असली आनंद बाहर नहीं, ‘मैं’ से मुक्ति और आत्म-दर्शन में है

पूरी जिंदगी हम अपने चित्र में कुछ जोड़ते रहते हैं. पैसा, सफलता, सम्मान, चीजें, रिश्ते और पहचान. लेकिन शायद एक दूसरी तरह की आजादी तब आती है जब हमें हर चीज में अपना चेहरा दिखाई देना जरूरी नहीं रह जाता.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: पूरी जिंदगी हम अपने चित्र में कुछ जोड़ते रहते हैं. पैसा, सफलता, सम्मान, चीजें, रिश्ते और पहचान. लेकिन शायद एक दूसरी तरह की आजादी तब आती है जब हमें हर चीज में अपना चेहरा दिखाई देना जरूरी नहीं रह जाता.

एक बहुत सुंदर कहानी है, एक कलाकार की, जो रामकृष्ण परमहंस का चित्र बनाने उनके पास आया. वह अच्छा कलाकार था. उसने उन्हें बहुत ध्यान से देखा, उनके चेहरे को समझा और फिर घर चला गया. लगभग एक महीने तक वह उस चित्र पर काम करता रहा. उसने रंगों, रेखाओं और चेहरे की छोटी-छोटी बारीकियों को पकड़ने की कोशिश की. जब चित्र पूरा हो गया, तो वह उसे लेकर आश्रम पहुंचा. वहां बहुत लोग थे. उसने चित्र रामकृष्ण परमहंस के सामने रखा और कहा, मैंने यह आपके लिए बनाया है. इसे बनाने में मैंने बहुत समय लगाया है.

आप इसे देखिए.
रामकृष्ण परमहंस ने जैसे ही चित्र देखा, वे अचानक उठे और आनंद से नाचने लगे. उनके शिष्य हैरान हो गए. उन्हें समझ नहीं आया कि कोई व्यक्ति अपने ही चित्र को देखकर इस तरह कैसे नाच सकता है. आखिर उनमें से एक ने पूछा, ‘आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? लोग क्या सोचेंगे? आप अपने ही चित्र के सामने नाच रहे हैं. रामकृष्ण परमहंस ने जो उत्तर दिया, उसमें शायद पूरी कहानी का सबसे गहरा अर्थ छिपा था. उन्होंने कहा, ‘मैं भूल गया था कि यह मेरा चित्र है. मुझे इसमें अपना चेहरा दिखाई नहीं दिया. मुझे तो समाधि दिखाई दी.

हमारे ‘मैं’ की कहानी
हम किसी का चित्र देखते हैं तो सबसे पहले उसका चेहरा देखते हैं. हम जानना चाहते हैं कि यह कौन है. फिर उसके कपड़े देखते हैं, चेहरे का भाव देखते हैं, सुंदरता देखते हैं और यह भी देखते हैं कि हमें वह चित्र कैसा लग रहा है. लेकिन रामकृष्ण ने उस चित्र में अपना चेहरा नहीं देखा. उन्होंने एक ऐसी अवस्था देखी जिसमें ‘मैं’ शांत हो गया था. शायद यही बात इस कहानी को केवल एक चित्र की कहानी नहीं रहने देती. यह हमारे उस ‘मैं’ की कहानी बन जाती है, जिसे हम पूरी जिंदगी बनाते रहते हैं.

हमारा नाम, हमारा चेहरा, हमारा काम, हमारी सफलता, हमारी असफलता, हमारी इज्जत और हमारी यादें मिलकर हमारे भीतर एक पहचान बनाते हैं. धीरे-धीरे हमें लगने लगता है कि यही सब हम हैं. लेकिन अगर कभी कुछ देर के लिए हम इस ‘मैं’ से थोड़ा बाहर आ जाएं, तो क्या होगा?

खुद को साबित करने की जरूरत
शायद समाधि का सबसे सरल अर्थ यही हो सकता है कि कुछ क्षणों के लिए देखने वाला और जिसे देखा जा रहा है, उनके बीच की दूरी कम हो जाए. ‘मैं’ थोड़ा पीछे चला जाए. नाम थोड़ा कम महत्वपूर्ण हो जाए. हमारी कहानी थोड़ी शांत हो जाए. खुद को साबित करने की जरूरत थोड़ी कम हो जाए. और जब ऐसा होता है, तो शायद जीवन हमें कुछ अलग दिखाई देने लगता है. तब हम हर चीज को यह पूछकर नहीं देखते कि ‘इसमें मेरे लिए क्या है? हम बस उसे देख पाते हैं जो सामने है.

