उद्धव ने पलटा खेल, शिंदे को करा दिया साइडलाइन, बीजेपी से गठबंधन?

मुंबई मेयर को लेकर महायुति गठबंधन में दरार, भाजपा शिंदे में सामने आई है अब सीधी तकरार, उद्धव का प्लान तैयार, किसका होगा मेयर? ये सवाल अब भी है बरकारार। मुंबई मेयर चुनाव को लेकर महायुति में जबरदस्त घमासान देखने को मिल रहा है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: मुंबई मेयर को लेकर महायुति गठबंधन में दरार, भाजपा शिंदे में सामने आई है अब सीधी तकरार, उद्धव का प्लान तैयार, किसका होगा मेयर? ये सवाल अब भी है बरकारार। मुंबई मेयर चुनाव को लेकर महायुति में जबरदस्त घमासान देखने को मिल रहा है।

एक तरफ जहां अब तक शिंदे हफ्तों से अपने पार्षदों को होटलों में ठहराकर जहां बीजेपी से डीलिंग करने की कोशिश कर रहे थे वहीं उद्धव ठाकरे ने अब ऐसा दांव चलने की तैयारी कर ली है जिससे बीजेपी और शिंदे गुट दोनों ही चारों खानों चित हो जाएंगे। अब तक हमने मुंबई और महाराष्ट्र के निकाय चुनावों के दौरान ऐसे ऐसे गठबंधन होते देखे जिसकी कभी कल्पना नहीं की जा सकती थी। कहीं खबर आई कि बीजेपी ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM से गठबंधन कर लिया तो कभी तो ये तक पता चला कि एक दूसरे की धुरविरोधी कांग्रेस और बीजेपी ने गठबंधन कर लिया है। मतलब कल्पनाओं की कोई सीमा ही नहीं रही। लेकिन अब मेयर चुनाव से पहले एक ऐसा गठबंधन गुपचुप तरीके से तैयार होने जा रहा है कि महाराष्ट्र की पूरी पॉलिटिक्स पलट कर रह जाएगी।

भाजपा अपने सहयोगी दलों को मिट्टी मिलाने में कितनी एक्सपर्ट है ये बात किसी से छिपी नहीं है। बीजेपी अपना वर्चस्व कायम रखने और सत्ता में बने रहने के लिए कोई समझौता नहीं करती। मुंबई की राजनीति में भी भाजपा कुछ ऐसा ही करने वाली है। मुंबई में मेयर चुनाव से पहले एक बार फिर बड़े उलटफेर की अटकलें तेज हो गई हैं और इस बार मामला सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि सीधी राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का है। चर्चा जोरों पर है कि बीएमसी में उद्धव गुट की शिवसेना ऐसा कदम उठा सकती है जिसकी कल्पना कुछ महीने पहले तक नामुमकिन मानी जाती थी और वो ये है कि उद्धव ठाकरे बीजेपी को समर्थन दे सकते हैं। एक बार फिर उद्धव बीजेपी को समर्थन देने वाले हैं। पहली नजर में यह बात चौंकाती है, क्योंकि यही बीजेपी पिछले दो साल से उद्धव ठाकरे की राजनीति की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी रही है। लेकिन राजनीति में स्थायी दुश्मन नहीं होते हैं।

सिर्फ स्थायी हित होते हैं और इस वक्त उद्धव का सबसे बड़ा लक्ष्य एकनाथ शिंदे को राजनीतिक तौर पर अलग-थलग करना है। उद्धव उन्हीं एकनाथ शिंदे को सबक सिखाना चाहते हैं जिन्होंने उनकी पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया था। यही वह बिंदु है जहां से पूरी कहानी पलटती दिख रही है। अब पूरा खेल क्या है समझते हैं। दरअसल, एकनाथ शिंदे अपने पार्षदों को होटल में कैद करके लगातार बीजेपी पर दबाव बना रहे हैं कि मुंबई मेयर पद उनके गुट को मिले। शिंदे गुट यह संदेश देना चाहता है कि असली शिवसेना वही है और मुंबई पर उनका अधिकार स्वाभाविक है। लेकिन बीजेपी के लिए यह इतना आसान नहीं है।

बीजेपी खुद बीएमसी में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और इतने वर्षों से मुंबई पर कब्जा करने का उसका सपना अब पूरा होने के करीब दिख रहा है। ऐसे में शिंदे की मांग बीजेपी के लिए सहयोग से ज्यादा दबाव बनती जा रही है। और यही दबाव अब टकराव में बदलता दिख रहा है। उधर उद्धव ठाकरे चुप जरूर हैं, लेकिन निष्क्रिय नहीं। अंदरखाने जो रणनीति बन रही है, वह सीधी शिंदे की राजनीति की जड़ों पर वार करती है। अब सोचिए अगर शिवसेना (यूबीटी) फ्लोर टेस्ट या मेयर चुनाव की प्रक्रिया के दौरान अनुपस्थित रहती है या अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के लिए रास्ता साफ करती है, तो सबसे बड़ा नुकसान किसका होगा? जवाब साफ है शिंदे का। क्योंकि तब बीजेपी को मेयर पद के लिए शिंदे पर निर्भर रहने की जरूरत ही नहीं बचेगी।

