दिल्ली में रजिस्ट्री नियमों की सख्ती, टैक्स बचाने के रास्ते मुश्किल
विभाग ने यह भी कहा कि संबंधित लोगों को दस्तावेज को संशोधित और ठीक करने का अवसर दिया जाएगा, ताकि सर्कल रेट के अनुसार संपत्ति का सही मूल्यांकन दिखाया जा सके और यदि कोई स्टाम्प ड्यूटी कम पड़ रही हो, तो उसका भुगतान किया जा सके.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: विभाग ने यह भी कहा कि संबंधित लोगों को दस्तावेज को संशोधित और ठीक करने का अवसर दिया जाएगा, ताकि सर्कल रेट के अनुसार संपत्ति का सही मूल्यांकन दिखाया जा सके और यदि कोई स्टाम्प ड्यूटी कम पड़ रही हो, तो उसका भुगतान किया जा सके.
देश के कई अन्य जगहों की तरह दिल्ली में भी अधिकतर संपत्तियों की कीमतें करके बताई जाती हैं ताकि कम स्टाम्प ड्यूटी लगे, लेकिन राजधानी में सरकार ने इन कोशिशों पर नकेल कसने की शुरुआत कर दी है. अधिकारियों ने बताया कि प्रॉपर्टी के कम मूल्यांकन को रोकने और यह पक्का करने के लिए कि सरकार को सही मात्रा में स्टाम्प ड्यूटी मिले, राजस्व विभाग ने सभी सब-रजिस्ट्रार्स और जाइंट सब-रजिस्ट्रार्स को निर्देश दिया है कि वे प्रॉपर्टी के रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया की बारीकी से जांच करें.
अगर किसी की घोषित प्रॉपर्टी की कीमत सर्कल रेट से कम बताई गई है, तो कम पड़ी रकम वसूलने के लिए भी कार्रवाई की जाए. खासकर उन मामलों में जहां रिहायशी इलाकों में बेसमेंट भी शामिल हैं.
सर्कल रेट वह न्यूनतम कीमत होती है जिसे राज्य सरकार तय करती है, और इससे कम कीमत पर कोई प्रॉपर्टी खरीदी या बेची नहीं जा सकती. जबकि स्टाम्प ड्यूटी संपत्ति को रजिस्टर करने के लिए लगाई जाती है, जैसे कि 2 या 2 से अधिक पक्षों के बीच किसी तरह का समझौता या लेन-देन का दस्तावेज, जिसे रजिस्ट्रार के पास रजिस्टर कराया जाता है.
हाई कोर्ट के आदेश के बाद सर्कुलर जारी
डिविजनल कमिश्नर के ऑफिस की ओर से जारी सर्कुलर में, इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899 की धारा 47-A के तहत अपनाई जाने वाली प्रक्रिया बताई गई है; यह उन मामलों पर लागू होती है जहां प्रॉपर्टी का मूल्यांकन कम किया गया लगता है.
अधिकारियों ने यह भी बताया कि यह सर्कुलर हाल ही में आए हाई कोर्ट के एक आदेश के बाद जारी किया गया है. सर्कुलर के मुताबिक, दिल्ली स्टाम्प (प्रिवेंशन ऑफ अंडर-वैल्यूएशन ऑफ इंस्ट्रूमेंट्स) रूल्स 2007 के तहत, मालिकों को प्रॉपर्टी का ढका हुआ हिस्सा (Plinth Area) और बिल्ट-अप एरिया (Total Physical Footprint) दोनों साफ-साफ बताने होंगे. साथ ही स्टाम्प ड्यूटी की गणना भी इन्हीं के मूल्यों के आधार पर की जाएगी, जिसमें निर्माण लागत भी शामिल होगी.
गलत गणना से प्रॉपर्टी की वैल्यू कम
विभाग की ओर से जारी सर्कुलर में यह भी कहा गया, “किसी प्रॉपर्टी की आंशिक बिक्री के मामले में, संपत्ति का बेचे गए वास्तविक मूल्यांकन प्लिंथ एरिया के अनुपात में होगा, और स्टाम्प ड्यूटी भी उसी के अनुसार तय की जाएगी.” जबकि ज्यादातर मौकों पर यह देखा जाता है कि स्टाम्प ड्यूटी की गणना वास्तविक बिल्ट-अप एरिया की जगह अधिकतम प्लिंथ एरिया पर गलत तरीके से की जाती है, जिससे प्रॉपर्टी की वैल्यू कम हो जाती है.
सर्कुलर के अनुसार, “खासतौर से, रिहायशी प्रॉपर्टी के बेसमेंट के रजिस्ट्रेशन से जुड़े मामलों में कुछ दिक्कतें देखी गई हैं. इन मामलों में दस्तावेज में बताई गई कीमत, क्षेत्र में लागू सर्कल रेट के हिसाब से तय मूल्यांकन से कम पाई गई है.” स्टाम्प ड्यूटी बचाने के लिए लोगों द्वारा प्रॉपर्टी की कम कीमत बताने की चिंताओं के चलते, राजस्व विभाग ने सब-रजिस्ट्रारों को निर्देश दिया है कि जब वे किसी प्रॉपर्टी का रजिस्ट्रेशन करें, तो संबंधित पक्षों को लिखित रूप में यह सूचित भी करें कि यदि घोषित प्रॉपर्टी की कीमत आधिकारिक सर्कल रेट से कम है, तो वे आवश्यक राशि से कम भुगतान कर रहे हैं.
दस्तावेज को ठीक करने का मिलेगा मौका
विभाग ने यह भी कहा कि संबंधित लोगों को दस्तावेज को संशोधित और ठीक करने का अवसर दिया जाएगा, ताकि सर्कल रेट के अनुसार संपत्ति का सही मूल्यांकन दिखाया जा सके और यदि कोई स्टाम्प ड्यूटी कम पड़ रही हो, तो उसका भुगतान किया जा सके.
साथ ही यह भी कहा गया है, “यदि संबंधित पक्ष दस्तावेज में संशोधन करने में नाकाम रहता है और वह सर्कल रेट मूल्यांकन के अनुसार आवश्यक स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान नहीं करता है, तो सब-रजिस्ट्रार और जाइंट सब-रजिस्ट्रार दस्तावेज में कमी का जिक्र करते हुए इस टिप्पणी के साथ रजिस्टर करेंगे और रजिस्टर्ड दस्तावेज को सही बाजार मूल्य और उचित स्टाम्प ड्यूटी निर्धारित करने के लिए स्टाम्प कलेक्टर के पास भेज देंगे.”
अधिकारियों ने बताया कि स्टाम्प कलेक्टर को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे दस्तावेज मिलने के 3 महीने के अंदर ऐसे मामलों का निपटारा करें. सर्कुलर के अनुसार, “दस्तावेज मिलने के बाद, स्टाम्प कलेक्टर कानून के अनुसार अपनी प्रक्रिया आगे बढ़ाएंगे. ताकि सही बाजार मूल्य का आकलन किया जा सके और स्टाम्प ड्यूटी में किसी भी कमी की वसूली की जा सके.
इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899 की धारा 47-A के तहत (जैसा कि दिल्ली पर लागू होता है) की कार्यवाही का निपटारा, सामान्य तौर पर, स्टाम्प कलेक्टर द्वारा दस्तावेज मिलने की तारीख से 3 महीने की अवधि के अंदर किया जाएगा.”



