लोकतंत्र की परीक्षा चुनावों में नहीं, अदालतों की दहलीज पर!

  • एफआईआर का आदेश दिया और कुर्सी चली गयी
  • संभल हिंसा केस में जज विभांशु सुधीर का तबादला
  • जज के डिमोशन की खबर की गूंज सोशल मीडिया पर

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावों में नहीं, अदालतों की दहलीज पर होती है और जब किसी अदालत के आदेश के बाद अदालत में बैठने वाले जज की कुर्सी बदल दी जाए तब सवाल फैसले का नहीं परिस्थिति का हो जाता है।
उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा के मामले में पुलिस अधिकारियों पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश देने वाले तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सीजेएम विभांशु सुधीर का तबादला किये जाने की खबर है। खबर इसलिए और ज्यादा महत्तवपूर्ण हो जाती है कि उन्हें सीजेएम पद से हटाकर सिविल जज सीनियर डिविजन के रूप में पोस्टिंग दी गयी है। कानून के जानकार इसे डिमोशन के नजरिये से देख रहे हैं और सरकार का यह निर्णय सोशल मीडिया पर सवाल खड़े कर रहा है कि जज के साथ ऐसे इंसाफ की किसी को कल्पना भी नहीं थी। सवाल यही है कि यह सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय है या उससे आगे कुछ।

विभांशू सुधीर ने दिये थे एफआईआर करने के निर्देश

संभल हिंसा मामले में उस समय एक अहम मोड़ आया था जब तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर ने सीओ अनुज चौधरी सहित मामले से जुड़े अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये थे। यह आदेश कानून की उस प्रक्रिया का हिस्सा था जिसमें अदालत प्रथम दृष्टया तथ्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाने का निर्देश देती है। इस आदेश के बाद प्रशासनिक स्तर पर एक और घटनाक्रम सामने आया है। जज विभांशु सुधीर का तबादला कर दिया गया है। उन्हें सीजेएम पद से हटाकर सुल्तानपुर में सिविल जज (सीनियर डिविजन) के रूप में नियुक्त किया गया।

प्रश्नों को जन्म देता है तबादला

न्यायिक सेवा में तबादले कोई असामान्य घटना नहीं हैं। पदों में परिवर्तन भी व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा माने जाते हैं। लेकिन कई बार समय और संदर्भ ऐसे होते हैं जो स्वाभाविक रूप से प्रश्नों को जन्म देते हैं। संभल प्रकरण में भी चर्चा का केंद्र यही बिंदु है। यह खबर इसलिए असाधारण नहीं है कि एक जज का तबादला हुआ बल्कि इसलिए ध्यान खींचती है कि एक न्यायिक आदेश के बाद बदलाव सामने आया। यही वह क्षण है जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था का तापमान मापा जाता है। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि कोई यह दावा नहीं कर रहा है कि तबादला दंड है पर पद परिवर्तन सज़ा है या किसी प्रकार का दबाव डाला गया। लेकिन यह प्रश्न पूरी तरह वैध है कि क्या ऐसे संयोग न्यायपालिका के प्रति जनता के भरोसे को सहज बनाए रखते हैं।

न्यायपालिका स्वतंत्र हो और स्वतंत्र दिखाई भी दे

भारतीय संविधान न्यायपालिका को केवल स्वतंत्र नहीं करता बल्कि उसे स्वतंत्र दिखाई देने योग्य भी बनाता है। इसी कारण जजों की नियुक्ति स्थानांतरण और पदस्थापन को अत्यंत संवेदनशील विषय माना जाता है। इन प्रक्रियाओं से जुड़ी हर घटना केवल प्रशासनिक नहीं रहती बल्कि सार्वजनिक विश्वास से भी जुड़ जाती है। जब कोई जज पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देता है तो वह किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं बल्कि कानून की प्रक्रिया को सक्रिय करता है। ऐसे में यदि उसी क्रम में उसका स्थानांतरण हो जाए तो यह न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर नहीं बल्कि न्यायपालिका की धारणा पर सवाल खड़े करता है।

नहीं आया कोई बयान सामने

इस पूरे घटनाक्रम में जज की ओर से कोई सार्वजनिक बयान कोई सफाई या कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। इसे न्यायिक मर्यादा की दृष्टि से देखा जा सकता है। लेकिन दूसरी ओर जनता सवाल पूछ रही है और सवाल पूछना लोकतंत्र की अवमानना नहीं उसकी रक्षा का माध्यम है। न्यायपालिका प्रेस कांन्फ्रेंस नहीं करती। वह आदेशों प्रक्रियाओं और संस्थागत निर्णयों के माध्यम से संवाद करती है। इसी कारण तबादले का समय पद का स्वरूप और उसकी पृष्ठभूमि स्वाभाविक रूप से विश्लेषण का विषय बन जाते हैं। यह विश्लेषण न्यायालय के विरुद्ध नहीं बल्कि न्यायालय की गरिमा और विश्वसनीयता को बनाए रखने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

संभल हिंसा का मामला अपने आप में संवेदनशील

संभल हिंसा का मामला अपने आप में संवेदनशील है। पुलिस की भूमिका पर सवाल उठें है और अदालत ने प्रक्रिया के तहत अपना आदेश दिया। यहीं से संस्थाओं के बीच संतुलन की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। यदि अदालत पुलिस को जांच के दायरे में लाने में असमर्थ हो तो कानून का अर्थ सीमित हो जाएगा। और यदि अदालत के आदेश के बाद अदालत ही असहज प्रतीत हो तो असहजता लोकतंत्र तक पहुंच जाती है।

कोर्ट के आदेश पर अमल का सवाल

संभल हिंसा मामले में अदालत के आदेश और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच टकराव की स्थिति भी सामने आई थी। तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सीओ अनुज चौधरी सहित अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का जो आदेश पारित किया था उस आदेश पर पुलिस प्रशासन की ओर से पूर्ण अमल न होने की बात भी सामने आयी थी। मीडिया रिपोर्टो के मुताबिक जिले के तत्कालीन एसपी स्तर पर यह कहा गया कि जिन 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था उस निर्णय को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि यह सवाल खड़ा करती है कि जब अदालत किसी मामले में जांच का रास्ता खोलती है तो प्रशासनिक स्तर पर उस आदेश के अनुपालन की सीमा और प्रक्रिया क्या होनी चाहिए। मामला कानून पुलिस और न्यायपालिका के बीच संतुलन को लेकर बहस का विषय बन गया है।

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