इस सियासी हलचल को तब और हवा मिली जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने बालासाहेब ठाकरे की 100वीं जयंती पर सोशल मीडिया पर एक बेहद संकेतपूर्ण पोस्ट डाली। यह कोई सामान्य श्रद्धांजलि नहीं थी, बल्कि राजनीति के जानकारों के लिए खुला संदेश थी। राज ठाकरे ने लिखा कि राजनीति में बालासाहेब को भी कई बार लचीला रुख अपनाना पड़ा, लेकिन मराठी लोगों के प्रति उनका प्रेम कभी कम नहीं हुआ। बदली हुई राजनीति में अगर उन्हें भी थोड़ा लचीला रुख अपनाना पड़े, तो वह निजी स्वार्थ के लिए नहीं होगा। इस एक बयान ने मुंबई की राजनीति में भूचाल ला दिया।

इसका सीधा मतलब निकाला गया कि राज ठाकरे भी किसी बड़े राजनीतिक पुनर्संयोजन के लिए तैयार हैं। और जब राज ठाकरे का नाम आता है, तो समीकरण सिर्फ एमएनएस तक सीमित नहीं रहते हैं। ठाकरे परिवार की राजनीति, मराठी अस्मिता और मुंबई की सत्ता की धुरी एक साथ जुड़ जाती है। चर्चा यह भी है कि राज ठाकरे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उद्धव ठाकरे के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं। अगर यह सच है, तो यह महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा ‘रीसेट’ हो सकता है।

शिवसेना (यूबीटी) फ्लोर टेस्ट के दौरान अनुपस्थित रह सकती है। यह अनुपस्थिति सिर्फ अनुपस्थिति नहीं होगी बल्कि यह एक रणनीतिक चाल होगी। क्योंकि बीएमसी में मेयर के साथ-साथ स्टैंडिंग कमेटी और इम्प्रूवमेंट कमेटी जैसे बेहद ताकतवर पद भी दांव पर हैं। इन कमेटियों के पास अरबों रुपये के प्रोजेक्ट्स, टेंडर और फैसलों की ताकत होती है। अगर बीजेपी इन पर कब्जा कर लेती है और शिंदे गुट को किनारे कर देती है, तो मुंबई की सत्ता संरचना पूरी तरह बदल जाएगी। अब जरा बीएमसी के आंकड़ों पर नजर डालिए। 227 सदस्यीय सदन में बीजेपी के पास 89 सीटें हैं, यानी बीजेपी ही सबसे बड़ी पार्टी है। लेकिन उसको पूर्ण बहुमत के लिए कम से कम 25 सीटों की जरूरत है।

वहीं शिवसेना (यूबीटी) के पास 66 सीटें हैं। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के पास 29 सीटें हैं और कांग्रेस के पास 21। बहुमत का आंकड़ा है 114। कोई भी पार्टी अकेले इस आंकड़े तक नहीं पहुंचती। यहीं से खेल शुरू होता है। अगर बीजेपी और शिंदे साथ रहते हैं, तो आंकड़ा 118 तक पहुंच सकता है। लेकिन अगर बीजेपी को शिवसेना (यूबीटी) की अप्रत्यक्ष मदद मिलती है, वो चाहे अनुपस्थिति के जरिए ही क्यों न हो, तो बीजेपी को शिंदे की जरूरत कम पड़ जाएगी। यही शिंदे के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा है। क्योंकि उनकी पूरी ताकत इस बात पर टिकी है कि वो बीजेपी के लिए अनिवार्य सहयोगी हैं। अगर यह धारणा टूट गई, तो शिंदे गुट का महत्व तेजी से घट सकता है। शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने भी संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी बीजेपी के साथ जाने पर विचार कर सकती है, लेकिन शिंदे गुट के साथ किसी भी हाल में समझौता नहीं होगा। उन्होंने शिंदे को “गद्दार” बताते हुए साफ कहा कि गद्दारों के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। यह बयान भावनात्मक जरूर है, लेकिन इसके पीछे ठंडी राजनीतिक गणित भी है कि शिंदे को खत्म करो, फिर बीजेपी से निपटना आसान होगा।

बीजेपी इस पूरे खेल में खुलकर कुछ नहीं बोल रही, लेकिन उसके सामने भी दुविधा है। एक तरफ शिंदे सरकार में सहयोगी हैं, दूसरी तरफ मुंबई पर सीधा नियंत्रण पाने का ऐतिहासिक मौका है। अगर बीजेपी को लगता है कि उद्धव गुट की रणनीति से उसे फायदा हो सकता है, तो वह व्यावहारिक फैसला लेने से पीछे नहीं हटेगी। यही वजह है कि इस मेयर चुनाव को सिर्फ स्थानीय निकाय का चुनाव समझना भारी भूल होगी। यह महाराष्ट्र की राजनीति का पावर टेस्ट है। यहां से तय होगा कि मुंबई की राजनीति में ठाकरे बनाम शिंदे की लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है, और बीजेपी किसे स्थायी साझेदार मानती है।

दरवाजों के पीछे जो खिचड़ी पक रही है, उसकी आंच अब बाहर तक महसूस हो रही है। बयान संयमित हैं, लेकिन चालें बेहद आक्रामक। उद्धव का दांव सीधा है कि “शिंदे को अनिवार्य मत रहने दो।” और अगर यह दांव सफल हुआ, तो शिंदे गुट की पूरी राजनीति हिल सकती है। अब सवाल वही कि किसका होगा मेयर? लेकिन असली सवाल उससे बड़ा है कि मुंबई की सत्ता का असली रिमोट किसके हाथ जाएगा? और इस लड़ाई में सबसे ज्यादा नुकसान किसका होगा? जवाब आने वाले दिनों में साफ होगा, लेकिन इतना तय है कि यह मेयर चुनाव नहीं, महाराष्ट्र की सियासत का टर्निंग पॉइंट बन चुका है।

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