खड़े थे एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोदेई। अब देखिए चक्कर ये हुए कि ये दोनों एआई कंपनियां एक दूसरे सी घोर प्रतिद्वंद्वी हैं। दोनों कंपनियों के बीच एआई बाज़ार में ज़बरदस्त मुकाबला है। इन दोनों के बीच प्रतिद्वंद्विता इस साल तब और बढ़ गई जब एंथ्रोपिक ने सुपर बाउल के दौरान आक्रामक विज्ञापन चलाए थे। इसलिए जब बाकि के लीडर्स ने एकजुटता दिखाने के लिए हाथ जोड़े, तब ऑल्टमैन और डारियो अमोदेई ने थोड़ी देर हिचकिचाने के बाद मुट्ठियां ऊपर कीं।

यह ‘स्नब’ जैसा लगा और सोशल मीडिया पर मजाक का विषय बन गया। अब इसके बाद ओपन AI के CEO सैम अल्टमैन  ने अपने इस अनुभव के बारे में बात करते हुए कहा कि जब मैं मंच पर था, तो उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। उसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मैं सोचने लगा कि आगे क्या करना है। वो ये कहते हैं और इसी के बाद वहां मौजूद लोग हंसने लगते हैं।

सोशल मीडिया पर जहां इस वीडियो सामने आने के बाद लोग पूछ रहे हैं आखिर मोदी जी को क्या जरूरत थी इन लीडर्स के साथ ऐसा पोज मारने की। क्या सिर्फ खड़े खड़े फोटो खिंचवाने से काम नहीं चल रहा था। क्या ये एनडीए  की कोई रैली जहां ऐसी एकजुटता दिखानी जरूरी थी। अब देखिए एक तरफ जहां ये तस्वीर खिचाई गई तो दूसरी तरफ मोदी के बड़े खास दोस्त और यूके के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सूनक ने व्यवस्थाओं को लेकर राजधानी दिल्ली का मजाक उड़ा दिया। अब देखिए मोदी सरकार बड़े हो हल्ले से जहां दिल्ली में एआई समिट करा रही है लेकिन इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा एआई को लेकर नहीं बल्कि दिल्ली के ट्रैफिक को लेकर हो रही है  पिछले तीन चार दिनों से दिल्ली के लोग ट्रैफिक में फसे हुए हैं।

वैसे एआई समिट का आयोजन तो भारत मंडपम में हो रहा है लेकिन इसके चलते पूरे दिल्ली भारी ट्रैफिक है। वीआईपी मूवमेंट के चलते दिल्ली का आम नागरिक सुबह से लेकर शाम तक अपनी गाड़ी में कैद हो कर शहर की सड़कों पर रेंग रहा हैं। हालत ये हो गई है कि  यूके पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सूनक तक को ये कहना पड़ गया कि ‘एआई बहुत कुछ कर सकता है। लेकिन यह अभी दिल्ली के ट्रैफिक को ठीक नहीं कर सकता है।’ सुनक अपने सत्र में कुछ देरी से पहुंचे। उन्होंने पहुंचते ही माफी मांगी और तंज कसा, एआई बहुत कुछ कर सकता है, जैसा कि हमने इस हफ्ते देखा, लेकिन यह अभी दिल्ली के ट्रैफिक को नहीं सुधार सकता’

तो कुल मिलाकर सवाल वही है — क्या ये सच में एआई समिट था या फिर कैमरों के सामने छवि चमकाने का एक और भव्य आयोजन? जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की गंभीर बहस कर रही है, तब यहां मंच पर अल्फाबेट जोड़कर “मानव विज़न” गढ़ा जा रहा था। जब वैश्विक कंपनियों के सीईओ तकनीक, सुरक्षा, डेटा और भविष्य की बात करने आए थे, तब फोटो-ऑप्स को प्राथमिकता दी जा रही थी। और जब आम लोग उम्मीद कर रहे थे कि भारत तकनीक की दिशा तय करेगा, तब चर्चा दिल्ली के ट्रैफिक और अव्यवस्था पर अटक गई। मंच पर जब जबरन एकजुटता का दृश्य रचा गया, तो वह स्वाभाविक नहीं बल्कि बनावटी लगा।

वैश्विक प्रतिस्पर्धियों को हाथ पकड़ाकर खड़ा करना कूटनीति नहीं, बल्कि इवेंट मैनेजमेंट की जल्दबाज़ी जैसा प्रतीत हुआ। ऊपर से विदेशी मेहमानों की हिचकिचाहट और बाद में हल्के-फुल्के मज़ाक ने उस गंभीरता को और हल्का कर दिया, जो ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर होनी चाहिए थी। और जब पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने ट्रैफिक पर तंज कसा, तो वह सिर्फ एक मज़ाक नहीं था बल्कि वह व्यवस्थाओं पर टिप्पणी थी। तकनीक का नेतृत्व भाषणों से नहीं, भरोसे से बनता है। विज़न शब्दों से नहीं, व्यवस्थाओं से साबित होता है। अगर एआई समिट का अंत विदेशी मेहमानों की असहज मुस्कान, सोशल मीडिया के व्यंग्य और ट्रैफिक जाम की चर्चा के साथ हो, तो आत्ममंथन ज़रूरी हो जाता है। सवाल किसी व्यक्ति का नहीं, देश की साख का है। क्या हम सच में एआई की महाशक्ति बनना चाहते हैं, या फिर हमार प्यारे मोदी जी हर बड़े आयोजन को चुनावी मंच की तरह इस्तेमाल करते रहेंगे?

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