आर्थिक लॉकडाउन के संकेत!

  • डीजल के दाम बढ़े तो निश्चित थाली कांपेगी
  • देश के दरवाजे पर खड़ा आर्थिक प्रलय कैसे बचेगा आम आदमी?
  • राहुल गांधी का वार पीएम मोदी के बस का नहीं देश चलाना
  • अमीर संभल जाएगा गरीब कहां जाएगा
  • ईएमआई, फीस, सिसकती गृहणियां मध्यम वर्ग की खामोश चीख

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। देश के राजनीतिक गलियारों में दिए गए भाषण कभी-कभी आने वाली तबाही की दस्तक भी होते हैं। और इस बार जो संकेत मिले हैं उन्होंने लाखों परिवारों की नींद उड़ा दी है। प्रधानमंत्री के हालिया संबोधन के बाद देश के भीतर एक बेचैनी गहराती दिखाई दे रही है। जनता के मन में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत अब महंगाई के दूसरे और कहीं अधिक खतरनाक दौर में प्रवेश करने जा रहा है? क्या युद्ध, वैश्विक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और घरेलू आर्थिक दबाव मिलकर आम आदमी की कमर तोडऩे वाले हैं?
इन सवालों का जवाब आसान नहीं है लेकिन जमीन पर जो संकेत दिखाई दे रहे हैं वह निश्चित तौर पर चिंता पैदा करने वाले हैं। तेल कंपनियों पर बढ़ता दबाव गैस सिलेंडर की कीमतों में तेज वृद्धि डीजल और पेट्रोल की कीमतों पर संभावित दबाव और इसके बाद रोजमर्रा की हर वस्तु के महंगे होने का डर यह सिर्फ अर्थशास्त्र का विषय नहीं है बल्कि करोड़ों परिवारों के अस्तित्व का सवाल बनता जा रहा है। विधानसभा चुनावी नतीजों के बाद पीएम मोदी ने आर्थिक सुनामी की आहट को परिभाषित कर दिया है। जैसा की आंशका जताई जा रही थी और एक्सपर्ट का मानना था कि जनता जनार्दन चुनावी नतीजों तक युद्ध के असर से बची हैं।

भाजपा सरकार ही देश के लिए सबसे बड़ा संकट : अखिलेश

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पेट्रोल, डीजल और गैस का कम इस्तेमाल करने की अपील पर तंज कसते हुए भाजपा सरकार को देश के लिए सबसे बड़ा संकट बताया। उन्होंने कहा कि चुनाव खत्म होते ही सरकार को आर्थिक हालात और पाबंदियों की याद आ गई, जबकि चुनाव के दौरान भाजपा नेताओं ने जमकर संसाधनों का इस्तेमाल किया। सपा प्रमुख ने महंगाई, गिरते रुपये, बेरोजगारी और विदेश नीति को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है और जनता अब इसका जवाब देने के लिए तैयार है। पूर्व सीएम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है कि चुनाव खत्म होते ही पीएम मोदी को संकट याद आ गया। दरअसल देश के लिए संकट सिर्फ एक है और उसका नाम है भाजपा। इतनी सारी पाबंदियां लगानी पड़ीं तो ‘पांच ट्रिलियन डॉलर की जुमलाई अर्थव्यवस्था कैसे बनेगी? लगता है भाजपा सरकार के हाथ से लगाम पूरी तरह छूट गई है। डॉलर आसमान छू रहा है और देश का रुपया पातालोन्मुखी हो गया है। सोना न खरीदने की अपील जनता से नहीं भाजपाइयों को अपने भ्रष्ट लोगों से करनी चाहिए क्योंकि जनता तो वैसे भी 1.5 लाख तोले का सोना नहीं खरीद पा रही है। भाजपाई ही अपनी काली कमाई का स्वर्णीकरण करने में लगे हैं। हमारी बात गलत लग रही हो तो लखनऊ से लेकर कटक तक पता कर लीजिए या अहमदाबाद से लेकर गुवाहाटी तक। वैसे सारी पाबंदियां चुनाव के बाद ही क्यों याद आईं है? भाजपाइयों ने चुनाव में जो हजारों चार्टर हवाई यात्राएं करीं वो क्या पानी से उड़ रहीं थीं? वो क्या होटलों में नहीं ठहर रहे थे या सिलेंडर की फोटो लगाकर खाना बनाकर खा रहे थे?

