SIR, ED रेड कराकर भी ममता से हारे मोदी, सर्वे में सामने आई बीजेपी की असलियत
बंगाल जीतने के लिए मोदी शाह ने क्या कुछ नहीं कराया। एसआईआर कराकर ज्ञानेश कुमार को वोट चोरी करने के लिए भेज दिया। ममता को घेरने के लिए ईडी की रेड करवाई, पूरे देश में घुसपैठियों का मामला उछाला लेकिन लगता है कि ये सब ममता को हराने के लिए अब भी काफी नहीं रहा है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या सारे जतन करने के बाद भी ममता दीदी से हार गए मोदी जी? क्या चुनाव से पहले ही बीजेपी का बंगाल जीतने का सपना चकनाचूर हो गया है? क्या एसआई आर कराकर भी हार रही है बीजेपी? ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि अभी हाल ही में गोदी मीडिया ने एक सर्वे कराया है जिसके नतीजों ने बीजेपी की सारी प्लानिंग पर पानी फेर दिया है।
बंगाल जीतने के लिए मोदी शाह ने क्या कुछ नहीं कराया। एसआईआर कराकर ज्ञानेश कुमार को वोट चोरी करने के लिए भेज दिया। ममता को घेरने के लिए ईडी की रेड करवाई, पूरे देश में घुसपैठियों का मामला उछाला लेकिन लगता है कि ये सब ममता को हराने के लिए अब भी काफी नहीं रहा है। क्योंकि जो हाल ही में इंडिया टुडे और सीवोटर द्वारा जो ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे किया गया है, कम से कम उससे तो यही पता चलता है। अभी कुछ दिनों पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव जब ममता बनर्जी से मिलने पश्चिम बंगाल पहुंचे थे तब उन्होंने ममता बनर्जी से मिलने के बाद एक बात कही थी कि “पूरे देश अगर कोई भाजपा से कोई मुकाबला कर रहा है तो वो केवल ममता बनर्जी ही हैं।”
अखिलेश यादव की ये बात अब 100 प्रतिशत सच साबित हो रही है। ममता बनर्जी पर दबाव बनाने के लिए मोदी-शाह ने क्या कुछ नहीं किया। पहले एसआईआर कराकर ममता बनर्जी के वोट बैंक को काटने की कोशिश की लेकिन एसआईआर के खिलाफ ममता बनर्जी सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गईं और उन्होंने हर लड़ाई को जीता भी। एसआईआर का फार्मूला फेल होता देेख जब मोदी शाह ने टीएमसी का कामकाज देखने वाली कंपनी I-PAC पर छापा पड़वाया तब ममता बनर्जी खुद वहां पहुंच गई और जिसके बाद ईडी ने भी ममती के सामने अपने घुटने टेक दिए। इन्हीं सबका नतीजा रहा कि जब इंडिया टुडे और सीवोटर द्वारा ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे किया गया तो सामने आ गया कि ममता से मुकाबला मोदी शाह के लिए उतना आसान नहीं होने वाला है। अब आते हैं कि ये सर्वे क्या कहते हैं।
इंडिया टुडे और सीवोटर द्वारा किए गए ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे के मुताबिक, अगर आज लोकसभा चुनाव कराए जाएं तो पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस यानि ममता बनर्जी की पार्टी राज्य की 42 सीटों में से 28 सीटें जीत सकती है, जबकि बीजेपी को 14 सीटें ही मिलेंगी। यह आंकड़ा 2024 के लोकसभा चुनाव में आए नतीजों के काफी नज़दीक है। यानी टीएमसी और ममता बनर्जी अपनी मजबूत स्थिति बरकरार रखने में सफल दिख रही हैं। हालांकि बढ़त और अंतर मामूली है बताए जा रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में भी 42 सीटों में 29 सीटें ममता बनर्जी की पार्टी ने जीती थी जबकि 12 सीटें भाजपा के खाते में जा पाईं थीं और एक सीट कांग्रेस के खाते में। ये सर्व बताते हाैं कि तब से लेकर अब तक भीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल में ज्यादा कुछ बदलाव नहीं आए हैं। इस सर्वे में बीजेपी को मामूली बढ़त मिली है।
