Uddhav Thackeray ने पलट दिया पासा, BJP के होंगे मेयर! Eknath Shinde की बढ़ी मुश्किल !

नगर निकाय चुनावों के नतीजों के बाद जहां महायुति खेमे में जीत का जश्न दिख रहा था...वहीं उद्धव ठाकरे ने एक ऐसी राजनीतिक चाल चल दी है...

4पीएम न्यूज नेटवर्क: मुंबई की सियासत में बीएमसी मेयर चुनाव से पहले ऐसा उलटफेर हुआ है…जिसने महाराष्ट्र की राजनीति को नई दिशा दे दी है…

नगर निकाय चुनावों के नतीजों के बाद जहां महायुति खेमे में जीत का जश्न दिख रहा था…वहीं उद्धव ठाकरे ने एक ऐसी राजनीतिक चाल चल दी है…जिसने पूरे खेल का पासा ही पलट दिया है……वहीं महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और शिवसेना (शिंदे गुट) के प्रमुख एकनाथ शिंदे नवनिर्वाचित पार्षदों से मुलाकात कर उन्हें विकास, स्वच्छता, जल संकट और पारदर्शी प्रशासन की नसीहत दे रहे हैं….लेकिन हकीकत ये है कि उनकी राजनीतिक जमीन अब तेजी से खिसकती नजर आ रही है…….

एक ओर एकनाथ शिंदे दावा कर रहे हैं कि मुंबई की जनता ने विकास को चुना है और विकास-विरोधी सोच को नकार दिया है…मगर असली सवाल ये है कि इस तथाकथित विकास की राजनीति में आखिर सबसे बड़ा फायदा किसे हो रहा है?……बीएमसी की कुल 227 सीटों में बीजेपी के 89 पार्षद हैं, उद्धव ठाकरे गुट के 65 और शिंदे गुट के 29 पार्षद….संख्या के इस गणित ने साफ कर दिया है कि बीजेपी पहले से ही सबसे बड़ी पार्टी है…लेकिन बहुमत से कुछ कदम दूर थी….यहीं से उद्धव ठाकरे की रणनीति सामने आती है…..

सूत्रों के मुताबिक, उद्धव गुट ने फैसला लिया है कि अगर बीजेपी का उम्मीदवार मेयर बना…तो उनके सभी पार्षद वोटिंग से दूर रहेंगे….पहली नजर में ये फैसला बीजेपी के लिए मददगार लगता है…लेकिन असल में ये एकनाथ शिंदे के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है…अगर 65 पार्षद वोटिंग से बाहर रहते हैं…तो मेयर चुनाव सिर्फ 162 पार्षदों के बीच होगा और बहुमत का आंकड़ा 82 पर आ जाएगा…बीजेपी के पास पहले से ही 89 पार्षद हैं…यानी उसे न शिंदे की जरूरत पड़ेगी और न किसी और सहयोगी की….इसका मतलब साफ है कि बीजेपी अपने दम पर मेयर बना लेगी और एकनाथ शिंदे पूरी तरह हाशिये पर चले जाएंगे…यही वजह है कि उद्धव ठाकरे की इस चाल को बीजेपी के लिए रास्ता आसान करने और शिंदे के लिए रास्ता बंद करने वाली रणनीति मानी जा रहा है…….

सोचिए, जो शिंदे कभी खुद को सत्ता की धुरी मान रहे थे….वही अब न घर के रहेंगे न घाट के….बीजेपी की मजबूरी खत्म होते ही शिंदे की सौदेबाजी की ताकत भी खत्म हो जाएगी…..यही नहीं, शिंदे गुट के पास सिर्फ 29 पार्षद हैं….जो किसी भी हाल में निर्णायक भूमिका में नहीं रहेंगे…..सत्ता की राजनीति में ये वही स्थिति है….जहां सहयोगी सिर्फ नाम का रह जाता है और असली फैसले पूरी तरह बड़े दल के हाथ में चले जाते हैं…उद्धव ठाकरे ये अच्छी तरह जानते हैं कि बीजेपी से सीधी लड़ाई में फिलहाल फायदा नहीं है…लेकिन शिंदे को कमजोर कर देना उनके लिए रणनीतिक जीत है….और यही वजह है कि ये कदम दिखने में बेवजह लग सकता है…लेकिन इसका असर बेहद आक्रामक  हो सकता है……