महंगाई कभी अकेली नहीं आती… वह अपने साथ भूख, डर और गुस्सा भी लाती है

सबसे बड़ा संकट यह है कि महंगाई कभी अकेले नहीं आती। वह अपने साथ बेरोजगारी, सामाजिक तनाव, घरेलू कलह और मानसिक दबाव भी लेकर आती है। जब रसोई का बजट बिगड़ता है तो सिर्फ थाली छोटी नहीं होती, रिश्तों में भी दरारें आने लगती हैं। भारत जैसे देश में ईंधन केवल गाडिय़ों को चलाने वाला साधन नहीं है। यह पूरी अर्थव्यवस्था की नसों में दौडऩे वाला रक्त है। ट्रक का डीजल महंगा होगा तो खेत से मंडी तक सब्जी महंगी पहुंचेगी। मालगाड़ी का खर्च बढ़ेगा तो फैक्ट्री से दुकान तक सामान महंगा पहुंचेगा। बिजली उत्पादन महंगा होगा तो उद्योगों की लागत बढ़ेगी। और अंतत: इसका बोझ उस आम आदमी की जेब पर पड़ेगा जिसकी आय वर्षों से लगभग स्थिर है। भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में कई झटकों से गुजरी है। महामारी ने करोड़ों लोगों की बचत खत्म कर दी। छोटे व्यापार टूट गए। मध्यम वर्ग ने अपनी जमा पूंजी खर्च कर दी। उसके बाद वैश्विक युद्धों और कच्चे तेल की अस्थिर कीमतों ने बाजार को झकझोर दिया। ऐसे समय में अगर ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में एक और बड़ी वृद्धि होती है तो उसका असर केवल आर्थिक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक भी होगा।

अब चूल्हा डराने लगे

महंगाई का सबसे गहरा और सबसे शांत संघर्ष भारतीय घरों की रसोई में लड़ा जाता है। यहां कोई टीवी कैमरा नहीं होता कोई राजनीतिक भाषण नहीं होता लेकिन हर दिन एक अदृश्य युद्ध चलता है सीमित पैसे में पूरे परिवार को संभालने का युद्ध। भारतीय गृहिणी वर्षों से घर की अर्थव्यवस्था की सबसे मजबूत प्रबंधक रही है। वह जानती है कि महीने का राशन कैसे चलाना है बच्चों की जरूरतों को कैसे संतुलित करना है और कम आय में भी घर को कैसे टिकाए रखना है। लेकिन जब हर महीने दाल, तेल, गैस, दूध और सब्जियों के दाम बढ़ते हैं, तब यह संतुलन टूटने लगता है। गृहिणियां अक्सर अपने हिस्से की जरूरतें सबसे पहले कम करती हैं। कई घरों में महिलाएं अपने लिए कपड़े खरीदना टाल देती हैं फल-दूध कम कर देती हैं या छोटी इच्छाओं को दबा देती हैं ताकि परिवार पर बोझ न बढ़े। महंगाई केवल बाजार में कीमत नहीं बढ़ाती, वह महिलाओं के त्याग को भी बढ़ा देती है। सबसे ज्यादा असर बच्चों वाले परिवारों पर पड़ता है। स्कूल फीस, ट्यूशन, दूध, पोषण और स्वास्थ्य खर्च — हर तरफ बढ़ती लागत गृहिणियों के लिए तनाव का कारण बनती है। मध्यम वर्गीय परिवारों में यह दबाव और अधिक दिखाई देता है, जहां आय सीमित है लेकिन सामाजिक अपेक्षाएं बड़ी हैं।