पार्टी की सीटें 2024 के मुकाबले 12 से बढ़कर 14 तक पहुंच सकती हैं। हालांकि अगस्त 2025 के पिछले सर्वे में बीजेपी को सिर्फ 11 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था, जो अब सुधार के साथ 14 हो गया है। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का वोट शेयर भी 39 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, यानी बस तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी। लेकिन यहां गौर करने वाली बात है कि ये उस गोदी मीडिया के सर्वे हैं जिसमें बीजेपी की हमेशा बंपर जीत दर्ज होती है और मोदी जी सदैव ही सबसे लोकप्रिय नेता बने रहते हैं। ये वही सर्वे हैं जिन्होंने मोदी जी को 2024 के सर्वों में 400 पार करवा दिया था लेकिन जब असल नतीजे सामने आए तो क्या हुआ वो हम सब जानते हैं। जब ये उन्हीं सर्वों के नतीजे बा रहे हैं कि पश्चिम बंगाल जीतने का मोदी शाह का सपना चकनाचूर हो सकता है तो सोचिए ग्राउंड पर असलियत क्या होगी।
यह सर्वे पिछले आठ हफ्तों में 1.25 लाख से अधिक जवाब देने वालों पर आधारित है और यह चुनाव के संभावित रुझान को बताता है। सर्वे में पश्चिम बंगाल को तेजी से द्विध्रुवीय मुकाबले वाला राज्य बताया गया है, जहां टीएमसी और भाजपा के बीच सीधी टक्कर हो रही है। जबकि सीपीएम और कांग्रेस बहुत पीछे रह गए हैं। अगर इसको जल्द होने वाले विधानसभा चुनाव के नज़रिए से देखा जाए तो टीएमसी बेहतर स्थिति में लग रही है। हालांकि बीजेपी ने मामूली बढ़त हासिल की है। सीवोटर के डायरेक्टर यशवंत देशमुख का कहना है कि “पश्चिम बंगाल तेजी से द्विध्रुवीय मुकाबले में बदल रहा है और यहां ध्रुवीकरण और भी तेज हो रहा है।” हालांकि, सर्वे से साफ है कि बीजेपी को टीएमसी के गढ़ में कोई बड़ा सेंध लगाने में सफलता नहीं मिल रही है।
टीएमसी अपनी अधिकांश 2024 वाली सीटें बरकरार रख सकती है। अब देखिए यह सर्वे ऐसे समय में आया है जब राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। पश्चिम बंगाल जीतने के लिए बीजेपी साम दाम दंड भेद सब कर रही है। मोदी जी बांगला तक बोलने लगे हैं लेकिन अब भी इतन काफी नहीं लगा रहा है। इससे पहले के सर्वे में भी टीएमसी की बढ़त दिखती रही है, लेकिन इस बार मामूली बदलाव देखा गया है।
अब देखिए बंगाल में तो मोदी ममता से पिछड़ते दिखाई दे रहे हैं लेकिन क्या राष्ट्रीय स्तर पर भी उतना ही मजबूत है मोदी मैजिक, जितना टीवी स्टूडियो में दिखाया जाता है? या राहुल गांधी एक वास्तविक चुनौती बनते जा रहे हैं? अब देखिए इंडिया टुडे–सीवोटर के जनवरी 2026 के ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे के नतीजों से जो तस्वीर बनती है, वो बीजेपी के लिए सुकून भी है और हल्की बेचैनी भी। एक तरफ सर्वे कहता है कि अगर आज लोकसभा चुनाव हों तो एनडीए को 350 से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। यानी सत्ता की कुर्सी अभी भी मोदी के इर्द-गिर्द ही घूमती दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 55 फीसदी लोगों ने अगला पीएम बनने के लिए सबसे पसंदीदा नेता बताया है। ये आंकड़ा अगस्त 2024 के 49% और अगस्त 2025 के 52% से भी ऊपर है। मतलब मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता में गिरावट नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बढ़त दिख रही है। लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।