मुंबई की राजनीति में बीएमसी मेयर चुनाव से पहले जो सियासी भूचाल आया है….उसने ये साफ कर दिया है कि महाराष्ट्र की सत्ता में अब असली ताकत किसके पास है और कौन सिर्फ दिखावे का खिलाड़ी बनकर रह गया है…नगर निकाय चुनावों के नतीजों के बाद महायुति खेमे में जीत का शोर जरूर सुनाई दिया…लेकिन इस शोर के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी दिखी…जो एकनाथ शिंदे की राजनीति को लगभग खत्म करने की ओर ले जाती दिख रही है…शिंदे भले ही नवनिर्वाचित पार्षदों से स्वच्छता, जल संकट और विकास की बातें कर रहे हैं…लेकिन बीएमसी के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं…..

यही आंकड़े बताते हैं कि शिंदे अब सत्ता की धुरी नहीं….बल्कि सिर्फ एक सहायक खिलाड़ी बनकर रह गए हैं…अब इस पूरे खेल में उद्धव ठाकरे ने जो चाल चली है….उसने बीजेपी के लिए मेयर की राह आसान कर दी है और शिंदे के लिए हर दरवाजा लगभग बंद कर दिया है….सूत्रों के मुताबिक, उद्धव ठाकरे गुट ने तय किया है कि अगर मेयर पद के लिए बीजेपी का उम्मीदवार सामने आता है….तो उनके सभी 65 पार्षद वोटिंग प्रक्रिया से दूर रहेंगे……हालांकि, देखने में ये फैसला बीजेपी के पक्ष में जाता दिख रहा है….लेकिन इसके पीछे छिपी राजनीति बेहद गहरी है….ये वही स्थिति है…जहां बीजेपी अपने दम पर मेयर बना लेगी और शिंदे गुट पूरी तरह जरूरी नहीं हो जाएगा….

यही कारण है कि राजनीतिक जानकार इसे उद्धव ठाकरे की मास्टरस्ट्रोक चाल बता रहे हैं….ये फैसला सीधे तौर पर शिंदे को राजनीतिक तौर पर अलग-थलग करने वाला है…जो एकनाथ शिंदे कभी खुद को शिवसेना का असली वारिस बताकर सत्ता में आए थे….वही अब बीएमसी जैसे सबसे बड़े नगर निकाय में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में भी नहीं रहेंगे…बीजेपी की मजबूरी खत्म होते ही शिंदे की सौदेबाजी की ताकत भी खत्म हो जाएगी…यही वजह है कि कहा जा रहा है कि उद्धव ठाकरे ने जानबूझकर ऐसा रास्ता चुना…जिसमें बीजेपी को तात्कालिक फायदा दिखे, लेकिन शिंदे की राजनीति को लंबी चोट लगे…

इस पूरे घटनाक्रम ने महायुति सरकार की असल तस्वीर भी जनता के सामने रख दी है…एक ओर मंच से विकास, ट्रिपल इंजन सरकार और एकजुटता की बातें की जा रही हैं….तो वहीं दूसरी ओर अंदरखाने में सत्ता की असली लड़ाई चल रही है….शिवसेना नेता संजय निरुपम ये दावा कर रहे हैं कि महायुति का ही मेयर बनेगा और पूरे मुंबई में विकास की बाढ़ आ जाएगी….संजय निरुपम ने कहा कि…महायुति के मेयर बनने के बाद पूरे मुंबई में बड़े पैमाने पर विकास कार्य होंगे…भाजपा को ज्यादा सीटें इसलिए मिलीं क्योंकि उसने अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा…जबकि शिवसेना सीमित सीटों पर मैदान में उतरी थी….खासकर अपनी पारंपरिक सीटों पर…इसके बावजूद गठबंधन ने कई सीटों पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को पराजित किया…उन्होंने ये भी कहा कि मुंबई की जनता ने उद्धव ठाकरे को नकार दिया है…

वहीं शिवसेना नेता संजय निरुपम के इन आरोपों को खारिज करते हुए शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने कहा कि….महायुति एकजुट है और मेयर पद पर गठबंधन का ही उम्मीदवार बनेगा….उन्होंने भरोसा जताया कि गठबंधन के सभी घटक दल एक साथ मिलकर मुंबई के विकास के लिए काम करेंगे…..