आर्थिक अनिश्तिताओं के दौर में लोगों से जिम्मेदारी निभाने का आह्वान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने देशवासियों से वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के दौर में जिम्मेदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया आर्थिक उथल पुथल सप्लाई चेन में व्यवधान और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से जूझ रही है जिसका असर बढ़ती महंगाई के रूप में सामने आ रहा है। ऐसे समय में भारत को मजबूत बनाए रखने के लिए सामूहिक भागीदारी बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री ने देशभक्ति की परिभाषा को व्यापक बताते हुए कहा कि यह केवल देश के लिए बलिदान देने तक सीमित नहीं है बल्कि कठिन समय में अनुशासित और जिम्मेदार जीवन जीना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे अपनी दैनिक आदतों में बदलाव लाकर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दें। उन्होंने लोगों से एक साल तक गैर-जरूरी सोने की खरीदारी से बचने का आग्रह किया ताकि विदेशी मुद्रा के अनावश्यक खर्च को रोका जा सके। साथ ही उन्होंने पेट्रोल और डीजल के संयमित उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि तेल की बचत से देश की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिलेगी। पीएम मोदी ने ईंधन की खपत कम करने के लिए कई सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि जहां संभव हो वहां मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें। निजी वाहनों के इस्तेमाल के दौरान कार पूलिंग अपनाएं। माल ढुलाई के लिए रेल परिवहन को प्राथमिकता दें और इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा दें। गौरतलब है कि हैदराबाद में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा था कि आज दुनिया आर्थिक उथल-पुथल, सप्लाई चेन में व्यवधान और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से जूझ रही है, जिसका असर बढ़ती महंगाई के रूप में सामने आ रहा है। ऐसे समय में भारत को मजबूत बनाए रखने के लिए सामूहिक भागीदारी बेहद जरूरी है।

पीएम मोदी की बस की बात नहीं रहा देश चलाना : राहुल गांधी

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि पीएम मोदी ने 10 मई को जनता से त्याग मांगे। सोना मत खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो। ये उपदेश नहीं-ये नाकामी के सबूत हैं। 12 साल में देश को इस मुकाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है-क्या खरीदे, क्या न खरीदे, कहां जाए, कहां न जाए। हर बार जिम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि खुद जवाबदेही से बच निकलें। देश चलाना अब पीएम मोदी के बस की बात नहीं।

घरों के भीतर शुरू हो चुका है खामोश युद्ध

शहरों में रहने वाला मध्यम वर्ग पहले ही ईएमआई, स्कूल फीस, बिजली बिल और स्वास्थ्य खर्चों के बीच पिस रहा है। गांवों में किसान खेती की बढ़ती लागत से परेशान है। मजदूर वर्ग रोज की कमाई और रोज के खर्च के बीच फंसा हुआ है। गृहिणियां हर महीने रसोई के बजट को बचाने के लिए गणित लगाती हैं। लेकिन जब हर तरफ कीमतें बढ़ती हैं तब गणित भी हार मान जाता है। सबसे भयावह स्थिति तब बनती है जब आय नहीं बढ़ती लेकिन खर्च लगातार बढ़ते जाते हैं। यही वह स्थिति है जिसे अर्थशास्त्री साइलेंट इमरजेंसी कहते हैं। इसमें कोई सायरन नहीं बजता कोई आधिकारिक घोषणा नहीं होती लेकिन धीरे-धीरे समाज के भीतर तनाव, अविश्वास और आक्रोश जमा होने लगता है। सरकारों के सामने भी अपनी मजबूरियां होती हैं। वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें, युद्ध की परिस्थितियां, डॉलर की मजबूती, आयात लागत यह सब ऐसे कारक हैं जिन्हें कोई भी देश पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। लेकिन जनता इन जटिल आर्थिक समीकरणों को नहीं देखती। जनता सिर्फ इतना देखती है कि उसकी थाली छोटी हो रही है।

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