लेकिन हमारा जीवन अक्सर इसके उलट चलता है. हम हर जगह अपना चेहरा खोजते रहते हैं. कोई हमारी तारीफ करता है तो हम अपने को बड़ा महसूस करते हैं. कोई हमारी आलोचना करता है तो भीतर कुछ छोटा हो जाता है. लोग हमें याद रखते हैं तो लगता है कि हम महत्वपूर्ण हैं. लोग भूल जाते हैं तो हम अपनी कीमत पर सवाल करने लगते हैं. रिश्तों में भी हम कई बार दूसरे इंसान को कम और अपना प्रतिबिंब ज्यादा देखते हैं. हमें लगता है कि हम दुनिया को देख रहे हैं, लेकिन कई बार हम दुनिया में केवल खुद को खोज रहे होते हैं.

‘मैं भूल गया था कि यह मेरा चित्र है’
इसीलिए यह वाक्य, ‘मैं भूल गया था कि यह मेरा चित्र है, इतना गहरा है. यहां अपने आपको भूल जाना खुद को खो देना नहीं है. यह कुछ समय के लिए अपने ही बोझ से मुक्त हो जाना है. अपनी कहानी से थोड़ा बाहर निकलना है. अपने नाम को थोड़ी देर के लिए पीछे रख देना है. यह सोचना बंद करना है कि लोग हमें कैसे देख रहे हैं. यह हिसाब छोड़ देना है कि हमें क्या मिला और क्या नहीं मिला. और केवल देखना है.

हमारे साधारण जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं. कोई बच्चा खेलते-खेलते भूल जाता है कि उसे कोई देख रहा है. कोई कलाकार अपने काम में इतना डूब जाता है कि समय का पता नहीं चलता. कोई मां अपने बच्चे को गोद में लेकर कुछ देर के लिए अपनी सारी चिंताएं भूल जाती है. कोई व्यक्ति किसी अनजान इंसान की मदद करते-करते इतना जुड़ जाता है कि उसे यह याद नहीं रहता कि उसने किसी की मदद की है. प्रेम में भी कभी-कभी ऐसा ही होता है. कुछ क्षणों के लिए अपना महत्व छोटा हो जाता है और सामने वाले का अस्तित्व बड़ा हो जाता है.

जीवन से भागना जरूरी नहीं
शायद ये उसी अवस्था की छोटी-छोटी झलकियां हैं. इसके लिए जीवन से भागना जरूरी नहीं है. यह संगीत सुनते हुए आ सकता है, समुद्र को देखते हुए आ सकता है, किसी अपने के पास चुप बैठे हुए आ सकता है, अपने हाथों से कुछ बनाते हुए आ सकता है या किसी की बिना बताए मदद करते हुए आ सकता है. इन सबमें एक छोटी-सी बात समान है. कुछ समय के लिए हम अपना प्रतिबिंब देखना बंद कर देते हैं.

चेहरे के पार कुछ और देखा
शायद इसलिए हम उन क्षणों में सबसे हल्का महसूस करते हैं जब हम अपने आपको भूल जाते हैं. पूरी जिंदगी हम अपने चित्र में कुछ न कुछ जोड़ते रहते हैं. पैसा, सफलता, सम्मान, चीजें, रिश्ते और पहचान. लेकिन शायद एक दूसरी तरह की आजादी तब आती है जब हमें हर चीज में अपना चेहरा दिखाई देना जरूरी नहीं रह जाता. कलाकार ने एक चेहरा बनाया था. रामकृष्ण ने उस चेहरे के पार कुछ देखा. शायद जीवन की सबसे बड़ी आजादी उसी दिन शुरू होती है, जब हमें हर जगह अपना चेहरा दिखाई देना बंद हो जाता है और हम पहली बार इतने शांत होते हैं कि जीवन को स्वयं देख सकें.

Related Articles

Back to top button