संजय निरुपम भले ही ये दावा कर रहे हों कि महायुति का ही मेयर बनेगा….लेकिन सच्चाई ये है कि अगर बीजेपी अपने दम पर मेयर बना लेती है…तो शिंदे गुट सिर्फ नाम का सहयोगी बनकर रह जाएगा….उद्धव ठाकरे की इस रणनीति ने ये भी साफ कर दिया है कि बीजेपी अब महाराष्ट्र में किसी भी सहयोगी पर निर्भर नहीं रहना चाहती…बीएमसी जैसी ताकतवर संस्था में अगर बीजेपी अकेले दम पर सत्ता में आती है….तो शिंदे गुट की उपयोगिता लगभग खत्म हो जाएगी…यही नहीं, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे की अपने 6 पार्षदों के साथ बैठक भी इस बात का संकेत है कि मुंबई की राजनीति में अस्थिरता बढ़ने वाली है…

विपक्ष का आरोप है कि बीएमसी जैसे अहम नगर निकाय को बीजेपी ने सत्ता के प्रयोगशाला में बदल दिया है…जहां नागरिक मुद्दों से ज्यादा राजनीतिक फायदे-नुकसान की गणना हो रही है…उद्धव ठाकरे पर ये आरोप भी लग रहा है कि उन्होंने जानबूझकर वोटिंग से दूर रहने का फैसला कर बीजेपी के मेयर को लगभग पक्का कर दिया…लेकिन ठाकरे समर्थकों का कहना है कि ये शिंदे द्वारा शिवसेना तोड़ने की राजनीति का जवाब है……..

दोस्तों, इस पूरे खेल में सबसे दिलचस्प बात ये है कि बीजेपी भले ही मेयर की कुर्सी पर बैठे…लेकिन असली नुकसान एकनाथ शिंदे को होगा….न बीजेपी उन्हें बराबरी का साझेदार मानेगी और न ही उद्धव ठाकरे उनके लिए कोई राजनीतिक स्पेस छोड़ेंगे….यही वजह है कि कहा जा रहा है कि शिंदे अब न घर के रहेंगे न घाट के…..

एक ओर बीजेपी उन्हें धीरे-धीरे हाशिये पर धकेल रही है….तो दूसरी ओर उद्धव ठाकरे उन्हें राजनीतिक तौर पर घेरने में जुटे हैं….ऐसे में बीएमसी मेयर चुनाव अब सिर्फ एक पद की लड़ाई नहीं रह गया है….बल्कि ये उस सत्ता संघर्ष का प्रतीक बन गया है…जिसमें एकनाथ शिंदे सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभर रहे हैं….अगर हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले समय में महाराष्ट्र की राजनीति में ये साफ हो जाएगा कि महायुति सरकार में असली ताकत सिर्फ बीजेपी के पास है और बाकी सहयोगी सिर्फ मजबूरी में साथ चल रहे हैं……..

कुल मिलाकर, ये कहना गलत नहीं होगा कि….बीएमसी मेयर की कुर्सी पर चाहे कोई भी बैठे……लेकिन इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी यही होगी कि कैसे उद्धव ठाकरे की एक चाल ने एकनाथ शिंदे को पूरी तरह किनारे कर दिया और बीजेपी को बिना किसी सौदेबाजी के सत्ता की चाबी सौंप दी…..ऐसे में अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या सच में उद्धव ठाकरे की ये चाल कामयाब होगी और क्या सच में उद्धव ठाकरे की इस एक चाल से एकनाथ शिंदे को पूरी तरह किनारे लग जाएंगे..

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