यही सर्वे बताता है कि राहुल गांधी अब पहले वाले राहुल नहीं रहे। उन्हें 27 फीसदी लोगों ने पीएम के तौर पर पसंद किया है। याद कीजिए, जनवरी 2022 में ये आंकड़ा सिर्फ 7 फीसदी था। यानी चार साल में लगभग चार गुना उछाल। अगस्त 2025 में 25% था, अब 27% हो गया। साफ है कि राहुल गांधी अब राष्ट्रीय राजनीति में “सीरियस प्लेयर” बनते जा रहे हैं। फिर भी सवाल यही है कि क्या सिर्फ चेहरा मजबूत होने से चुनाव जीते जाते हैं? सर्वे साफ संकेत देता है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसका संगठन और गठबंधन मैनेजमेंट है।
राहुल की व्यक्तिगत लोकप्रियता बढ़ी है, लेकिन पार्टी उस ऊर्जा को सीटों में बदल पाने की स्थिति में अभी नहीं दिख रही। लेकिन बंगाल की बात करें तो वहां तस्वीर अलग है। राष्ट्रीय स्तर पर भले एनडीए 350 पार दिख रहा हो, लेकिन पश्चिम बंगाल में टीएमसी की प्रासंगिकता बरकरार बताई जा रही है। यानी ममता बनर्जी का किला अब भी पूरी तरह नहीं टूटा है। बीजेपी को वहां बड़ा उलटफेर करना आसान नहीं लग रहा है। यही वो राज्य है जहां मोदी लहर के बावजूद क्षेत्रीय नेतृत्व भारी पड़ता दिख रहा है। मतलब अखिलेश यादव की बात सौ प्रतिशत सही है कि “पूरे देश अगर कोई भाजपा से कोई मुकाबला कर रहा है तो वो केवल ममता बनर्जी ही हैं।”
तो कुल मिलाकर तस्वीर साफ है कि टीवी स्टूडियो की बहसों और जमीनी सियासत की हकीकत में फर्क है। कागज़ पर रणनीतियां भले बहुत बड़ी दिखें, लेकिन बंगाल की राजनीति बार-बार यही साबित करती है कि यहां दिल्ली मॉडल नहीं, दीदी मॉडल चलता है। सर्वे के आंकड़े भले बीजेपी को मामूली बढ़त दिखा रहे हों, लेकिन वो लहर नहीं दिख रही जिसकी उम्मीद अमित शाह जैसे चाणक्य जी करते हैं। टीएमसी अपनी जमीन बचाए हुए है और ममता बनर्जी अब भी उस नेता के तौर पर खड़ी हैं जो सीधे मोदी को चुनौती देती नज़र आती हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय राजनीति में मोदी की लोकप्रियता कायम बताया जा रहा है, एनडीए को मजबूत दिखाया जा रहा है, लेकिन गोदी मीडिया भी विपक्ष को नजरअंदाज नहीं कर पा रहा है। राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ना बताता है कि लड़ाई एकतरफा नहीं रहने वाली।
बीजेपी के लिए असली चुनौती यही है कि क्या वो वोट प्रतिशत को सीटों की निर्णायक बढ़त में बदल पाएगी? क्योंकि सर्वे बता रहे हैं कि शोर ज्यादा है, लेकिन सेंध उतनी गहरी नहीं लग पा रही। और अगर ये ट्रेंड चुनाव तक कायम रहता है, तो साफ है कि बंगाल में लड़ाई अभी भी ममता बनर्जी की शर्तों पर लड़ी जाएगी, न कि दिल्ली की रणनीति पर। राजनीति में आखिरी फैसला जनता करती है, लेकिन फिलहाल संकेत यही हैं कि मिशन बंगाल अब भी बीजेपी के लिए आसान नहीं, बल्कि सबसे कठिन किले की जंग बना हुआ है।



