दवाओं की कीमत में भारी अंतर पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, 2700 रुपये की दवा 27 हजार में बेचने का मामला
अदालत ने केंद्र सरकार को विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया है, जो दवा कंपनियों की मार्केटिंग के तरीकों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी वैधानिक व्यवस्था बनाने को लेकर अपनी सिफारिशें देगी।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: देश में दवाओं की कीमतों और फार्मास्यूटिकल कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार को विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया है, जो दवा कंपनियों की मार्केटिंग के तरीकों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी वैधानिक व्यवस्था बनाने को लेकर अपनी सिफारिशें देगी।
अदालत की चिंता खास तौर पर उन परिस्थितियों को लेकर है, जिनमें दवाओं की कीमत मरीजों की पहुंच से बाहर हो सकती है और डॉक्टरों को दिए जाने वाले कथित उपहार, यात्रा या अन्य लाभ उनके प्रिस्क्रिप्शन व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट पहले भी ऐसे मामलों में दवा की कीमत, मरीजों की वहनीयता और डॉक्टरों-फार्मा कंपनियों के संबंधों से जुड़े मुद्दों को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण बता चुका है।
दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
दवाओं की कीमत सीधे तौर पर मरीजों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच से जुड़ी हुई है। अदालत ने इस व्यापक मुद्दे पर विचार करते हुए दवाओं की गुणवत्ता के साथ-साथ उनकी affordability यानी मरीजों की भुगतान क्षमता को भी महत्वपूर्ण पहलू माना है।
सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले में भी यह चिंता सामने आई थी कि कुछ दवाओं की कीमत इतनी अधिक हो सकती है कि मरीजों के लिए उनका खर्च उठाना मुश्किल हो जाए। अदालत ने उस मामले में दवाओं की कीमतों और स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता को व्यापक सार्वजनिक हित से जुड़ा विषय माना था। यही वजह है कि अब दवा कंपनियों की मार्केटिंग व्यवस्था और उससे जुड़े नियामकीय ढांचे को लेकर व्यापक स्तर पर विचार की जरूरत महसूस की जा रही है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले पर केंद्र सरकार को विशेषज्ञ समिति (कमेटी) का गठन करने का आदेश दिया. ताकि दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग के तरीकों पर रोक लगायी जा सके. बेंच ने आदेश में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं को विनियमित करने के लिए वैधानिक नियम बनाने को लेकर अपनी सिफारिशें देगी.
यह कमेटी डॉक्टरों को महंगे गिफ्ट, विदेश यात्राएं, हॉस्पिटैलिटी या अन्य आर्थिक फायदे देने जैसी अनैतिक गतिविधियों को रोकने के लिए सख्त कानूनी प्रावधानों का खाका तैयार करेगी. कमेटी इस गंभीर मुद्दे पर आम जनता, विशेषज्ञों और संबंधित संस्थाओं के सुझावों व आपत्तियों को सुनने के बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपेगी.
अगली सुनवाई और सरकार का कदम
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस आदेश पर की गई कार्रवाई को लेकर कोर्ट में एक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 को तय की है, जहां सरकार को कमेटी के गठन और नियमों की प्रगति की जानकारी देनी होगी.
सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में पहले सुनवाई के दौरान कहा था कि दवाओं के खरीद मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच के भारी अंतर पर गहरी चिंता जताई थी. तब कोर्ट ने एक उदाहरण देते हुए कहा था कि जो दवा रिटेलर को ₹2,700 में मिलती है, उसकी MRP ₹27,000 डाल दी जाती है.
इस 10 गुना मुनाफे को बेंच ने आम जनता और मरीजों के साथ दिनदहाड़े डकैती करार दिया था. साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं (जैसे कैंसर की दवाएं) के मुनाफे के मार्जिन को Drugs (Prices Control) Order, 2013 के तहत 16% पर कैप (सीमित) क्यों नहीं किया जा सकता.
यह पूरा मामला फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशंस ऑफ इंडिया (FMRAI) द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका से शुरू हुआ था. याचिका में आरोप लगाया गया था कि कंपनियां अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए डॉक्टरों पर भारी दबाव डालती हैं और उन्हें प्रलोभन देती हैं, जिससे डॉक्टर मरीजों को महंगी और गैर-जरूरी ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं, जिससे नागरिकों के ‘राइट टू हेल्थ’ (स्वास्थ्य के अधिकार) का हनन होता है.



