अहमदाबाद से लेकर नोएडा तक बढ़ी टेंशन ?

- ई-मेल से दहशत, स्कूल निशाने पर
- लगाातर मिल रही है स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी
- देश भर के प्रतिष्ठत स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी से हड़कंप
- नोएडा में आधा दर्जन व अहमदाबाद में 2 स्कूल बंद
- तलाशी अभियान जारी
- सिख फार जस्टिस संगठन चलाने वाले उग्रवादी पन्नू पर दिल्ली में एफआईआर
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। आज एक बार फिर देश के अलग अलग हिस्सों में उस डर ने सिर उठाया है जिसकी कोई शक्ल नहीं होती लेकिन असर गहरा होता है। अहमदाबाद से लेकर नोएडा तक प्रतिष्ठित स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकियों ने न सिर्फ अभिभावकों की धड़कनें तेज कर दीं है बल्कि सुरक्षा व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अहमदाबाद में सेंट जेवियर्स स्कूल और संत कबीर स्कूल को बम से उड़ाने की धमकी मिलने की सूचना सामने आई है। वहीं उत्तर प्रदेश के नोएडा में आधा दर्जन से ज्यादा स्कूलों को एक साथ धमकी भरे ई-मेल भेजे गए। इनमें शिव नादर स्कूल, फादर एग्नेल स्कूल, आर्मी पब्लिक स्कूल, श्रीराम मिलेनियम स्कूल और रामाज्ञा स्कूल जैसे नाम शामिल हैं। धमकी भरे ई-मेल मिलते ही अहमदाबाद और नोएडा पुलिस हरकत में आई है। बम निरोधक दस्तों को मौके पर बुलाया जा चुका है और स्कूल परिसरों की गहन तलाशी ली जा रही है। एहतियातन कई जगहों पर छात्रों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया। जिन स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी दी गयी है उन स्कूलों में प्रशासन ने छुट््टी घोषित कर दी है। हजारों बच्चों की पढ़ाई ठप हो चुकी है अभिभावकों में डर का महौल है और हवा में हर बार की तरह एक ऐसा सवाल तैर रहा है कि क्या यह सिर्फ शरारत है या किसी बड़ी साजिश की रिहर्सल?
फेक कॉल कहकर टालना खतरनाक
आज देश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर धमकी को सिर्फ फेक मेल कहकर टालना भी खतरनाक है और हर बार दहशत में जीना भी। जरूरत है ठोस जांच तकनीकी ट्रैकिंग और सार्वजनिक जवाबदेही की ताकि अगली बार ई-मेल खुले उससे पहले डर बंद हो। सवाल सिर्फ स्कूलों का नहीं है सवाल उस देश का है जहां बच्चों की किताबों से ज्यादा भारी डर होने लगा है।
पहली बार नहीं मिली है धमकी
गौर करने वाली बात यह है कि इस तरह की धमकी पहली बार नहीं दी गयी है। नोएडा के स्कूल पहले भी इसी तरह के धमकी भरे ई-मेल का सामना कर चुके हैं। हर बार जांच होती है हर बार राहत की सांस ली जाती है और फिर कुछ समय बाद वही कहानी नए स्कूल नए शहर और नए डर के साथ लौट आती है। यह सिलसिला अब संयोग नहीं लगता बल्कि एक पैटर्न की तरह उभरता दिख रहा है।
पन्नू एक्टिव खालिस्तन समर्थक पोस्टर लगाने के दावे
पन्नू ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर दावा किया था कि उसने अपने स्लीपर सेल के जरिए दिल्ली के रोहिणी और डाबरी इलाकों में खालिस्तान समर्थक पोस्टर लगाए हैं। हालांकि, स्पेशल सेल को अभी तक ऐसे कोई पोस्टर नहीं मिले हैं। गुरपतवंत सिंह पन्नू ने एक वीडियो जारी कर गणतंत्र दिवस के पहले भारत में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी फैलाने की भी धमकी दी है। उसने दावा किया है कि राजधानी दिल्ली के रोहिणी और डाबड़ी में प्रो-खालिस्तानी लोगों ने पोस्टर चिपकाए हैं।
यूएपीए के तहत घोषित किया है आतंकी
1 जुलाई 2020 से भारत सरकार ने गुरपतवंत सिंह पन्नू को यूएपीए कानून के तहत आतंकवादी घोषित कर रखा है। जुलाई 2020 में ही पंजाब पुलिस ने अमृतसर और कपूरथला में उसके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज किया था। पन्नू ने इससे पहले अपने यू-ट्यूब चैनल पर ऐलान किया था कि गुरुग्राम से लेकर हरियाणा के अंबाला तक सभी एसपी और डीसी कार्यालयों में खालिस्तानी झंडा फहराया जाएगा। इसके बाद गुरुग्राम में उसके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज हुआ था। गुरपतवंत सिंह पन्नू अमृतसर के खानकोट गांव में पैदा हुआ था। बाद में वह विदेश चला गया और आईएसआई के सहयोग से पंजाब में खालिस्तानी अलगाववादी मुहिम को फिर से जिंदा करने की कोशिश में है। इस घटना के बाद अब दिल्ली पुलिस ने पन्नू के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है और आगे की जांच की कार्रवाई की जा रही है।
बच्चों की पढ़ाई को दहशत का मैदान बनाना चाहते हैं आतंकवादी
इसी बीच खालिस्तान समर्थक आतंकी और सिख फार जस्टिस नामक संगठन चलाने वाले गुरुपतवंत सिंह पन्नू के खिलाफ दिल्ली में एफआईआर दर्ज की गई है। पन्नू पर 26 जनवरी से पहले राष्ट्रीय राजधानी में अशांति फैलाने की कोशिश के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि मौजूदा स्कूल धमकी मामलों में किसी भी संगठन या व्यक्ति की प्रत्यक्ष भूमिका की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता यह संकेत जरूर देती है कि इन धमकियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि निशाने पर बार बार स्कूल आ रहे हैं। यानी वह जगहें जहां बच्चे पढ़ते हैं सपने देखते हैं और जहां समाज खुद को सबसे सुरक्षित मानना चाहता है। सवाल यह नहीं है कि बम मिला या नहीं सवाल यह है कि क्या हम उस मनोविज्ञान को समझ पा रहे हैं जो बच्चों की पढ़ाई को दहशत का मैदान बनाना चाहता है?




